बिहार की पत्रकारिता के आदि स्तंभ : बिहार बंधु प्रेस और खड्ग विलास प्रेस

बिहार की भूमि ने संस्कृति, राजनीति, शिक्षा, साहित्य सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधि की भूमिका निभायी है। पत्रकारिता का क्षेत्र भी अपवाद नहीं है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि से लेकर वर्तमान समय तक बिहार की अनेक पत्रिकाओं ने, हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में अक्षुण्ण उपस्थिति दर्ज कर रखी है। यह सही है कि बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत हिन्दी पत्रकारिता के आरम्भ होने के लगभग आधी सदी के बाद हुई। (हिन्दी का प्रथम पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' 1826, एवं बिहार का प्रथम पत्र 'बिहार बंधु' 1872 में प्रकाशित हुआ।) लेकिन एक बार आरम्भ होने के बाद बिहार की हिन्दी पत्रकारिता सदैव शीर्षस्थ की अधिकारिणी बनी रही। 

इस आलेख में बिहार बंधु प्रेस और खड्ग विलास प्रेस की चर्चा की गई है। वैसे तो इन दोनों प्रेसों ने पत्रिका के अलावे अन्य कई उपयोगी पुस्तकों का प्रकाशन भी किया किंतु संदर्भवश इस आलेख में पत्रिकाओं की चर्चा ही अपेक्षित है।

अपना स्वर्णिम इतिहास कायम करने वाली बिहार की पत्रकारिता का आगाज 'बिहार- बंधु' के प्रकाशन से हुआ। यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है कि कोलकाता से एक वर्ष प्रकाशन के बाद बिहार बंधु का प्रकाशन पटना से किया जाने लगा। इस दौरान पटना स्थापित होने के बाद भी बिहार बंधु के कुछ अंक कोलकाता से ही मुद्रित करवाए गयें लेकिन इसमें समय और धन दोनों के अधिक व्यय होने के कारण पटना में ही बिहार बंधु प्रेस की स्थापना की गई। बिहार बंधु प्रेस की स्थापना महाराष्ट्र से बिहार में आकर बसे भट्ट परिवार के द्वारा की गई थी। इसकी स्थापना के संदर्भ में डॉ. कृष्णानंद द्विवेदी ने लिखा है, "महाराष्ट्र से आकर बिहार शरीफ में बसे भट्ट परिवार के सदुद्योग से 1873 ई के उत्तरार्ध में इस प्रेस की स्थापना पटना में हुई। पटना कॉलेज भवन के पास एक कच्चे खपरैल मकान में इसकी आरंभिक नींव रखी गई। लेकिन जब 1920 ई में वर्तमान पटना कॉलेज भवन की आधारशिला रखी जाने लगी तो वहाँ से हटकर यह कुनकुन सिंह लेन में चला गया।" [1] किसी भी चीज की शुरुआत जहां से होती है तब उसके बाद तो कई कड़िया उसमें जुड़ती जाती है लेकिन पूर्व की कड़ी नहीं होने के कारण आरंभ में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बिहार में जिस समय बिहार बंधु प्रेस की स्थापना हुई उस समय तक प्रेस से संबंधित किसी कामकाज में दक्ष व्यक्ति न होने के कारण इस प्रेस को संभालने के लिए पूरे भट्ट परिवार को इसमें लगना पड़ा। कमला प्रसाद वर्मा का संदर्भ देते हुए कृष्णानंद द्विवेदी ने लिखा, "भट्ट बंधुओं (मदनमोहन भट्ट, केशव राम भट्ट, बालमुकुंद भट्ट) के प्रेस संबंधी अदम्य उत्साह की प्रशंसा करते हुए कमला प्रसाद वर्मा ने लिखा है, उस समय तक बिहार में न तो कंपोजिटर थे, न ही प्रूफ्र रीडर। सो, उन्होंने अपने परिवार को यह काम सिखलाया और घर के स्त्री बच्चों तक को इस कार्य में शामिल किया।"[2]

