अलविदा (कविता)

तुम जा रहे हो ?
हां, तो फिर जाओ न
चुपके से
आधी रात को यूं विदा लेने क्यों आ पहुंचे ?
तुम्हारे कदम थके-थके से जान पड़ते हैं
कहीं तुम अपनी करतूतों से शर्मिंदा तो नहीं हो ?
हां, भाई जानता हूं
कष्ट खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी तुमने
पर भूल जाओ उसे
सुख भी तो अपार दिए हैं तुमने ।
अब आंसू मत बहाओ
जाना है, चुपचाप चले जाओ ।
 तुम्हारा आना भी अजीब था,
आधी रात को चले आए थे चुपचाप
तेज हवा से कैलेंडर फड़फराया
और तुम चुपके से घुस बैठे
मुझे सोता जान ।
और आज फिर आधी रात को
नींद से जगाने चले आए हो मुझे ।

फिर कभी आकर ले जाना अपना हिसाब
तुमने कितने दुख दिए और सुख कितना
यह लिखकर तो नहीं रखा है मैंने
हां, इतना कह सकता हूं
जैसी कटी, अच्छी कटी ।

अच्छा रुको !
किस रास्ते से जाओगे ?
याद है न उधरवालों को खूब सताया है तुमने
जाते-जाते चुपके से
बिना आहट किए
चंद कतरें लुढ़का जाना उनकी ओर ।
फटी लिहाफ हटाकर
धीरे से देख लेना उनके मुरझाए चेहरों को ।
और हां,
रास्ते में मिलेगा तुमसे वह नव-आगंतुक
उससे कहना, चुपचाप आए
ज्यादा इठलाए नहीं
अनगिनत लोग ऐसे हैं
जिनके जख्म सूखे नहीं हैं जो तुमने दिए हैं ।
उससे (नव-आगंतुक) कहना,
हो सके तो उनके जख्मों को सहला दे ज़रा ।
अच्छा अब जाओ ...
अलविदा !

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