ग़ज़ल

 रूठ बैठा पिया मैं मनाऊँ कैसे 

दिन-उजाले में उसको बुलाऊँ कैसे 


सास-ननंद की ठिठोली सही जाए न 

ओट चिलमन की उठकर हटाऊँ कैसे


ठोकर जमाने की, हंसकर मैं सहती रही

तेरी दिल्लगी पर मगर मुस्कुराऊँ कैसे 


मैंने दिल की लगी की, तुमने की दिल्लगी

दिल की बाजी में, दिल को लगाऊँ कैसे


 कितना नासमझ है पिया समझता नहीं

 हाल दिल की मैं अपने बताऊँ कैसे 


दूर बैठा है रूठकर ओ किसी बात से 

मैं इशारों में उनको बुलाऊँ कैसे ।।


@ अमित कुमार मिश्रा  

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