आरम्भिक दो वर्षों तक कलकत्ता से निकलने वाले इस पत्र की शुरूआत विद्वानों ने 1872 ई. से स्वीकार किया है। बिहार बंधु का प्रकाशन 1872 ई. से मानने वाले विद्वानों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी आदि का नाम शामिल है। जबकि डॉ. वासुदेवनंदन प्रसाद ने इसका प्रकाशन 1873 ई. से प्रमाणित किया है। यह पत्र पहले वर्ष में कलकता से निकला और उसके बाद पटना से। कलकत्ता से पटना स्थानांतरित होने के पूर्व कुछ समय (एक वर्ष या कम ही) बिहार बंधु के बिहार-शरीफ से निकलने की तरफ भी कुछ विद्वानों ने इशारा किया है मगर यह तथ्य पुष्ट नहीं हो सका है।

बिहार बंधु के पहले संपादक के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी इसके आदि संपादक केशवराम भट्ट को मानते हैं जबकि बालमुकुन्द गुप्त पं. दामोदर शास्त्री को मानते हैं। वहीं रामशरण पीतलिया ने बिहार बंधु का प्रथम संपादक मुंशी हसनअली को माना है-

"किन्तु 1884 के प्रकाशित बिहार-बन्धु के अंकों को देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मुंशी हसनअली इसके आदि सम्पादक थे।"[३] 

डॉ. पीतलिया ने बिहार-बंधु के संपादकों की सूची 'हिंदी की कीर्तिशेष पत्र-पत्रिकाएँ' नामक अपनी पुस्तक में प्रकाशित की है जो साभार उधृत कर रहा हूँ।

पं. केशवराम भट्ट -1875-78

पं. दामोदर शास्त्री -1878-80

पं. केशवराम भट्ट -1880-87

श्री रामप्रसाद दिलशान 1887-88

पं. केशवराम भट्ट - 1888 - 97 (इस बीच 1887 से 1903 तक प्रकाशन बंद रहा।)

पं. शिवनन्दन त्रिपाठी - 1903 - 05

नन्द कुमार देव शर्मा - 1905 - 07

महावीर प्रसाद गहमरी - 1907 -11

कमलाप्रसाद वर्मा -1912

गोवर्धनलाल - 1913

गिरिजा कुमार घोष -1913

पाठक प्रमोद शरण शर्मा - 1922 - 24

उक्त सूची के आधार पर आंकलन करे तो बिहार बंधु का प्रकाशन 1972 से शुरू होकर 1924 तक होता रहा यानी कुल 52 वर्ष की अवधि तक। इस मध्य इसका प्रकाशन बीच-बीच में कई बार स्थगित भी हुआ। डॉ. पीतलिया ने माना है कि बीच में रूक-रूक का बिहार बंधु कुल 37 वर्ष प्रकाशित हुआ।

"बिहार बन्धु प्रथम दौर में 25 वर्ष प्रकाशित हुआ। फिर 6 वर्ष के अन्तराल के पश्चात् 10 वर्ष और चला और 2 वर्ष अंतिम दौर में चला।" [4 ]

बिहार बंधु दीर्घ अवधि तक जीवित रहने वाला हिन्दी का एक प्रमुख पत्र था। प्रधानत: यह पत्र साप्ताहिक था किन्तु समय- समय पर इसमें परिवर्तन भी लक्षित होता रहा। "बिहार बंधु यों तो साप्ताहिक पत्र था लेकिन परिस्थिजन्य विवशताओं के अनुकूल इसे पाक्षिक और मासिक भी बनना पड़ा।" [ 5]

यह सूचना भी मिलती है कि आरम्भ में बिहार बंधु का प्रकाशन हिन्दी के साथ फारसी में भी होता था किन्तु आगामी दिनों में यह मात्र हिन्दी की पत्रिका बनी रही। " प्रारंभ में इसकी सामग्रियाँ हिन्दी फारसी में छपा करती थीं। पर, कुछक अंकों के बाद सिर्फ हिन्दी में ही छपने लगीं।" [6]

