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दिसंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कैसे विदा दूं ? (कविता).

कैसे विदा दूं ? पूरी सृष्टि गतिमान है तब तुम कैसे ठहर सकते हो। जाने की ठान ली, चलो बात तुम्हारी मान ली। तुम्हें भूलना मुश्किल होगा तुमने, हंसी दी, आंसू दिए थोड़ा हंसाकर रूला दिया। सचमुच तुम्हारी आदतें, अच्छी नहीं हैं। ये क्या बात हुई, मैं तुम्हारे साथ खुद को एडजस्ट कर ही रहा था और तुम चल दिए। जाते जाते एक बात तो बतलाते जाते, मैं प्रतीक्षा करूं, तुम्हारे आने की लौट सकोगे तुम ? वैसे तुम्हारे होने से, कुछ हासिल नहीं था मुझे। पूरे साल मैं तुम्हारे जाने के दिन गिनता रहा। अब सोचता हूं- तुमने दर्द दिए, बेचैनी दी, हज़ार तकलीफ़ों से गुजारा। लेकिन, पीड़ा में आनंद पहचानने का हुनर भी तो तुम्हीं ने सिखलाया। बाहर देख आया हूं, अभी-अभी। लोग उल्लासित है, तुम्हारे बाद जो आएगा, उसे सोचकर। मैं कैसे समझूं, उसका मिजाज जो अभी आया ही नहीं। क्या पता तुमसे अच्छा हो, या तुम्हारे जैसा, या शायद, और ज्यादा क्रूर। मुझे तो महिनों लग जाएंगे तुम्हें भूलने और उसे स्वीकार करने में। न जाने कब तब अपने दस्तखत के नीचे, तुम्हें दुहराता रहूंगा, और उसे काटकर, यकीन दिलाता रहूंगा खुद को,...

बिलार (लघुकथा).

बिलार. रात में अचानक कान में तेज दर्द शुरू होने से पूरी रात नींद बाधित रही। सुबह-सुबह जब किचन में गया कि थोड़ी चाय बनाकर पी लूं तो वहां का नजारा देखकर सर में भी दर्द शुरू हो गया। पूरे किचन में दूध बिखरा पड़ा था। मैं समझ गया कि वह बिलार जो अक्सर आंगन में घूमते रहता है, कल रात किसी समय मौका देख कर घर में घुसने में सफल रहा। यह उसी की कारस्तानी है। काफी ढूंढने पर दर्द की दवा मिली, वह खाकर, मैं थोड़ी देर और सोने चला गया। धूप खिलने के बाद हाथ-मुंह धोकर किचन साफ करने में जुटा। तब तक दर्द से काफी राहत मिल चुकी थी। किचन साफ करने में घंटा भर से कम समय नहीं लगा, चारों तरफ दूध बिखरा पड़ा था। दिमाग इस तरह से भन्नाया हुआ था कि अगर वह बिलार मिल जाए तो उसकी जान ले लूं। काम निपटा कर जब अख़बार लेकर बाहर निकला कि थोड़ी देर धूप में बैठूंगा, तो देखा आंगन के एक कोने में जहां धूप पर रही थी, बिलार बड़े आराम से लेटा हुआ है। मैंने पास में शस्त्र तलाशने की कोशिश की। और कुछ न पाकर अपना जूता ही उठा कर दे मारा। बिलार तब तक सचेत हो चुका था। जूते का थोड़ा सा हिस्सा उसके शरीर पर पड़ा जरूर लेकिन वह वहां से उठ कर भाग...

मुड़ कर देखना मुझे. ( कविता )

कई बरस बीते,घरबार छूटे । रोटी की तलाश में, शहर क्या निकले गांव-जवार पीछे ही छूट गएं। वे बुढ़ी आंखें, जो अपने बेटे-बहु, पोते-पोतियो को, देखने के लिए ही, ज्योति बचाए रखी हैं निरंतर बुलाती हैं, हमें। उन बुढ़ी आंखों को, अपने मनचाहों को देखने की ललक, इतनी तीव्र है, वह वर्ष में, दो-तीन दिन, देखने से कहां मिटती है। उन्होंने, इन दिनों मुझे एक नया नाम दिया है- निर्मोही। उनका दिया सब स्वीकारा, यह भी स्वीकार है। लेकिन मैं बतला दूं, मोह मुझे भी व्याप्ति है, किंतु, परिवार की रोटी, बच्चों की शिक्षा, निरंतर बांधे रहती है। सच पूछो तो, अपने उद्गम से प्रवाहित, नदी को भी, वापस लौटने की, मुड़ कर देखने की, इच्छा तो सताती होगी। लेकिन क्या वे, लौट पाती हैं कभी ?      © अमित कुमार मिश्रा.

