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आचार्य शिवपूजन सहाय : भाषा और साहित्य संबंधी चिंतन (आलेख)

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  सीमा कुमारी   अतिथि व्याख्याता, हिन्दी विभाग,  बी.एस.एस. कॉलेज, सुपौल।  ईमेल- sss2seema@gmail.com  'आचार्य शिवपूजन सहाय' आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माताओं में गिने जाते हैं | उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को जो मधुर रुप दिया वह आगे आने वाले साहित्यकारों के लिए अनुकरणीय बन गया | आचार्य शिवपूजन सहाय हिंदी गद्य के विभिन्न विधाओं - कहानी, उपन्यास, निबंध आदि में लेखन कार्य कर अपनी एक महत्वपूर्ण पहचान स्थापित की | उन्होंने अनेक पुस्तकों का संशोधन तथा संपादन किया | उनकी भाषा-शैली और भाषागत शुद्धता ने हिंदी साहित्य के स्वरूप निर्माण में अद्वितीय कार्य किया | उन्होंने अपने समय की अनेक उत्कृष्ट पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी किया | पत्रिकाओं के संपादकीय में लिखे गये उनके विचार निबंध के रूप में आज भी चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं | विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने विविध विधाओं से संदर्भित निबंध लेखन भी किया | उनके निबंधों एवं पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय में हिंदी भाषा और साहित्य विषयक उनके चिंतन उपलब्ध हैं जो आज भी हिंदी भाषा और साहित्य के विकास की दिशा में प्रासंगिक ...

आचार्य शिवपूजन सहाय के निबंधों में पत्रकारिता का स्वरूप (आलेख)

 अमित कुमार मिश्रा  आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकारों के होने से ही किसी भी भाषा और साहित्य को विश्व स्तरीय ख्याति प्राप्त होती है | आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपने समय की पत्रकारिता को समग्रता से प्रभावित तो किया हीं, उसके स्वरूप निर्धारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | वे कई साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन-कार्य से जुड़े रहे | कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संशोधन, संपादन भी उन्होंने किया | अपने समय की पत्रकारिता के प्रति वे वैसे ही सजग रहें, जैसे भाषा और साहित्य के प्रति | आज जिस तरह की पत्रकारिता की जा रही है उसे आचार्य शिवपूजन सहाय के पत्रकारिता संबंधी मतों से मांज कर चमकाया जा सकता है और पत्रकारिता पर लगे हुए कलंक को धोया जा सकता है | अपने समय में निकलने वाले दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, हर तरह के पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप, भाषा-शैली, छपाई, शुद्धि, सामाजिक सरोकार आदि पर आचार्य शिवपूजन सहाय ने गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन किया है | बिहार से निकलने वाली पत्रिकाओं के स्वरूप पर विचार करते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय ने जो लिखा वह न सिर्फ उस समय प्रासंगिक था बल्कि...

हिंदी साहित्य की पत्रकारिता के शिखर पुरुष : आचार्य शिवपूजन सहाय (आलेख)

-अमित कुमार मिश्रा                                       'आचार्य शिवपूजन सहाय' हिंदी साहित्य में तो अपना विशेष महत्व रखते ही हैं, हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को पहचान दिलाने में भी उनका विशिष्ट स्थान है | बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता को प्रतिष्ठित करने वाले पत्रकारों में उनका सर्वश्रेष्ठ स्थान है | जिस समय आचार्य शिवपूजन सहाय का पदार्पण पत्रकारिता जगत में हुआ, उस समय हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता अपना शैशवावस्था पूर्ण कर चुकी थी | 20 वीं सदी का आरंभिक चरण हीं सरस्वती, हंस, जागरण, मतवाला, माधुरी जैसी प्रौढ़ पत्रिकाओं से सुशोभित हो चुका था | इस दौर में हिंदी साहित्य से अनेक कोंपले फूट रही थी | हिंदी साहित्य के स्वरूप निर्धारण, भाषा का परिमार्जित रूप, साहित्य लेखन की दिशा निर्धारण, सभी का उत्तरदायित्व प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादकों के कंधों पर था | ऐसे ही दौर में पत्रकारिता जगत में आचार्य शिवपूजन सहाय ने कदम रखा | संभवतः उन्होंने 'मारवाड़ी-सुधार' से 1921 ई० में पत्रकारिता की शुरुआत की |...

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

- सीमा कुमारी  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (तदर्थ), हिन्दी विभाग  बी.एस.एस. कॉलेज, सुपौल।  संपर्क - 8507474110, sss2seema@gmail.com  स्त्री अस्मिता से जुड़े महाकाव्यों में उन महाकाव्यों की चर्चा की जा सकती है जिसमें स्त्री के आत्मगौरव, उसके अधिकार, उसकी सामाजिक चेतना, उसकी राजनैतिक स्थिति और उसके आत्म-वेदना का यथार्थ का वर्णन किया गया हो | हिंदी साहित्य में आदिकाल स्त्रियों की दशा को लेकर सर्वाधिक कुत्सित रहा है | इसमें सिर्फ साहित्य को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि साहित्य समाज सापेक्ष होता है और तदयुगीन समाज वैसा ही था, जहां स्त्रियों को भोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझा जाता था |  स्त्रियों के साथ समुचित न्याय भक्तिकालीन साहित्य भी नहीं कर सका | वहां या तो स्त्री को नर्क का दरवाजा बना दिया गया या फिर स्वर्ग की देवी | उसका वास्तविक स्थान उसे यहां भी प्राप्त नहीं हो सका | भक्तिकालीन साहित्य में कृष्णभक्ति शाखा में गोपिकाओं का वर्णन अवश्य ध्यान आकर्षित करता है, जहां न सिर्फ गोपिकाओं के प्रेम का सूक्ष्म निरूपण किया गया है अपितु उसे कई तरह की आजादी भी दी गई है | कृष्ण से...