यह पत्र मुख्यतः राष्ट्रवादी पत्र था अत: कई बार इसे सरकारी कोप का भाजक भी बनना पड़ा किन्तु पत्र ने अपने उद्देश्यों से कभी समझौता नहीं की। अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करने के क्रम में बिहार-बंधु ने स्पष्ट कि 'हम राजभक्त हैं, खुशामदी नहीं।' अर्थात् सरकार को खुश रखना पत्र का उद्देश्य नहीं रहा। बिहार- बंधु देश के शत्रु को अपना शत्रु मानने की नीति पर कायम रहा और कई बार अंग्रेजी क्रूरता का शिकार बना। डॉ. पीतलिया ने 'बिहार- बंधु' के 9 फरवरी 1878 के अंक के सम्पादकीय अंश को उधृत कर उक्त तथ्यों को पुष्ट किया है-

"हम लोग राजभक्त हैं, खुशामदी नहीं। हम तो अपने मुल्क के दोस्त हैं। बस जो हमारे मुल्क का दोस्त है, वह हमारा भी दोस्त है और जो हमारे मुल्क का दुश्मन है, वह बेशक हमारा भी दुश्मन है।" [7]

दीर्घ काल तक जीवित रहने वाली बिहार बंधु पत्रिका बिहार की साहित्य गौरव का परिचायक तो है ही, बिहार बंधु प्रेस ने भी जिस तरह की सेवा दी वह अविस्मरणीय है। बिहार बंधु से प्रकाशित अन्य सामग्रियों को अगर दरकिनार भी कर दी जाए तो बिहार बंधु का प्रकाशन मात्र पत्रकारिता के इतिहास में इसका स्थान अक्षुण्ण रखने को पर्याप्त है। आरंभिक दौर की हिन्दी पत्रकारिता में विद्यार्थी और मोतीचूर का स्थान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, इनका प्रकाशन भी बिहार बंधु प्रेस से किया जाता था। 1876 में विद्यार्थी के आरंभिक 2 अंक बिहार बंधु प्रेस से निकले थे उसके बाद इसका प्रकाशन स्थगित रहा, पुनः 1878 ई में पंडित दामोदर शास्त्री के संपादन में खड्ग विलास प्रेस बांकीपुर से इसका प्रकाशन शुरू हुआ। 

पटना में खड्ग विलास प्रेस की स्थापना बिहार की पत्रकारिता के लिए अविस्मरणीय प्रमाणित हुआ। इस प्रेस से अनेक साहित्यिक ग्रंथों का प्रकाशन किया गया जिसमें सूर, तुलसी जैसे साहित्यकारों की रचनाओं का नाम भी शामिल है। इस प्रेस ने हिंदी पत्रकारिता को कई ऐसे सुविख्यात पत्र एवं पत्रिकाएं प्रदान किए जिसके बिना हिंदी पत्रकारिता का इतिहास पूर्ण ही नहीं होता। खड्ग विलास प्रेस की स्थापना 1880 ईस्वी में बाबू रामदीन सिंह ने पटना में अपने मित्र मझौलिया के राजा खड्ग बहादुर मल्ल के नाम से की। खड्ग विलास प्रेस से 'क्षत्रिय पत्रिका', द्विज पत्रिका, ब्राम्हण, हरिश्चंद्र कला, विद्या विनोद, भाषा प्रकाश, समस्यापूर्ति जैसी कई पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ जो पत्रकारिता के इतिहास में गौरवपूर्ण उपस्थिति दर्ज करने में समर्थ रही हैं। इन पत्रिकाओं के प्रकाशन में बाबू रामदीन सिंह ने अनेक बार बगैर किसी लाभ-हानि की चिंता किए प्रकाशन का जिम्मा उठाया और उस दायित्व का निर्वहन भी भली प्रकार किया। बाबू रामदीन सिंह भारतेंदु हरिश्चंद्र के मित्र थे और 1880 ईस्वी में हरिश्चंद्र के निधन के उपरांत उन्होंने उनकी कृतियों को प्रकाश में लाने के उद्देश्य श्री हरिश्चंद्र कला नामक एक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। यह पत्रिका दीर्घ जीवी प्रमाणित हुई, लगभग 30-35 वर्ष प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की कृतियों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। वैसे इस पत्रिका में उस समय के अन्य साहित्यकारों की रचनाएं भी प्रकाशित हुआ करती थी किंतु बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रति अपनी मित्रता का जो प्रमाण बाबू रामदीन सिंह ने दिया वह हिंदी साहित्य में सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उनके मित्रधर्म के निर्वहन के प्रमाण के रूप में ब्राम्हण पत्रिका का उल्लेख भी किया जा सकता है जिसका संपादन प्रताप नारायण मिश्र करते थे। बाद में मिश्र जी इसे खड्ग बिलास प्रेस बांकीपुर ले आएं और मिश्र जी के निधन के बाद प्रेस के मालिक बाबू रामदीन सिंह ने इसका प्रकाशन लाभ-हानि की चिन्ता को परे रखकर मित्र-धर्म के नाते जारी रखा-

