जड़ और जमीन का कवि
अमित कुमार मिश्रा. अज्ञेय के तीसरे सप्तक या यूं कहें कि उससे काफी पूर्व से ही हिंदी साहित्य में अपनी अलग और गहरी पहचान बनाते आ रहे केदारनाथ सिंह को उनकी जड़ से जुड़ी कविताओं के संदर्भ में विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। हिंदी कविता में बिम्ब और प्रतीक को अप्रतिम ऊंचाई देने वाले केदारनाथ सिंह नई कविता के अंतिम कवि के रूप में जाने जाते हैैं। उनकी कविताओं में उनका गांव , मातृभूमि , मातृभाषा जीवित है , तो वहीं शहरी भागदौड़ भी अपनी उपस्थिति बनाए रखती है। उनकी कविता में शहर और गांव दोनों का ही बेजोड़ चित्र देखने को मिलता है। जीवन का ऐसा कोई भाव नहीं है जो उनकी कविता में अंगराई न लेता हो। छोटी से छोटी वस्तु को कविता का विषय बना देना और उसे व्यापक रूप दे देना केदारनाथ सिंह की खूबी रही है। जीवन जगत के किसी भी वस्तु को लेकर उसे कविता का विषय बना देना किसी कवि की दक्षता का प्रमाण है। उनकी कविताओं में छोटी-छोटी चीजों और हल्के से हल्के भावों के जुड़ते जाने की जो यह कला दिखती है उसके विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है, “मैं मन को बराबर खुला रखने की कोशिश करता हूं ताकि वह आसपास के हल्की से हल्...