संदेश

आवारा मसीहा की औपन्यासिकता

*पुस्तक पर बात* वैसे तो गुरुवर डॉ. कलानाथ मिश्र की पुस्तकों का अध्ययन मैं समय-समय पर करता रहा हूँ, किंतु इस समय उनकी पुस्तकों का अवलोकन एक लेख लिखने की दृष्टि से कर रहा हूँ। तो जाहिर बात है, थोड़ी सावधानी से चीजों को देखना पड़ रहा है। गुरुवर ने कविता, कहानी, आलोचना, जीवनी आदि साहित्य की अनेक विधाओं में लेखन किया है। अभी उनकी आलोचनात्मक कृति 'आवारा मसीहा' की औपन्यासिकता का अवलोकन कर रहा था। इस पुस्तक की भूमिका पढ़ते हुए अपने बारे में यह लिखा देखना कि इसकी पांडुलिपि तैयार करने में कुछ मेरी भी भूमिका रही है, इस पुस्तक के रचनाकाल (2015-16) की कुछ स्मृतियाँ ताजी कर गई। उन दिनों मैं स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष का छात्र था। यह आलोचनात्मक कृति बड़ी ही रोचकता के साथ लिखी गई है, जिसे पढ़ते हुए कहीं भी आलोचना पढ़ने जैसा नीरज प्रभाव मस्तिष्क ग्रहण नहीं करता है, एक रचनात्मक साहित्य पढ़ने जैसी रसात्मक अनुभूति होती है। इस पुस्तक में विष्णु प्रभाकर के द्वारा लिखे गए, महान साहित्यकार 'शरतचंद' की जीवनी 'आवारा मसीहा, पर विमर्श किया है। वैसे तो इस पुस्तक में अनेक संदर्भ उद्घाटित हैं लेकिन इ...

ग़ज़ल

 सितम ये मैं किस पर किए जा रहा हूँ यह किसके सजदे में झुका जा रहा हूँ जिसने नवाजा मुझे हर खुशी से  उसे गम के आंसू दिए जा रहा हूँ बसेरा था जिस शाख पर पंक्षियों का  उसे ही मैं तोड़े लिए जा रहा हूँ मिली थी जो रिश्तों की पूंजी करम से  उससे दामन छुड़ाकर कहाँ जा रहा हूँ  एक रोटी किसी को खिला न सका  खुद को खुदाया समझे जा रहा हूँ  इंसा तक तो खुद को बना ना सका हूँ देवताओं की होड़ में भागे जा रहा हूँ किसी की नजरों में अब तक बस न सका  मन की मंदिर में खुद को ढूंढता फिर रहा हूँ । । @ अमित कुमार मिश्र.

रामवृक्ष बेनीपुरी की पत्रकारिता का स्वरूप 

बिहार से पत्र-पत्रिकाओं के संपादन कला में निष्णात साहित्यकारों की सूची में 'रामवृक्ष बेनीपुरी' का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई दिलाई। उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाओं में तद्युगीन राजनैतिक चेतना भी मौजूद है और साहित्यिक क्षेत्र के तो वे श्लाघा पुरुष ही माने जाते हैं। उनके द्वारा संपादित 'तरुण भारत', 'किसान मित्र', 'युवक', 'कैदी', 'तूफान', 'बालक', 'चुन्नू मुन्नू', 'हिमालय', 'नई धारा', 'गोलमाल' जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अपनी सार्थक पहचान कायम की है। 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य की सेवा की तो युवक, कैदी, तूफान जैसे पत्र-पत्रिकाओं से भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई में योगदान भी दिया। जेल भी गए और 'किसान मित्र' जैसे पत्र के मार्फत कृषकों के हित की वकालत भी की। रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में भी विशिष्ट स्थान रखते ह...

पाँच ग़ज़लें

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 1 हर दफे एक नया सवाल लेकर आती है ज़िंदगी इतनी उलझने कहाँ से लाती है। मैं तो टूट कर बिखर जाता कब का नए सबेरे की आस मुझे जिलाए जाती है। है रात तो तैय है कि उजाला भी होगा  सूरज की उदासी मुझे डराए जाती है। तुम्हारे तीर से बचने की हुनर मालूम है मुझे बच कर करूँगा क्या यह सोच मुझे खाए जाती है। वह मेरा दोस्त है जो मेरे हारने की दुआ माँगता है दोस्तों की मासूमियत मुझे उलझाए जाती है। सूरज पर भरोसा रत्तीभर भी कम नहीं हुआ है ग्रहों की कुटिल मुस्कान मुझे सताए जाती है। 2 तुम्हारी ओर टकटकी लगाए रहती है दुनिया मुझे देखता ही कौन है यहाँ तुम्हारे सिवा।। तुम्हारे छूने भर से कहीं गंगा कहीं आब-ए-ज़मज़म बह निकला मेरे हिस्से में रखा ही क्या है इन आंसुओं के सिवा।। किसी ने दौलत चाही किसी ने चाहा तख़्त-ओ-ताज मैंने चाहा ही क्या है दीदार-ए-सनम के सिवा।। मैंने रास्ते पर निगाह जमाए रखी वह देखते रहे मंजिल की ओर  मैंने निगाहों में कुछ बसाया ही कहाँ यार की सूरत के सिवा।। दुनिया में कहां पैदा होते हैं सभी एक सा मुकद्दर लेकर 'अमित' किसी को वस्ल-ए-सनम मिला किसी को मिला ही क्या दर्द-ओ-ग़म के सिवा।। 3 वह इंसा...

