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अप्रैल, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जिम्मेदारी ( लघुकथा ).

प्रमोद लंच के बाद दुबारा अपनी कुर्सी पर बैठा ही था, अभी उसने फाइल खोली भी नहीं थी कि उसके मोबाइल पर बड़े साले प्रशांत का फोन आया। फोन पर प्रशांत ने बतलाया कि वह अपने घर में ए.सी. लगवा रहा है और घर का पुराना कूलर अगर प्रमोद चाहे तो प्रशांत उसके घर आज ही भिजवा देगा। प्रमोद ने कहा,  “अगर आपके घर में जरूरत नहीं है तो भिजवा दीजिए, सुमन घर में ही है वह ठेले वाले को पैसा देकर उतरवा लेगी।”   “आप सुमन को फोन कर दो, भाड़ा मैं दे दे रहा हूं वह बस सामान रखवा ले। सब कुछ बिल्कुल फिट है पानी भर कर चालू कर सकती है।” इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया।  प्रमोद सोचने लगा 'चलो अच्छा ही हुआ कितनी गर्मी पड़ रही है पंखे की हवा तुरंत ही गर्म हो जाती है। रात के तीसरे पहर तक कमरे की दीवार तपती रहती है, रात को सोना कितना मुश्किल हो गया है। आज से चैन की नींद सो तो सकूंगा।'  तभी उसे याद आया दूसरे कमरे में, जिसमें मां और पिताजी सोते हैं उसका टेबल फैन काफी पुराना होने के कारण हवा ठीक से नहीं देता है। रात को उसने देखा मां हाथ के पंखा झल रही थी। मां की तबीयत भी ठीक नहीं रह रही थी। पिता तो पहले स...

दीवार (कविता).

कई बार कोशिश की मैंने मकान के पिछले हिस्से की दीवार खड़ी कर दूं, जिसे पिछली बारिश ने गिराया था। तब मुझे लगा दीवार का यह गिरना मेरा नुकसान करा गया है लेकिन उस दिन जब अचानक अपने दरवाजे पर गेहूं सूखाती तुम दिखी तब जाना, इस दीवार का गिरना मेरे हृदय-कपाट का खुलना था मैं छुप छुप कर नित्यप्रति तुम्हारे रूप-लावण्य का पान करता हूं जब तक तुम नजरों के सामने होती हो सुबह तुम्हारे छुपते ही इंतजार शुरू होता है सांझ की और सांझ में तुम्हारे ओझल होते ही सुबह की प्रतीक्षा में रात कटती है। तब खीझ उठता है मन कि दोपहर और रात इतनी लंबी क्यों होती है। घरवाले रोज प्रयास करते हैं इस दीवार को खड़ी करने की और मैं किसी तरह टाल देता हूं उन्हें लेकिन कब तक ? मुझे पता है जल्द ही फिर से उठ खड़ी होगी वह दीवार। इन दिनों मेरी बेसुधी उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है मैं पाता हूं तुम सुबह और शाम पहले से अधिक रूकती हो दरवाजे पर तुम्हारी निगाहें गिरी दीवार के पीछे ढूंढती है मुझे मैं शायद, पहले से ज्यादा खुलकर ताकता हूं तुम्हें। आज दीवार का सिर अकड़ से ऊंचा उठ रहा है मैं कसमसाकर सोचता हूं कोई ...

ब्रेख़्त की कविता में युद्ध की विभीषिका का चित्रण (आलेख).

