पाँच ग़ज़लें
1 हर दफे एक नया सवाल लेकर आती है ज़िंदगी इतनी उलझने कहाँ से लाती है। मैं तो टूट कर बिखर जाता कब का नए सबेरे की आस मुझे जिलाए जाती है। है रात तो तैय है कि उजाला भी होगा सूरज की उदासी मुझे डराए जाती है। तुम्हारे तीर से बचने की हुनर मालूम है मुझे बच कर करूँगा क्या यह सोच मुझे खाए जाती है। वह मेरा दोस्त है जो मेरे हारने की दुआ माँगता है दोस्तों की मासूमियत मुझे उलझाए जाती है। सूरज पर भरोसा रत्तीभर भी कम नहीं हुआ है ग्रहों की कुटिल मुस्कान मुझे सताए जाती है। 2 तुम्हारी ओर टकटकी लगाए रहती है दुनिया मुझे देखता ही कौन है यहाँ तुम्हारे सिवा।। तुम्हारे छूने भर से कहीं गंगा कहीं आब-ए-ज़मज़म बह निकला मेरे हिस्से में रखा ही क्या है इन आंसुओं के सिवा।। किसी ने दौलत चाही किसी ने चाहा तख़्त-ओ-ताज मैंने चाहा ही क्या है दीदार-ए-सनम के सिवा।। मैंने रास्ते पर निगाह जमाए रखी वह देखते रहे मंजिल की ओर मैंने निगाहों में कुछ बसाया ही कहाँ यार की सूरत के सिवा।। दुनिया में कहां पैदा होते हैं सभी एक सा मुकद्दर लेकर 'अमित' किसी को वस्ल-ए-सनम मिला किसी को मिला ही क्या दर्द-ओ-ग़म के सिवा।। 3 वह इंसा...