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

                 साहित्य की प्रासंगिकता।                                          - अमित कुमार मिश्रा। पिछले कुछ दिनों से मेरे मित्र मुझसे तरह-तरह के प्रश्न पूछ ले रहे हैं। आज एक मित्र ने पूछा, ‘आप लोग, जो साहित्य पढ़ते-पढ़ाते हैं, उससे समाज को क्या फायदा है ?’ अब वैसे तो आदमी कुछ न कुछ बतला दे यह संभव है लेकिन प्रश्नकर्ता उससे संतुष्ट हो ही जाए यह अपने बस की बात नहीं। मेरे मित्र ने मुझे चिंता में डूबा देख एक दिन का मौहलत सोचने के लिए दिया। परिणामस्वरूप अब मैं सोच रहा हूं। तथ्य मेरे समक्ष यह है कि ‘समाज में साहित्य की क्या प्रासंगिकता है’, इसे कौन पढ़ता है, कौन इससे प्रभावित होता है ? मैं साहित्य का छात्र हूं और केवल छात्र ही हूं। अतः मुझे अपनी बात प्रमाणिक रूप से कहने के लिए किसी बड़े आलोचक के कथन का सहारा लेना पड़ेगा, मेरी अपनी क्या सोच है इस बात का महत्व तब तक नहीं है जब तक मैं केवल छात्र हूं। इसलिए मैं उन विचारकों की वाणी स्मरण करन...

इस मौसम की सर्दी. (प्रेम गीत)

रात मिलन की बेला है,  तुझे सुबह की कैसी जल्दी ? तेरा तौर समझ न आए  प्रीत से मुख क्यों मोड़ के चल दी ? रात गए तो आए थे तुम  सुबह-सुबह जाने की कह दी । कैसी भूल हुई थी मुझसे, चूक बिना बतलाए चल दी । यौवन पूरी रात है बरसी  मन में प्यास जगा कर चल दी । तुझको ऐसी क्या है जल्दी  जीवन घट को भी, न कह दी। रूप मेरा मदिरा का प्याला  पीए बिना क्यों तुमने चल दी ?

वाह रे इंसान. ( सामाजिक लेख )

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वाह रे इंसान! तुझसा बावरा पूरे संसार भर में तलाश पाना असंभव है। इंसान सारे प्राणियों में, श्रेष्ठ, शिक्षित, सभ्य, बुद्धिमान...., घंटा है। यह कैसी बुद्धिमता है कि जानबूझकर गड्ढे में कूद रहे हैं, आंख होते हुए अंधों सा चल रहे हैं, ज्ञान होते हुए मूढ़ सा बर्ताव है। वैसे तो मैं अव्वल दर्जे का आलसी हूं लेकिन पता नहीं कैसे प्रातः भ्रमण को मैंने नियमित बनाए रखा है। आज सुबह-सुबह चिड़ियाघर के बाहर साइकिल खड़ी कर दरवाजे की ओर बढ़ा। रोज की तरह चारों ओर गाड़ियां-ही-गाड़ियां खड़ी थी। इन वाहनों से लोग स्वास्थ्य लाभ करने पधारे थे। हे बुद्धिमान प्राणी! जिस स्थान पर शुद्ध वायु तलाशने आए हो, उस में आते ही पेट्रोल की धुंआ मिला दी। अब सोचिए दो-चार, दस गाड़ियां हो तो अलग बात है, यहां तो गाड़ियों की बाढ़ उमर पड़ी है। यहां शुद्ध वायु ?            (दैनिक भास्कर, दिनांक 19/12/ 2018, पृष्ठ-2). खैर, मैं अंदर गया। भीड़ तो उस समय नित्य हुआ करती थी, आज भी है। लोग टहल रहे हैं, दौड़ रहे हैं, व्यायाम कर रहे हैं। एक बड़ी संख्या मोबाइल पर बात करने या कान में आला (टेलीस्कोप) लगाए संगीता...

आधी रात को पत्नी से लड़ाई ( व्यंग्य )

पिछली रात जब मैं सो रहा था तो कई बार बिजली आ रही थी जा रही थी। इतनी गर्मी में बिना पंखे के कब सोता कब जगता कुछ पता ही नहीं चल रहा था। बिजली की यह दशा देखकर आम इंसान को गुस्सा तो बहुत आता है लेकिन आम इंसान आखिरकार आम इंसान ही होता है वह अपना गुस्सा प्रकट नहीं कर सकता। बीवी के सामने प्रकट करें तो पिटने का डर, सरकार से विरोध प्रकट करें तो विद्रोही कहलाने का डर। डरते डरते हीं बेचारे की जिंदगी गुजरती है। मैं इसी उधेड़बुन में लगा था कि अचानक से लगभग ढाई बजे रात में बीवी को फेसबुक चलाते देखा। बुक पढ़ने का एक टाइम टेबल होता है, उसमेसे भी लोग समय की कटौती कर लेते हैं लेकिन फेसबुक एक ऐसा आविष्कार है जिसे पढ़ने के लिए किसी टाइम टेबल की जरूरत नहीं पड़ती लोग कितना भी पढ़े मन नहीं भरता, नींद भी नहीं सताती है। दूसरी ओर किताब है जिसे हाथ में लेते ही नींद आने लगती है। मैं अर्धचेतना में पूछ बैठा (चेतना में होता तो यह गुस्ताखी करता ही नहीं)- "इतनी रात गए फेसबुक पर क्या कर रही हो". उसने जवाब दिया- "एक इन्वर्टर तो तुमसे लगाया नहीं जाता, एक घड़ी को भी लाइन आए और पंखा चले तब तो सोऊं, पता न...

