आचार्य शिवपूजन सहाय के निबंधों में पत्रकारिता का स्वरूप (आलेख)
अमित कुमार मिश्रा
आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकारों के होने से ही किसी भी भाषा और साहित्य को विश्व स्तरीय ख्याति प्राप्त होती है | आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपने समय की पत्रकारिता को समग्रता से प्रभावित तो किया हीं, उसके स्वरूप निर्धारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | वे कई साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन-कार्य से जुड़े रहे | कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संशोधन, संपादन भी उन्होंने किया | अपने समय की पत्रकारिता के प्रति वे वैसे ही सजग रहें, जैसे भाषा और साहित्य के प्रति | आज जिस तरह की पत्रकारिता की जा रही है उसे आचार्य शिवपूजन सहाय के पत्रकारिता संबंधी मतों से मांज कर चमकाया जा सकता है और पत्रकारिता पर लगे हुए कलंक को धोया जा सकता है | अपने समय में निकलने वाले दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, हर तरह के पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप, भाषा-शैली, छपाई, शुद्धि, सामाजिक सरोकार आदि पर आचार्य शिवपूजन सहाय ने गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन किया है |
बिहार से निकलने वाली पत्रिकाओं के स्वरूप पर विचार करते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय ने जो लिखा वह न सिर्फ उस समय प्रासंगिक था बल्कि आज भी उसकी प्रासंगिकता जस-की-तस बनी हुई है | उन्होंने लिखा था -
"बिहार के हिन्दी पत्रों की दशा किसको मालूम नहीं है | सब लोग जानते हैं कि बिहार के हिन्दी पत्र कैसे अच्छे निकलते हैं | दुनिया में देखा-देखी उन्नति भी होती है, प्रतिद्वंदिता का भाव जोर पकड़ता है, पर बिहार के पत्र तो दूसरे को सरपट दौड़ते देखे दुलकी भी नहीं | न टाइप साफ, न छपाई शुद्ध, न भाषा आकर्षक, न विराम-चिन्हों का ठिकाना, न विषयों का चुनाव ठीक, न सामग्री-संकलन सुन्दर - यूं ही यत्र-तत्र लेख और संवाद बिखरे पड़े हैं, मानों इधर-उधर का कूड़ा बटोर कर एक जगह रख दिया हो |" 1
स्पष्ट तौर पर हम देख सकते हैं कि आचार्य शिवपूजन सहाय पत्रकारिता के प्रति कितने सतर्क थे | किसी भी रचना को उठाकर जैसे-तैसे पत्रिका में प्रकाशित मात्र कर देने से पत्रकारिता की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है | आज भी अधिकांश पत्रिकाओं में यह सहज ही देखने को मिल जाता है कि कुछ भी लिख कर भेज दी गई हो यदि वह टूटी-फूटी भाषा में भी हो तब भी उसे बगैर पढ़े, बगैर संशोधित किए छाप दी जाती है | आचार्य सहाय की दृष्टि सिर्फ साहित्यिक पत्रिकाओं पर ही नहीं जमी थी बल्कि वह दैनिक पत्रों की भी समीक्षा किया करते थे | उनका मानना था कि पत्र-पत्रिकाओं की भाषा से समाज को भाषा सीखने में, अर्जित करने में काफी मदद मिलती है | इसलिए उनकी भाषा परिमार्जित होनी आवश्यक है | अपने समय में निकलने वाले बिहार की पत्रिकाओं को देखकर उन्हें काफी दुःख पहुंचता था | उनके दुःख का कारण यही था कि पत्रिकाओं की छपाई स्पष्ट नहीं थी और भाषा के स्वरूप पर भी ध्यान नहीं दिया जाता था |
"बिहार के हिन्दी पत्रों की दशा देखकर बड़ा क्षोभ, बड़ी ग्लानि और लज्जा होती है | पहले तो बिहार में कई अच्छे थे, पर अभाग्यवश वे सदा चल ना सकें |" 2
