जीवन का सतत प्रवाह

 जीवन का सतत प्रवाह 

( 'काव्य सरिता' साझा काव्य संकलन (द्वितीय संस्करण) की समीक्षा, भाग 1)


[किसी भी विधा के साझा संकलन में कई रचनाकारों की रचनाएं सम्मिलित होती है इसलिए इसकी समीक्षा कुछ जटिल है और समीक्षा का कलेवर विस्तृत हो जाना स्वभाविक है। अपनी सुविधा के लिए मैंने समीक्षित संकलन की समीक्षा दो भागों में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है जिसका प्रथम भाग आप सबों के समक्ष प्रस्तुत है। दूसरा भाग शीघ्र ही प्रेषित करने की चेष्टा करूँगा ।]


जीवन सतत है और साहित्य भी। धरा पर जीवन के साथ सदैव साहित्य गतिशील रहा है। जिस समय का साहित्य हमारे पास उपलब्ध नहीं है उस समय भी जीवन की गति के साथ साहित्य वाचिक या अनुभूति-जन्य रूप में विद्यमान अवश्य रहा है। आज के समय में साहित्य का उत्तरदायित्व और बढ़ चला है, निश्चय ही वह कथन स्वयं सिद्ध हो रहा है कि 'जैसे-जैसे समाज पर विज्ञान हावी होता जाएगा वैसे-वैसे साहित्य की आवश्यकता उत्तरोत्तर बढ़ती जाएगी।' इसमें कोई संदेह नहीं की जीवन धीरे-धीरे यांत्रिक होता जा रहा है या यह भी अतिशयोक्ति नहीं कि यंत्र ने धीरे-धीरे जीवन को अपने नियंत्रण में ले लिया है। ऐसे समय में साहित्य मनुष्य के हृदय में स्पंदन उत्पन्न करने का कार्य करता है। यह संतोष का विषय है कि आज के समय में जिस विपुल साहित्य का सृजन किया जा रहा है उसमें जीवन के समस्त रंग किसी-न-किसी भाव में तरंगित हैं। 

डॉ. रत्नेश्वर सिंह ने उनसे हुई भेंट के दौरान एक अनमोल मोती बल्कि कहे तो मोती-माला भेंट की है जिसमें देश के अलग-अलग क्षेत्र के 16 कवियों की रचनाएं गुम्फित हैं। यह साझा संकलन 'काव्य सरिता' के नाम से उत्कर्ष प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित है। काव्य सरिता का यह द्वितीय संस्करण है जिसका संपादन सुरेंद्र शर्मा सागर और सुधा चौधरी राज जी ने किया है। संकलन की कविताओं से गुजरने के दौरान स्वयं ही इनका संपादकीय कौशल उभर कर सामने आ जाता है। रचनाओं का चयन और उसकी मनभावन प्रस्तुति संपादकीय कला के रूप में अत्यंत प्रभावित करते हैं। सुरेंद्र शर्मा सागर जी ने लिखा भी है, "इस संस्करण के प्रकाशन में मेरा यह प्रयास रहा है कि आपको बेहतरीन एवं जीवनोपयोगी रचनाएं पढ़ने को मिले।"


 

इस पुस्तक को पढ़ने के दौरान सबसे पहले दृष्टि जाती है कमलेश सक्सेना 'सहज' जी की कविताओं पर। जीवन की भावनाएं जिस रूप में इनकी कविताओं में समाहित हैं वह सहज ही आकर्षित करने की क्षमता रखती है। इस संकलन में इनकी कविताओं की शुरुआत 'माँ' कविता से होती है। माँ सृष्टि के निर्माण की सबसे पहली और प्रमुख कड़ी है। कमलेश सक्सेना जब लिखती है, "क्या लिखूं ? माँ के बारे में /माँ ने ही तो मुझे लिखा है/ ईश्वर का दूसरा रूप बस /माँ तुझ में ही तो दिखा है।"  तब यहाँ क्या लिखूँ माँ के बारे में, क्या लिखूँ यह सोच सहज ही इस पंक्ति में सब कुछ लिख जाती है। माँ शब्द ही अपरिमित है जिसको बांधने के लिए अभी तक कोई परिभाषा गढ़ा ही नहीं गया है। 

