ग़ज़ल
सितम ये मैं किस पर किए जा रहा हूँ यह किसके सजदे में झुका जा रहा हूँ जिसने नवाजा मुझे हर खुशी से उसे गम के आंसू दिए जा रहा हूँ बसेरा था जिस शाख पर पंक्षियों का उसे ही मैं तोड़े लिए जा रहा हूँ मिली थी जो रिश्तों की पूंजी करम से उससे दामन छुड़ाकर कहाँ जा रहा हूँ एक रोटी किसी को खिला न सका खुद को खुदाया समझे जा रहा हूँ इंसा तक तो खुद को बना ना सका हूँ देवताओं की होड़ में भागे जा रहा हूँ किसी की नजरों में अब तक बस न सका मन की मंदिर में खुद को ढूंढता फिर रहा हूँ । । @ अमित कुमार मिश्र.