बिहार की पत्रकारिता के आदि स्तंभ : बिहार बंधु प्रेस और खड्ग विलास प्रेस

बिहार की भूमि ने संस्कृति, राजनीति, शिक्षा, साहित्य सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधि की भूमिका निभायी है। पत्रकारिता का क्षेत्र भी अपवाद नहीं है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि से लेकर वर्तमान समय तक बिहार की अनेक पत्रिकाओं ने, हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में अक्षुण्ण उपस्थिति दर्ज कर रखी है। यह सही है कि बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत हिन्दी पत्रकारिता के आरम्भ होने के लगभग आधी सदी के बाद हुई। (हिन्दी का प्रथम पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' 1826, एवं बिहार का प्रथम पत्र 'बिहार बंधु' 1872 में प्रकाशित हुआ।) लेकिन एक बार आरम्भ होने के बाद बिहार की हिन्दी पत्रकारिता सदैव शीर्षस्थ की अधिकारिणी बनी रही।  इस आलेख में बिहार बंधु प्रेस और खड्ग विलास प्रेस की चर्चा की गई है। वैसे तो इन दोनों प्रेसों ने पत्रिका के अलावे अन्य कई उपयोगी पुस्तकों का प्रकाशन भी किया किंतु संदर्भवश इस आलेख में पत्रिकाओं की चर्चा ही अपेक्षित है। अपना स्वर्णिम इतिहास कायम करने वाली बिहार की पत्रकारिता का आगाज 'बिहार- बंधु' के प्रकाशन से हुआ। यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है कि कोलकाता से एक वर्ष प्रकाशन के बाद बिहार बं...

ग़ज़ल

  रूठ बैठा पिया मैं मनाऊँ कैसे  दिन-उजाले में उसको बुलाऊँ कैसे  सास-ननंद की ठिठोली सही जाए न  ओट चिलमन की उठकर हटाऊँ कैसे ठोकर जमाने की, हंसकर मैं सहती रही तेरी दिल्लगी पर मगर मुस्कुराऊँ कैसे  मैंने दिल की लगी की, तुमने की दिल्लगी दिल की बाजी में, दिल को लगाऊँ कैसे  कितना नासमझ है पिया समझता नहीं  हाल दिल की मैं अपने बताऊँ कैसे  दूर बैठा है रूठकर ओ किसी बात से  मैं इशारों में उनको बुलाऊँ कैसे ।। @ अमित कुमार मिश्रा  

जीवन का सतत प्रवाह

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 जीवन का सतत प्रवाह  ( 'काव्य सरिता' साझा काव्य संकलन (द्वितीय संस्करण) की समीक्षा, भाग 1) [किसी भी विधा के साझा संकलन में कई रचनाकारों की रचनाएं सम्मिलित होती है इसलिए इसकी समीक्षा कुछ जटिल है और समीक्षा का कलेवर विस्तृत हो जाना स्वभाविक है। अपनी सुविधा के लिए मैंने समीक्षित संकलन की समीक्षा दो भागों में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है जिसका प्रथम भाग आप सबों के समक्ष प्रस्तुत है। दूसरा भाग शीघ्र ही प्रेषित करने की चेष्टा करूँगा ।] जीवन सतत है और साहित्य भी। धरा पर जीवन के साथ सदैव साहित्य गतिशील रहा है। जिस समय का साहित्य हमारे पास उपलब्ध नहीं है उस समय भी जीवन की गति के साथ साहित्य वाचिक या अनुभूति-जन्य रूप में विद्यमान अवश्य रहा है। आज के समय में साहित्य का उत्तरदायित्व और बढ़ चला है, निश्चय ही वह कथन स्वयं सिद्ध हो रहा है कि 'जैसे-जैसे समाज पर विज्ञान हावी होता जाएगा वैसे-वैसे साहित्य की आवश्यकता उत्तरोत्तर बढ़ती जाएगी।' इसमें कोई संदेह नहीं की जीवन धीरे-धीरे यांत्रिक होता जा रहा है या यह भी अतिशयोक्ति नहीं कि यंत्र ने धीरे-धीरे जीवन को अपने नियंत्रण में ले लिया ह...