प्रेम ही ईश्वर है ( कविता )

मुहब्बत के तौर-तरीकों से वाकिफ कहां हैं लोग प्यार में खुदा को तलाशते कहां है लोग। इन्हें तो पत्थर की मूर्तियों से प्रेम है प्रेम ही ईश्वर है, स्वीकारते कहां हैं लोग। पाने को मुहब्बत लालायित तो हैं सभी शीश देने को अब भी राजी कहां हैं लोग। तंग गली है दोनों का गुजारा नहीं यहां अपना घर फूंके ऐसे बेपरवाह कहा हैं लोग। © अमित कुमार मिश्रा।

दो मौतें ( कहानी).

दो मौतें। सर्दियों के मौसम में मैं साढ़े सात के पहले कभी उठा होऊं यह याद नहीं आता। आज छ: बजे से ही मन में कुछ अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। बहुत कोशिश की लेकिन नींद नहीं आई। उठकर बाहर आंगन में चला आया। पटना में और आंगन, है ना आश्चर्य वाली बात। किराए के कई मकानों में रहने के बाद मुझे यह मकान रहने को मिला जो मेरे मन के अनुकूल था। मकान काफी पुराना था, प्लास्टर झड़ने लगी थी, लेकिन मुझे पसंद आया। काफी छोटा सा घर, एक तल्ला, दो कमरे, एक छोटा रसोई, एक स्नानगृह, बाहर छोटा सा आंगन और आम का एक पेड़। किराया मैं देने में सक्षम था अतः आ बसा। बीच-बीच में परिजन भी आते-जाते रहते थे अधिकांश मैं अकेले ही रहता। आंगन में पेड़ होने के कारण गौरैया, कौवा, गिलहरी, दिनभर शोर मचाते। कभी-कभी इनके कोलाहल से मन खिझ उठता लेकिन मन शांत होने पर अच्छा लगता। मकान के ठीक पीछे एक खाली प्लॉट था जिसमें आस पड़ोस के सूखे कचरे फेंके जाते थे। इन दिनों मेरे प्रेम का पात्र कौन-कौन था यह गौण है, प्रमुख यह है कि मेरे क्रोध के केंद्र में दो प्राणी थें, एक गिलहरी जो अपनी चोरी के कारस्तानी से बाज नहीं आती और सूखने को फैलाए मेरे ...

मैं आग बांटता हूं. (कविता)

कई बार कोशिश की है दिल के अंगारों को वहीं सीमित कर जलता रहने दूं। क्यों बार-बार उसे कागज पर उतारने की जहमत उठाई जाए ? कागज पढ़ी जाती है अपनी जलन में औरों को भी जलाती है। कोई जलता है, कोई सुलगता है, कोई निरपेक्ष है। लेकिन मेरा बार-बार प्रश्न करना अखरता सभी को है। सभी चाहते हैं, लोगों से प्रश्न पूछने की आजादी छिन जानी चाहिए। क्योंकि इस आजादी का मेरे जैसा कुछ आवारागर्द इंसान प्रयोग करता हैं। और उनके प्रयोग से कुछ ऐसे चेहरे सामने आ जाते हैं जो क्रूर से भी क्रूरत्तम हैं। उन चेहरों पर लोगों की श्रद्धा है लोग पूजते हैं उन्हें फिर क्या हक है कि मैं उनके विरुद्ध कुछ कहूं ? कुछ सोचूं, आवाज उठाऊं ? क्या मेरी इस गुनाह पर लोग चुप बैठेंगे ? मुझे अपने दिल की आग कागज पर सजाने देंगे ? वे तो चाहेंगे मैं भीतर ही भीतर जलूं। उस आग से कभी सफेद कागज को काली करने की गुस्ताखी ना करूं। वर्ना उनके पास हथियार है और वे मेरे सफेद कपड़ो को मेरे भीतर के लाल स्याही से रंगने में परहेज नहीं करेंगे। लेकिन मैं नहीं डरता इन हथियार वालों से। मुझे याद है जब गांधी पर गोली चलाई गई और...