कमलेश जी की कविताओं में बुरे वक्त में भी जीवन के लिए एक नई आशा झलकती है। "बुनो सपने.../ कि इतना भयावह नहीं है वक्त /जो रोक सके सपनों को /सपनों से/ चौंकती है पराजय /जैसे चौंकता है अंधेरा /किरणों की आहट से।" एक दुनिया समानांतर में राजेंद्र यादव ने जिन कहानियों को मूल्यवान समझते हुए शामिल किया है उनमें राजकुमार की कहानी 'सेलर' भी शामिल है। यह कहानी व्यापक रूप से सपनों के जीवित रखने पर ही बल देती है। निःसंदेह सपनों का मरना मानव के मरने से कहीं अधिक घातक है। 

              जीवन-राग का वही भाव, वही उत्साह दिखता है उमाकांत त्रिपाठी 'निश्चल' जी की कविताओं में जब वे कहते हैं कि बुरे समय की घटाएं छट जाएगी जीवन में एक नया आलोक होगा, नया सवेरा आएगा। "बहारें थीं, बहारें हैं, बहारें फिर से आयेंगी /घुटन में दूर होगी यूँ, घटाएं छट भी जायेंगी।" इनकी कविताओं में कृषकों, मजदूरों के लिए जो पीड़ा है वह इनकी भावुकता को प्रकट करती है और बहुसंख्यक वर्ग से इन्हें जोड़ने का कार्य भी करती है। "मेरा नाता रहा, ना शीतल छांवों से /है काँटों से पहचान, जो चुभते पावों से।"

'गगन मंडप में सेज पिया की किस विधि मिलना होय।' यहाँ प्रेम निवेदन आत्मा का परमात्मा से हो या प्रेमी का प्रेमी से, जब तक एक दूसरे की ओर हाथ बढ़ाकर सहारा न दी जाए मिलना बड़ा कठिन रहता है। श्रीमती ममता खरे लिखती है, "नैया है मझधार, सुख का न आधार /आकर हाथ पकड़ लो, और लगा दो पार।" प्रेम और भक्ति का पारावार इस सृष्टि का आधार है। ममता खरे जी की कविता में ये दोनों ही रंग अत्यंत मनमोहक रूप में विद्यमान हैं। "राम नाम अति मीठा है, कोई गा के देख ले /आ जाते हैं राम कोई बुला के देख ले।" भक्ति का यह रंग और प्रेम की पराकाष्ठा कि, "इंतजार वफा का यूं हमने हर बार किया /क्या कहूं कितना तुमसे हमने प्यार किया।" कवि और कविता दोनों को अपूर्व सार्थकता प्रदान करते हैं। उनकी कविताओं से होकर पाठक कितनी भी जल्दी आगे निकलने की कोशिश कर ले लेकिन 'कजरी गीत' पर दृष्टि न जाए यह हो ही नहीं सकता। कितना सुंदर छंद बन पड़ता है जब कवियित्री लिखती है, "नैनों में अंजन हाथों में कंगना, कब आओगे मोरे अंगना।"       