"हानि औ लाभ की हमें परवाह अहै यह सत्य बतावै।

केवल मित्र प्रतापनारायण मिश्र के नाम को पत्र चलावें |"[8]

खड्ग विलास प्रेस से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में सबसे पहला नाम 'विद्यार्थी' का आता है जिसका प्रकाशन 1876 ई में शुरू हुआ लेकिन खड्ग विलास प्रेस से यह 1878 ई में निकलना आरंभ हुआ। इसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है। 1881 ई में इस प्रेस से 'क्षत्रिय पत्रिका' का प्रकाशन शुरू किया गया। 1883 ई. में इस प्रेस से 'भाषा प्रकाश' का प्रकाशन आरंभ हुआ। 1885 ई. में इस प्रेस से शुरू हुई 'श्री हरिश्चंद्र कला' पत्रिका का जिक्र ऊपर किया जा चुका है। 

खड्ग विलास प्रेस से 1890 ई. में 'द्विज' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह पत्रिका पाक्षिक निकला करती थी। इसका संपादन बाबू दीनदयाल सिंह करते थे। 'ब्राह्मण' पत्रिका खड्ग विलास प्रेस से निकलने वाली एक प्रमुख पत्रिका रही है। आरंभ में यह पंडित प्रताप नारायण मिश्र के संपादन में कानपुर से निकलती थी 1890 ई के आसपास खड्ग विलास प्रेस से निकलने लगी। पटना से भी इसका संपादन प्रताप नारायण मिश्र ही किया करते थे। उनके निधन के बाद खड्ग विलास प्रेस के मालिक बाबू रामदीन सिंह ने इसका प्रकाशन जारी रखा। 

आगे चलकर पंडित शकल नारायण शर्मा के संपादन में 'शिक्षा' का प्रकाशन भी इसी प्रेस से हुआ।   

इस तरह से हम देखते हैं कि बिहार की पत्रकारिता के आरंभिक चरणों में बिहार बंधु प्रेस और खड्ग विलास प्रेस ने जो योगदान दिया उसने न सिर्फ बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता को अपितु संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई देने का कार्य किया। इन प्रेसों से शुरू हुआ बिहार का साहित्यिक सफर उत्तरोत्तर विकास के पथ पर अग्रसर होता रहा और आज भी बिहार से अनेक स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन हो रहा है। इसकी नींव में इन्हीं दोनों प्रेस की महती भूमिका रही है। वैसे तो इनकी महत्ता को डॉ कृष्णानंद द्विवेदी और डॉ कल्याण कुमार झा सरीखे विद्वानों ने अपने शोध में उजागर किया है किंतु यह नहीं कहा जा सकता है कि इनकी उपादेयता का उचित मूल्यांकन किया जा चुका है। 


संदर्भ सूची :

1. द्विवेदी, डॉ. कृष्णानंद - बिहार की हिन्दी पत्रकारिता, प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : 1996, पृ. - 17

2. वही

3. पीतलिया, रामशरण- हिन्दी की कीर्तिशेष पत्र-पत्रिकाएँ, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, प्रथम संस्करण : 2000, पृ - 36

4. वही

5. द्विवेदी, डॉ. कृष्णानंद - बिहार की हिन्दी पत्रकारिता, प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : 1996, पृ. - 32

6. वही

7. पीतलिया, रामशरण- हिन्दी की कीर्तिशेष पत्र-पत्रिकाएँ, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, प्रथम संस्करण : 2000, पृ - 37

8. झा, कल्याण कुमार- बिहार की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता, साहित्य कला संगम, बेतिया, प्रथम संस्करण : 1997, पृष्ठ- 47



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