उनका मानना था कि कितना भी सुंदर लिखा गया हो, पत्र-पत्रिका यदि उसे करीने से सजाकर प्रस्तुत नहीं कर पा रही है तो निश्चित रूप से वह साहित्य पाठक पर अपना संपूर्ण प्रभाव डालने में सफल नहीं हो सकेगा | इसके लिए जरूरी है कि बार-बार पाठ का संशोधन, परिमार्जन कुशल व्यक्ति के द्वारा किया जाए और छपाई की भूलें कम से कम हो | 'हिन्दी के दैनिक पत्र' शीर्षक निबंध में उन्होंने लिखा है -
"अच्छे से अच्छे लेख, उत्तमोत्तर टिप्पणियां, बढ़िया से बढ़िया समाचार और आवश्यक से आवश्यक चित्र भी अगर साफ-सुथरे न छपें - धुंधले अक्षर हो - टूटे-फूटे और उल्टे सीधे टाइप लगे हो - पांत-की-पांत बीच में से गायब हो - अक्षरों और मात्राओं में पूर्ण सहयोग हो, तो संपादन-संबंधी सारा परिश्रम व्यर्थ है |" 3
यहां स्पष्ट तौर पर आचार्य शिवपूजन सहाय संपादन-कर्म के सभी दायित्वों को उजागर कर देते हैं | किसी भी रचना का संपादन इतना सहज नहीं होता है कि उसे सीधे टाइप कर के छाप दिया जाए | संपादन-कर्म की जिन बारीकियों को आचार्य शिवपूजन सहाय ने यहां उल्लेखित किया है उसकी आवश्यकता उस समय की पत्रकारिता से कहीं अधिक आज की पत्रकारिता को है | अंग्रेजी के अखबार 'स्टेट्समैन और पायनियर' का उदाहरण वे बार-बार दिया करते थे | उनकी प्रबल इच्छा थी कि हिन्दी में भी वैसे हीं शुद्ध और परिमार्जित भाषा में पत्रों का प्रकाशन हो तभी हिन्दी भाषा परिष्कृत और परिमार्जित हो सकेगी | उनकी चिंता, भाषा के स्वरूप को लेकर सदैव बनी रही थी | उन्होंने लिखा है -
"स्टेट्समैन और पायनियर के विज्ञापनों तक में बिन्दु-विसर्ग की गलती नहीं पाई जाती, तो हम भी क्यों न ऐसी चेष्टा करें कि हमारे हिन्दी पत्रों में भी वैसी ही शुद्धता रहे |" 4
अब यह देख कर खुद ही विचार करने वाली बात है कि कहां हमारी भाषा का एक साधक यह चाहता था कि हमारे पत्रों में छपने वाले विज्ञापन तक परिष्कृत भाषा और प्रभावशाली शब्दों में छपे और कहां उसी भाषा और साहित्य की ऐसी दुर्गति हो चली है कि पूरा-का-पूरा अखबार हिन्दी और अंग्रेजी के काम चलाऊ शब्दों से भर दिया जाता है | ऐसा नहीं है कि शिवपूजन सहाय पत्र-पत्रिकाओं की दशा और उसके स्वरूप पर आलोचना करते थे ; टीका-टिप्पणी लिखते थे और उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता हो | साहित्य का वह दौड़ ही ऐसा था की पत्र-पत्रिकाओं के संचालन-संपादक आलोचकों का सम्मान करते थे और उनके द्वारा सुझाए गए कमियों को दूर करने का प्रयत्न करते थे | एक उदाहरण से यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि कैसे शिवपूजन सहाय की आलोचना के बाद पत्रिकाओं की दशा में सुधार किया गया था |
1927 ई० में आचार्य शिवपूजन सहाय ने साप्ताहिक 'हिन्दू-पंच' में अपने लिखे लेख 'बिहार के हिन्दी पत्र' में लिखा था -
"राजेन्द्र बाबू के चरणरेणु-कण भी शिरोधार्य करने की पात्रता मुझमें नहीं है, फिर भी निर्भय होकर कहे बिना रहा नहीं जाता कि 'देश' के संपादन से बिहार के साप्ताहिक गौरव की रक्षा नहीं हो रही है | और राजनीतिक जागृति के काम में भी वह अपनी श्रेणी के प्रतिष्ठित पत्रों में पिछड़ा हुआ है | यदि राजेन्द्र बाबू चाहे तो यू•पी के 'प्रतापी' प्रताप की तरह 'देश' को भी बिहार की एक जबरदस्त संस्था बना सकते हैं |" 5