ब्रेख़्त की कविता में युद्ध की विभीषिका का चित्रण।                      - अमित कुमार मिश्रा। (घोषणा: मैं बतला देना चाहता हूं कि मैंने ब्रेख़्त की इन कविताओं के मूल जर्मन भाषा से हिंदी में अनुदित पाठ ही पढ़ा है और उसी के आधार पर यह आलेख भी प्रस्तुत की है।) युद्ध सदैव मानव जाति के विकास में बाधा पहुंचाता रहा है। कोई भी युद्ध हो उसमें मानवीय मूल्यों की हत्या अवश्य होती है। मानव कभी व्यक्तिगत तो सभी सामूहिक स्वार्थवश या ईर्ष्यावश युद्ध का सृजन करता रहा है। युद्ध की एक बड़ी विभीषिका यह है कि इस की लपटें सुलगने के बाद सुलगाने वाले के नियंत्रण में भी नहीं रहती है। मानव सभ्यता के इतिहास में अनेक ऐसे पन्ने दर्ज हैं जो मानवों के सभ्य होने पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में दो-दो विश्वयुद्धों की भयावहता ने संपूर्ण मानवता को झकझोर कर रख दिया। अनेक संपन्न देश भुखमरी के दहलीज पर आ खड़े हुएं। इतिहास के पन्नों में युद्ध का स्थूल स्वरूप मात्र वर्णित होता है उसके सूक्ष्म प्रभाव को समकालीन साहित्य में ही देखा जा सकता है। इति...

तेरी मेरी प्रेम कहानी (कविता).

कल फिर जब सूरज निकले चिड़ियों का मधुर कलरव हो कोमल खिलते फूल विहंसते भौंरों को ललचाते हों लता के नाजुक नरम पल्लव पर कोई पराग रख जाता हो उषाकाल के मधुर मिलन का साक्षी जब यह सृष्टि हो क्या हो जब कल सूरज निकले और प्रिय! हम ही ना हो ? कोई तो हो अपने पीछे नन्हा-सा ही क्यों ना हो जो सूरज को और चंदा को मलय पवन, निर्मल गंगा को सांझ के कंपते मंद नयन को उषा के स्वर्णिम अधर पटल को धरती के विश्वास अटल को अंबर के ऐंठे हुए मन को वायु के आंचल में भर कर तेरी-मेरी प्रेम कहानी सांझ सवेरे बतलाता हो। - अमित कुमार मिश्रा।

बेनीमाधो तिवारी की पतोह ( समीक्षात्मक आलेख).

किसी देश-समाज में वर्षों से चली आ रही परंपरा को बदलने के लिए एक बड़े जनआंदोलन की आवश्यकता होती है। परंपरावादी आसानी से हार नहीं मानते वे नवीनता को बार-बार पुरातन के आवरण में ढक देना चाहते हैं। इस संघर्ष में, बदलाव चाहने वालों को न सिर्फ परंपरावादियों से लड़ना पड़ती है बल्कि सरकारी तंत्र से भी जुझना पड़ता है क्योंकि सरकारी तंत्र भी कहीं न कहीं परंपरावादियों से ही निर्मित होती है। भारतीय समाज में भी राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सरकार और पुलिस महकमे का रवैया परंपरावादी और सामंतवादियों के मेलजोल से बनती बिगड़ती रही है। शुरू में बनने वाली कांग्रेस की सरकार हो या बाद में आई जनता पार्टी और क्षेत्रीय पार्टियां सभी राजनीतिक वर्चस्व के लिए लड़ाई लड़ती रही वे सामाजिक कुनीतियों के विरोध में उतरने से सदैव कतराते थे क्योंकि वहां सीधे-सीधे परंपरा की दिवाल खड़ी थी और इस राह से बच निकलना ही राजनीति का गुण था। पुलिस सदैव इनके बीच खुद को पालने का मार्ग निकलती रही। वह राजनीति और परंपरावादी सामंतों से साठगांठ करके जनता को कभी नक्सलवादी तो कभी उग्रवादी बतला कर उसकी हत्या करती रही। जातिप्रथा, ऊंच-नीच, अमीरी-ग...

प्रेम की परिधि (कविता)

हां मैं मानता हूं- बेवजह छिनी हैं मैंने तुम्हारी आजादी, मैं रोकता हूं तुम्हें मनचाहे रिश्तें बनाने से, मेरा प्रेम तुम्हारे पांव में बेड़ियों की तरह लिपट गया है। जिस रिश्ते के सहारे तुम खुद को मुक्त करना चाहती थी सामाजिक बंधनों से, उस रिश्ते ने तुम्हें आजाद करने के बजाए और भी कसकर जकर दिया है प्रेम के पाश में। तुम मचलती हो, कसमसाती हो और पुनः लौट आती को खुद में प्रेम में मिले जख्मों के साथ, मैं भी आहत होता हूं तुम्हें जख्मी देखकर सोचता हूं अपने प्रेम को स्वतंत्र कर दूं तुम्हें दे दूं सारी आजादी जिसकी आकांक्षा थी तुम्हें, लेकिन मैं इसका क्या करूं कि प्रेम सागर जितना विस्तृत होकर भी अपने प्रेमी पर अधिकार को लेकर कितना संकीर्ण होता है।

संघर्ष (कविता).

