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हुजूर गजब ढ़ाते हो

मतलब निकलते ही हमारे वजूद को ऐसे मिटाते हो जैसे सिलेट पर खड़िया से लिखे म, ज, दू, र मिटाते हो हमारे हाथ तराशते हैं ताजमहल की नक्काशी  बन जाने पर दीवारों से हमारे पसीने की गंध मिटाते हो  आपके बेघर भगवान के घर तक हमने बनाये हैं  हमारे कदमों के निशान गंगाजल से धुलवाते हो  हमसे ज्यादा बदनसीब कौन है जमाने में हुजूर  हमारे ही बनाये संसद में हमारी होली जलाते हो हम तो कैसे भी अपनी जिन्दगी जी लेते गांव में  आप हीं शहर बसाने को बार-बार बुलाते हो यह गजब की रीति है आपकी दुनिया की हुजूर  हमारे बसाये शहर में हमें ही जाहिल बताते हो सब कुछ भूला दिया मगर यह याद रखेंगे 'अमित' हमारे घर में लगी आग से आप दीया जलाते हो

कविता

माल ट्रेन, मजदूर, लाशें, नींद, रोटी, कुछ प्रश्न, कुछ शब्द... 08-05-2020 1. आज जबकि आधी दुनिया  नींद न आने की बीमारी से त्रस्त है  तब कैसे तुम्हें इतनी नींद आ गई  कि बिजली की कड़कड़ाहट सी मालट्रेन की तेज आवाज   तुम्हारे नींद में बाधक नहीं बनी ? अरे हम तो सोते हैं मखमल के गद्दे पर  पंखे की ठंडी हवा में  तब भी करवटें बदलते समय गुजरता है  नींद नहीं आती  तुम कैसे सो गए पीठ में चुभने वाले  उन पत्थरों पर  और तब भी तुम्हें इतनी गहरी नींद आ गई । सब कह रहे हैं कि तुम गरीब मजदूर थे  लेकिन तुमसे अमीर तो कोई था ही नहीं  जिसे सौगात में इतनी नींद मिली थी।  जीने वाले नींद के लिए तरसते रहेंगे  और तुम चिर निद्रा में लीन हो गए। 2. आप कहाँ तक पढ़े हो बाबू जी ? बुझी आंखों के इस प्रश्न ने मेरी आंखों में चमक ला दी ।  मैंने सगर्व कहा, एम•ए• किया है मैंने । "फिर तो आप बहुत कुछ जानते होंगे।" "बिल्कुल, मैं साहित्य और भाषा का बड़ा जानकार हूँ ।" "अच्छा बाबू जी ! आपकी भाषा में सबसे बड़ा क्या है?" मैंने सोचते हुए कहा,  "आकाश" "सबसे ऊ...