अब इसी के साथ एक दूसरे कथन पर दृष्टि डालनी होगी, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि आचार्य सहाय की उक्त आलोचना के बाद उस पत्र के स्वरूप में क्या परिवर्तन लक्षित हुआ | स्वयं आचार्य शिवपूजन सहाय ने 1931 में 'हिंदी के साप्ताहिक पत्र' शीर्षक से 'हंस' में लिखे गए अपने आलेख में यह स्वीकार किया कि -
"जब से वर्मा जी (बाबू बद्रीनाथ वर्मा) संपादक हुए हैं, तब से 'देश' की दुर्दशा का अंत हो गया है | इस तरह 'देश' बड़े सराहनीय ढंग से संपादित हो रहा है, छपाई-सफाई भी अच्छी है ; केवल प्रूफ-संशोधन की कुछ त्रुटियां अब तक रह गयी हैं, जिनके कारण कभी-कभी भाषा-संबंधी भूलों का संदेह भी उत्पन्न हो जाता है |" 6
इन दोनों कथनों को एक साथ मिलाकर देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने पहले वाले लेख में 'देश' पत्रिका की खामियों की ओर इशारा किया था, उनमें काफी हद तक सुधार किया गया | और विशेष प्रशंसनीय तो यह है कि दूसरे लेख में भी आचार्य शिवपूजन सहाय ने उन सुधारों की प्रशंसा करने के साथ ही जो त्रुटियां विद्यमान रह गई थी उस ओर इशारा करने में कोताही नहीं की | मजे की बात यह है कि जिस 'देश' की आलोचना आचार्य शिवपूजन सहाय ने इतनी खुलकर की ; कई लेखों में की, उसके संचालक तत्कालीन राजनीति के प्रभावशाली व्यक्तित्व स्वयं डॉ राजेन्द्र प्रसाद थें | इससे उस समय की पत्रकारिता और आलोचना के स्तर का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है |
पत्र-पत्रिकाओं के क्षेत्र में शिवपूजन सहाय के समय का हिन्दी जगत काफी समृद्ध रहा है | लेकिन उन पत्र-पत्रिकाओं में एक ऐसी पत्रिका की आवश्यकता आचार्य शिवपूजन सहाय बड़े व्याकुलता से महसूस कर रहे थे जो अपने समय के पत्र-पत्रिकाओं की समीक्षा करते हुए उसके गुण-दोष को समान रूप से तटस्थ होकर उजागर कर सके |
"हिन्दी संसार में पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बहुत अधिक है | उस संख्या के कभी न्यूनता भी होती है तो शीर्ष ही नयी वृद्धि से उसकी पूर्ति हो जाती है | इसलिए पत्र-पत्रिकाओं का संख्या-बल कभी विशेष घटने नहीं पाता | ऐसी स्थिति में एक ऐसे स्वतंत्र साप्ताहिक पत्र की आवश्यकता अनुभूति होती है, जो प्रति सप्ताह सभी पत्र-पत्रिकाओं की गतिविधि का निरीक्षण-परीक्षण करता रहे |" 7
इसके साथ ही आचार्य शिवपूजन सहाय ने इस तथ्य पर भी बल दिया कि यह कार्य सरल नहीं है | ऐसा स्वीकारने के पीछे यह कारण उनके सामने स्पष्ट रहा कि अपने समकालीन पत्र-पत्रिकाओं के दोष को उजागर करना सरल कार्य नहीं है | लेकिन आचार्य सहाय बड़े से बड़े प्रभावशाली पत्र-प्रकाशकों के पत्रों की आलोचना कर यह भी साबित कर दिया कि यह कार्य जितना भी कठिन हो नामुमकिन नहीं है | हां, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि उस समय की परिस्थिति ने उन्हें इतना बल दिया था कि 'देश' जैसे पत्र की आलोचना करने से भी वे नहीं चूके, जिसके प्रकाशन का दायित्व स्वयं डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के हाथों में था | डॉ० राजेन्द्र प्रसाद एक तो भारतीय राजनीति के इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व और उस पर आचार्य शिवपूजन सहाय उनके कृपापात्र | आज के समय में किसी पत्र-पत्रिका की आलोचना कहीं देखने को मिलती ही नहीं है | इस कार्य को शिवपूजन सहाय कठिन तो मानते ही हैं लेकिन कठिन से ज्यादा दायित्व-पूर्ण भी |
