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हिन्दी-साहित्यिक पत्रिकाओं का गौरव : अवन्तिका

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हमारे वर्तमान समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक शायर ने लिखा है- ‘कलम के सिपाही अगर सो गए तो /वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।’ निश्चित तौर पर देश और समाज के प्रति कलम के सिपाही यदि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में चूक जाते हैं तो वतन को तबाह होने में एक पल का भी समय नहीं लगता है। ऐसे दौर में पत्रकारिता के महत्व को सहज ही महसूस किया जा सकता है, चाहे पत्रकारिता का स्वरूप कोई भी हो। यहां मेरे चर्चा का विषय क्षेत्र साहित्यिक पत्रकारिता है। साहित्यिक पत्रकारिता का महत्व कुछ मायने में और भी अधिक बढ़ जाता है। दैनिक समाचार पत्रों की घटनाएं जिनका मुख्य विषय वस्तु-तथ्यात्मक घटनाएं होती हैं वह अपना छाप कुछ दिनों तक बरकरार रखने के बाद धूमिल पड़ जाती हैं। लेकिन साहित्यिक पत्रिकाएं या साहित्यिक रचनाएं अपने समय का दस्तावेज है और दस्तावेज की महत्ता समय के साथ और दुरुस्त होती जाती है कम नहीं पड़ती। साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार की भूमिका सदैव अग्रणी रही है। यहाँ से ‘अवंतिका’ जैसी पत्रिका का संपादन डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने किया है जिसके एक-एक अंक का संपादकीय साहित्य, समाज और सं...