उठो, आधी रात को कच्ची नींद में उठो, तुम्हारे सोने के बाद भी जागती रहती है पतित राजनीति चलती है कुचक्र की चालें । उठो, इसलिए उठो कि कहीं तुम्हें शामिल न कर दी जाए मुर्दों की सूची में। चलो, इसलिए चलो कि जहां तुम खड़े हो वहां संसद बनने वाली है उसी में सौदा होगा लोगों की उम्मीदों का। हकीकत में यह कसाई खाना है यहां तुम्हारे स्वप्न रेते जाएंगे लेकिन सख्त हिदायत है कि इसे स्वर्ग कहो लोकतंत्र का स्वर्ग नेताओं का स्वर्ग तुम्हारे कातिल का स्वर्ग। बढ़ो, आगे बढ़ो इसलिए बढ़ो कि कहीं पीछे से आती भीड़ के नीचे कुचल न दिए जाओ। लड़ो, लेकिन व्यवस्था से लड़ो जिस दिन तुम ने संघर्ष छोड़ा अपनी लड़ाई सुस्त पड़ने दी समझ लो, तुम्हारी आत्मा भी व्यवस्था के आगे समर्पण कर चुकी और तुम भी हिस्सा बन गए उस व्यवस्था की जिसने तुम जैसे न जाने कितने युवाओं को दबा रखा है सरकारी पुरस्कारों के नीचे। मरो, इसलिए मरो कि जो जिंदा हैं वे जिंदा लाश हैं तुम्हारे मरने में ही तुम्हारी उपलब्धि है अगर जिंदा रहे तो तुम्हें भी बनना पड़ेगा सरकार का कृत्य दास उन लालची लोगों की तरह जिन्होंने चंद पैसों की...

तरकीबें (व्यंग्य)

सर्वप्रथम तो मैं आपको यह बतला देना चाहता हूं कि यह कोई कहानी नहीं एक घटना है। हां मैं इस बात का दावा नहीं कर सकता हूं कि यह घटना सही ही है। बात आज की है और कुछ दिन बाद पढ़े जाने पर इन दिनों की है। जिंदगी की भागदौड़ कुछ इस तरह बढ़ गई है कि खुद को भी पता नहीं होता कि मैं आज कहां होऊंगा, सुबह कहां होगी और रात को कहां सोऊंगा। मेरा कार्यक्षेत्र पटना है और अध्ययन क्षेत्र दरभंगा, ससुराल पटना में है और मायका सीतामढ़ी में। इन सबों के बीच बांट-बांट कर जिंदगी को जी रहा हूं। दरभंगा में वहां के विश्वविद्यालय से पीएचडी के इस‌ सप्ताह का कार्य पूरा कर आज ही पटना वापस लौटा हूं। पत्नी से जो सुखद समाचार मिला वह यह था कि वो मायके जा चुकी है, हम लोगों का कमरा दो दिनों से बंद पड़ा है। इसी बीच आंधी-तूफान भी आई थी जिस कारण कमरे में धूल जमा होने की स्थिति विकट होगी। धर्म पत्नी ने कहा, ‘घर को थोड़ा झाड़ पोंछ कर रहने लायक बना लीजिएगा और शाम में मुझे लेने आ जाइएगा।’ अब मैं चल तो पड़ा दरभंगा से पटना की ओर लेकिन मुसीबत यह है कि गांधी जी के बुड्ढे कंधे, बोझ उठाते उठाते अब थक चुके हैं इस कारण एक कंधे पर बोझ उठाते है...