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ग़ज़ल

  रूठ बैठा पिया मैं मनाऊँ कैसे  दिन-उजाले में उसको बुलाऊँ कैसे  सास-ननंद की ठिठोली सही जाए न  ओट चिलमन की उठकर हटाऊँ कैसे ठोकर जमाने की, हंसकर मैं सहती रही तेरी दिल्लगी पर मगर मुस्कुराऊँ कैसे  मैंने दिल की लगी की, तुमने की दिल्लगी दिल की बाजी में, दिल को लगाऊँ कैसे  कितना नासमझ है पिया समझता नहीं  हाल दिल की मैं अपने बताऊँ कैसे  दूर बैठा है रूठकर ओ किसी बात से  मैं इशारों में उनको बुलाऊँ कैसे ।। @ अमित कुमार मिश्रा  

जीवन का सतत प्रवाह

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 जीवन का सतत प्रवाह  ( 'काव्य सरिता' साझा काव्य संकलन (द्वितीय संस्करण) की समीक्षा, भाग 1) [किसी भी विधा के साझा संकलन में कई रचनाकारों की रचनाएं सम्मिलित होती है इसलिए इसकी समीक्षा कुछ जटिल है और समीक्षा का कलेवर विस्तृत हो जाना स्वभाविक है। अपनी सुविधा के लिए मैंने समीक्षित संकलन की समीक्षा दो भागों में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है जिसका प्रथम भाग आप सबों के समक्ष प्रस्तुत है। दूसरा भाग शीघ्र ही प्रेषित करने की चेष्टा करूँगा ।] जीवन सतत है और साहित्य भी। धरा पर जीवन के साथ सदैव साहित्य गतिशील रहा है। जिस समय का साहित्य हमारे पास उपलब्ध नहीं है उस समय भी जीवन की गति के साथ साहित्य वाचिक या अनुभूति-जन्य रूप में विद्यमान अवश्य रहा है। आज के समय में साहित्य का उत्तरदायित्व और बढ़ चला है, निश्चय ही वह कथन स्वयं सिद्ध हो रहा है कि 'जैसे-जैसे समाज पर विज्ञान हावी होता जाएगा वैसे-वैसे साहित्य की आवश्यकता उत्तरोत्तर बढ़ती जाएगी।' इसमें कोई संदेह नहीं की जीवन धीरे-धीरे यांत्रिक होता जा रहा है या यह भी अतिशयोक्ति नहीं कि यंत्र ने धीरे-धीरे जीवन को अपने नियंत्रण में ले लिया ह...