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सच को छुपाया गया है (ग़ज़ल)

सरासर झूठ है जो अखबार में दिखाया गया है  ऐहतियातन आवाम से सच को छुपाया गया है। अंधेरों  के  सौदागर  खड़े  हैं  चारों  ओर फूंक  मारकर  दीये  को  बुझाया  गया  है। खत  में  तो  बुलावे  का  जिक्र   ही   बस   था  क्या पता किस इरादे से बज़्म में बुलाया गया है। आंसुओं  का  जज्बात  से  बड़ा गहरा नाता है  कुछ  तो  राज  है जो सिने में दफनाया गया है। लफ्जों  की  अदाकारी  पर  भरोसा  क्यूँ न हो मुस्कुराकर,  गले  पर  खंजर  घुमाया  गया है। फिर  से  उसके  बहकावे  में  आ गए 'अमित' प्यास  भड़काकर  पानी  छलकाया  गया  है।

अलविदा (कविता)

तुम जा रहे हो ? हां, तो फिर जाओ न चुपके से आधी रात को यूं विदा लेने क्यों आ पहुंचे ? तुम्हारे कदम थके-थके से जान पड़ते हैं कहीं तुम अपनी करतूतों से शर्मिंदा तो नहीं हो ? हां, भाई जानता हूं कष्ट खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी तुमने पर भूल जाओ उसे सुख भी तो अपार दिए हैं तुमने । अब आंसू मत बहाओ जाना है, चुपचाप चले जाओ ।  तुम्हारा आना भी अजीब था, आधी रात को चले आए थे चुपचाप तेज हवा से कैलेंडर फड़फराया और तुम चुपके से घुस बैठे मुझे सोता जान । और आज फिर आधी रात को नींद से जगाने चले आए हो मुझे । फिर कभी आकर ले जाना अपना हिसाब तुमने कितने दुख दिए और सुख कितना यह लिखकर तो नहीं रखा है मैंने हां, इतना कह सकता हूं जैसी कटी, अच्छी कटी । अच्छा रुको ! किस रास्ते से जाओगे ? याद है न उधरवालों को खूब सताया है तुमने जाते-जाते चुपके से बिना आहट किए चंद कतरें लुढ़का जाना उनकी ओर । फटी लिहाफ हटाकर धीरे से देख लेना उनके मुरझाए चेहरों को । और हां, रास्ते में मिलेगा तुमसे वह नव-आगंतुक उससे कहना, चुपचाप आए ज्यादा इठलाए नहीं अनगिनत लोग ऐसे हैं जिनके जख्म सूखे नहीं हैं...