         पर्यावरण विघटन के इस दौर में बसंत कोष्टी 'ऋतुराज' जी की कविता सहज ही अपनी सार्थकता सिद्ध करती है जब वे पर्यावरण और पेड़ों की महत्ता को सिद्ध करते हुए लिखते हैं, "स्वच्छ- सलोना- सुरभित- मुखरित पर्यावरण बनायें हम/ रहे वसुधा की धानी चूनर आओ पेड़ लगायें हम।" प्रकृति और प्रेम दोनों जब एक साथ मिलते हैं तब सहज ही आधुनिक हिंदी कविता का स्वर्ण युग 'छायावाद' आंखों के आगे मचल उठता है। आगे की कविताओं में ऐसा दिख पड़ा कि शायद यह स्वर्णिम युग कविता से बेदखल किया जा रहा हो। लेकिन ऋतुराज जी की कविताएं मन को आशा देती है की प्रकृति और प्रेम अभी भी हिंदी कविताओं में अपनी सुखद उपस्थिति दर्ज करने में सफल रहे हैं। प्रीत-संदेशा लेकर महकी, मंद-मंद पुरवाई है /सावन आया तुम न आयी, तेरी याद तुम्हारी आई है।"

साहित्य सदैव नूतन रूप में भावों को प्रस्तुत करता है। जिस कर्ण, कैकयी, मंथरा आदि को लेकर एक दूषित धारणा लोगों के मन में घर कर गयी थी उसे साहित्य में पुनर्सृजित कर एक नया रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य साहित्यकारों ने किया है। कर्ण को जिस रूप में रामधारी सिंह दिनकर ने सामने लाया या फिर कैकयी को जैसे नवीन रूप में केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' ने प्रस्तुत किया या मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा 'यह सच है तो लौट चलो घर को भैया, अपराधिन मैं हूँ राम तुम्हारी मैया।' उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 'श्रीमती अनीता शर्मा' लिखती हैं, "राम को राम बनाने की खातिर, /कैकयी-मंथरा ने दोष सहा।" निश्चित, किसी भी चीज को देखने का अलग-अलग पहलू होता है और इस रूप में देखा जाए तो राम का जीवन भी अन्य राजाओं की तरह एक नाम मात्र बनकर रह जाता संपूर्ण गाथा नहीं बन पाता अगर कैकई और मंथरा का प्रवेश उनके जीवन में नहीं होता। साहित्य और जीवन को देखने की यह नवीन दृष्टि निश्चय ही स्वागत योग्य है। अनीता शर्मा जी की कविताएँ मन पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं जब वे प्रेम-भाव की अभिव्यक्ति करती है। प्रेम की पराकाष्ठा है कि वह सदैव अपने प्रेमी को अपने पास रखना चाहता है। अनीता शर्मा जब लिखती है, "जब प्राण तन से निकले, तब पास तुम ही रहना/ आँखें मेरी खुली हो, पलकें तुम ही बंद करना।" तब यह भाव अंतःकरण को झकझोर जाता है। प्रेम की पराकाष्ठा मन को देर तक अपने आगोश में लिए हिलकोरे देता है। मानव जीवन में कल की चिंता सदैव मनुष्य के हाथ से आज को छीनने का काम करता रहा है। इस भाव की सुंदर अभिव्यक्ति 'आज फिसल गया' शीर्षक अपनी कविता में अनीता शर्मा जी ने किया है, "हम कल को संवारने में लगे कि,/ आज फिसल गया।/ हम बुन रहे थे भविष्य को कि/ आज निकल गया।"