"सामयिक साहित्य का तात्पर्य यहां आधुनिक पत्र-पत्रिकाएं है | पत्र-पत्रिकाओं की गति-विधि का निरीक्षण-परीक्षण करना बहुत कठिन काम है | कठिन ही नहीं, संकटापन्न और भयावह भी है - दायित्वपूर्ण तो है ही |" 8
आचार्य सहाय ने कई जगहों पर यह इंगित किया है कि स्तरहीन पत्र-पत्रिकाएं राष्ट्रभाषा के विकास में अवरोधक है | इससे साहित्य की महत्ता घटती है और पाठकों तक गलत शिक्षा का प्रभाव भी फैलता है | इसलिए पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में बहुत अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है |
"कुछ पत्र-पत्रिकाओं को देखकर मन में सहसा यह भाव उदित होता है कि उसका अस्तित्व अनावश्यक है - ये राष्ट्रभाषा के कलंक हैं |"
हर युग में स्कूल-कॉलेजों से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं का बहुत अधिक महत्व रहा है | ये पत्र-पत्रिकाएं अनेक प्रतिभाओं को उभरने का अवसर प्रदान करते रहे हैं | प्रायः अनेक प्रतिभा-संपन्न साहित्यकारों के विषय में यह सुनने को मिल जाता है कि उनकी अमुक पहली रचना विद्यालय/महाविद्यालय की पत्रिका में छपी थी | उनके महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा -
"इन सब पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त हाई-स्कूलों और कॉलेजों से निकलने वाले मासिक और त्रैमासिक पत्रों में भी हिन्दी-विभाग की रचनाएं देखने से पता लगता है कि अनेक होनहार लेखक और कवि भविष्य के लिए तैयार हो रहे हैं |" 9
आचार्य शिवपूजन सहाय के निबंधों और विभिन्न पत्रिकाओं के संपादकीय लेखों के अवलोकन से यह स्पष्ट पता चलता है कि वे जितने चिंतित राष्ट्रभाषा और हिन्दी साहित्य के विकास को लेकर थे, उससे कम पत्र-पत्रिकाओं को लेकर भी नहीं | उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं की महत्ता को समझा | यह महसूस किया कि साहित्य और भाषा के निर्माण में उसकी कितनी बड़ी भूमिका होती है | यही कारण है कि वे अपने समय की पत्र-पत्रिकाओं की सतर्कतापूर्वक समीक्षा करते रहे | उसके गुण और दोषों को उजागर करते रहे | जिससे की पत्र-पत्रिकाओं का स्वरूप निखारा जा सके | पूरे हिन्दी साहित्य में इस तरह का कार्य आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे कुछ विरले साहित्यकारों ने ही किया है |
संदर्भ सूची :
1. सहाय, शिवपूजन - बिहार के हिन्दी पत्र, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.-315.
2. वहीं।
3. सहाय, शिवपूजन - हिन्दी के दैनिक पत्र, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.-322.
4. वहीं, पृ.-323
5. सहाय, शिवपूजन - बिहार के हिन्दी पत्र, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.-316.
6. सहाय, शिवपूजन - हिन्दी के साप्ताहिक पत्र, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.-331.
7. सहाय, शिवपूजन - हमारे सामयिक साहित्य की गतिविधि, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.-336.
8. वहीं।
9. सहाय, शिवपूजन - बिहार की साहित्यिक प्रगति, शिवपूजन रचनावली, (तीसरा खण्ड)- संपादक, शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, नवीन संस्करण 2014 विक्रमाब्द, पृ.- 270.
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