अनिश्चय (कविता)
बड़ी भीड़ में हूं, डर है
कहीं खुद को खो न दूं।
एक पांव तेजी से बढ़ता है
भीड़ की ओर
दूसरा लौट आने को बेताब है
खुद में।
भीड़ की रौनक जितनी चमकीली है
अपने भीतर का संसार
उतना ही बेरंग।
रंगो की चमक ललचाती है
बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है।
निश्चय करता हूं,
कूद पड़ू
दुनिया की आपाधापी में।
किसी से छीन लूं
किसी को ठग लूं
अपनी तिजोरी भर लूं।
तभी पुकार उठता है
भीतर का बेरंग और खाली सा कुछ-
“याद रखना,
अगर मुझ पर पड़े रंगो के छीटें
खुशी तुमने किसी के लूटे
बस उसी क्षण,
तेरी मेरी संगत टूटी।
भीड़ को तुमने अपनाया
और मैं तुमसे रूठी।”
मैं सहमा सा लौट जाता हूं, खुद में।
एक पांव भीड़ की ओर छोड़ कर।
कहीं खुद को खो न दूं।
एक पांव तेजी से बढ़ता है
भीड़ की ओर
दूसरा लौट आने को बेताब है
खुद में।
भीड़ की रौनक जितनी चमकीली है
अपने भीतर का संसार
उतना ही बेरंग।
रंगो की चमक ललचाती है
बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है।
निश्चय करता हूं,
कूद पड़ू
दुनिया की आपाधापी में।
किसी से छीन लूं
किसी को ठग लूं
अपनी तिजोरी भर लूं।
तभी पुकार उठता है
भीतर का बेरंग और खाली सा कुछ-
“याद रखना,
अगर मुझ पर पड़े रंगो के छीटें
खुशी तुमने किसी के लूटे
बस उसी क्षण,
तेरी मेरी संगत टूटी।
भीड़ को तुमने अपनाया
और मैं तुमसे रूठी।”
मैं सहमा सा लौट जाता हूं, खुद में।
एक पांव भीड़ की ओर छोड़ कर।
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