वर्तमान हिंदी कविता में सार्थक उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं - डॉ रत्नेश्वर सिंह। उनकी कविताएं सहज ही अपनी ओर खींच लेने की क्षमता रखती हैं। उनका लेखन और कविता की प्रस्तुति तथा गीत के गायन सभी में उनकी मौलिकता छलकती है। वे किसी पथ का अनुसरण करने की जगह एक नए पथ के निर्माण में अधिक विश्वास रखते हैं। जीवन के हर भाव को अपने में समेटे उनकी कविता में प्रेम सर्वत्र विद्यमान है। वे प्रेम को कल्पना लोक के सहारे जीवन देने के बजाय धरती से स्पर्श कराकर उसकी जड़ों को मजबूत बनाने में विश्वास रखते हैं। वे लिखते हैं, "कल्पना लोक में नहीं रहता/ मेरे पास जीवन के /अपने अनुभव हैं/ पहाड़ है/ दरख़्त है/ जंगल है और /दुर्गम पगडंडियां हैं/ कंकरिले पथरीले /रास्ते हैं/ उन पर चलना हो तो आना/ बेशक मेरे पास।" रत्नेश्वर सिंह जी का प्रेम त्रिलोचन के प्रेम के समान है जो खेतों, खलिहानों में काम करते हुए पलता है न कि बाग-बगीचों और कल्पना लोक के विहार में। मनोविज्ञान के प्रोफेसर होने के नाते उन्होंने मनोभावों का सार्थक विश्लेषण करना भली प्रकार सीख रखा है। स्त्री मन को उन्होंने अनेक कविताओं में जिस बारीकी से चित्रित किया है वह प्रशंसनीय है। "मैं सोचता हूँ कि सही होते हुए भी/ वह क्यों मान लेती है खुद को गलत /क्या यही नियति है नारी की।" प्रेम के एहसास को डॉ सिंह सदैव गर्म रखना चाहते हैं, उसे ठंडा होने देना कवि को स्वीकार नहीं। जब तक जीवन है प्रेम की गर्माहट मौजूद रहे यह कामना सर्वत्र देखने को मिल जाती है। "आज भी हम उसी बरामदे में /दो कुर्सी वाले टेबल पर बैठकर/ पीते हैं चाय, बीच में रखी रहती है प्याली /निकलती रहती है उससे यादों की भाप।" रत्नेश्वर सिंह की कविताएं अपने सामाजिक सरोकार को लेकर विशेष रुप से आकर्षित करती हैं। समाज और सामाजिक समस्याओं को उन्होंने अपनी कविताओं में व्यापक रूप से पराश्रय दिया है। दहेज प्रथा को लेकर बहुत समय से एक परिवर्तन की गूंज सुनाई दे रही है लेकिन यह फिजाओं में गूंजने का क्या लाभ है जब धरातल पर उतरती नहीं दिख रही है। एक तरह से यह उस वैधानिक चेतावनी की तरह बनकर रह गया है जहाँ गुटखा के सेवन से कैंसर होने की वैधानिक चेतावनी देकर उसे बेचने में परहेज नहीं किया जाता है। "वैधानिक चेतावनी भी दी जाती है/ बार-बार बावजूद इसके /कोई न कोई रास्ता/ बना लेते हैं हम /दहेज के लिए।" रत्नेश्वर सिंह समाज में एक नए अभ्युदय का सपना साकार करना चाहते हैं जो सामाजिक समरसता पर आधारित हो। "अभ्युदय हो /एक ऐसे समाज का /जिसमें हम सभी लोग /एक दूसरे की समस्याओं /आशाओं आकांक्षाओं /के अनुरूप स्वयं को/ ढाल सकें।"  इस सुंदर समाज के निर्माण में वैसे तो कई रुकावटें हैं लेकिन सबसे बड़ी रुकावट भ्रष्टाचार है। जब तक भ्रष्टाचार की जड़ें नहीं काटी जाती तब तक समाज में समरसता का वास कतई संभव नहीं। "मगर क्या यह हकीकत नहीं है/ कि एक तरफ अन्न सड़ रहे हैं/ गोदामों में, दूसरी ओर जीवन के लाले हैं।"

मनोरमा शर्मा अपनी कविताओं में जीवन प्रेम को उत्सव के रूप में चित्रित करती हैं। जब प्रिय जीवन में समाता है तब जीवन का हर रंग खिल उठता है लेकिन प्रिय के जाने के बाद जीवन में कोई खुशी, कोई रंग बचा नहीं रह जाता। "प्रिय तुम सदा बसी थी मेरे मन में,/ फूल की तरह महकी मेरे तन में।/ तुमने किया खुद को मुझसे जुदा-/ अब कुछ नहीं बचा मेरे जीवन में।" (जुदाई) उनका मानना है कि आदमी जिस तरह से अपने चेहरे पर नकाब डालता जा रहा है उसमें बस आईना ही बचा है जो सच बोलता है, "सच है, आईना कभी झूठ नहीं बोलता,/ चेहरे के रहस्य को यह सदैव खोलता।" (आईना)

 बसंत श्रीवास्तव जी ने विभिन्न छंदों में रचना की है। दोहे, कुंडलियां, मुक्तक सभी बेजोड़ भाव से लवरेज हैं। वृद्धजन को आज का समाज एक बोझ की तरह देखते हुए उसे उतार फेंकना चाहता है। ऐसे में बसंत श्रीवास्तव इतना सटीक वर्णन करते हैं, "करे वृद्धों की सेवा सुत, भरोसा कर नहीं सकता।

 अगर न पास कुछ अपने, वो बोझा ढ़ो नहीं सकता।" (मुक्तक) उनकी रचनाओं में जीवन के प्रति गहरी आस्था है और यही आस्था जीवन के मर्म को समझने में सहायक सिद्ध होती है। जिंदगी और सांस की अंतिम परिणति को समझने से मनुष्य सदैव कतराता रहा है। उसे स्वीकारते हुए बसंत श्रीवास्तव जी लिखते हैं, "जिंदगी का न कोई भरोसा रहा,/ रुख सांसों का जाने कहां मोड़ दे।" (ज़िन्दगी का सफर)

रेखा मित्तल जी की कविताएं नए जीवन संदेश का स्वर मुखरित करती हैं। अवसाद के बादल के छटने का विश्वास उनकी कविताओं को विशेष प्राण देने का कार्य करते हैं, "छाए हैं बादल अवसाद के /यह दिन भी बीत जाएंगे /अपनी आशाओं के दीप जला /अच्छे दिन भी जल्दी आएंगे/ मैं हूं ना तेरे साथ..." (मैं हूँ ना तेरे साथ) वैसे तो पूरा पद ही नए विश्वास और उमंग से भरा है लेकिन इसमें 'मैं हूं ना तेरे साथ' विश्वास को और अधिक तीव्र करने का काम करता है। रेखा मित्तल जी की कविताओं में श्रृंगार की व्यंजना उदात्त रूप में स्थान स्थान पर मौजूद है। श्रृंगार के दोनों पक्ष बेजोड़ होने के बावजूद वियोग में एक अलौकिक रस की अनुभूति मिलती है। 

प्रियतम के आने की आस संजोए स्त्री जैसे-जैसे रात ढलते देखती है वैसे-वैसे उसकी उदासी बढ़ती जाती है और आशंकाओं का अंधकार हृदय में घर करने लगता है। कितना सुंदर बंद बन पड़ा है "शमा भी अब बुझने लगी /जलने लगा है मोरा जिया।" (मिलन की आस) दीया बुझना यानी शाम का रात में गहराते जाना और प्रियतम के आने की उम्मीद का कम होते जाना हृदय में बिरहाग्नि को जलाने का काम करता है।


क्रमश:


अमित कुमार मिश्रा 

अतिथि व्याख्याता, हिंदी विभाग, एच.एस.कॉलेज, उदाकिशुनगंज, (मधेपुरा) बिहार।


टिप्पणियाँ

  1. प्रसिद्ध कवि एवं समीक्षक प्रोफ़ेसर अमित कुमार मिश्रा जी ने काव्य सरिता साझा संकलन द्वितीय संस्करण भाग एक की अत्यंत सार्थक सारगर्भित समीक्षा की है, बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा।इस संकलन में प्रकाशित सभी रचनाकारों की रचना को पढ़ कर इतनी विस्तृत समीक्षा की गई है, यह प्रमाणित करता है की प्रोफेसर अमित कुमार मिश्रा कविता के मर्म को भली-भांति समझते हैं तथा उसी के आधार पर वे काव्य सरिता साझा संकलन द्वितीय संस्करण की समीक्षा किए हैं। बहुत-बहुत आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

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