हिन्दी-साहित्यिक पत्रिकाओं का गौरव : अवन्तिका
हमारे वर्तमान समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक शायर ने लिखा है- ‘कलम के सिपाही अगर सो गए तो /वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।’ निश्चित तौर पर देश और समाज के प्रति कलम के सिपाही यदि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में चूक जाते हैं तो वतन को तबाह होने में एक पल का भी समय नहीं लगता है। ऐसे दौर में पत्रकारिता के महत्व को सहज ही महसूस किया जा सकता है, चाहे पत्रकारिता का स्वरूप कोई भी हो। यहां मेरे चर्चा का विषय क्षेत्र साहित्यिक पत्रकारिता है। साहित्यिक पत्रकारिता का महत्व कुछ मायने में और भी अधिक बढ़ जाता है। दैनिक समाचार पत्रों की घटनाएं जिनका मुख्य विषय वस्तु-तथ्यात्मक घटनाएं होती हैं वह अपना छाप कुछ दिनों तक बरकरार रखने के बाद धूमिल पड़ जाती हैं। लेकिन साहित्यिक पत्रिकाएं या साहित्यिक रचनाएं अपने समय का दस्तावेज है और दस्तावेज की महत्ता समय के साथ और दुरुस्त होती जाती है कम नहीं पड़ती।
साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार की भूमिका सदैव अग्रणी रही है। यहाँ से ‘अवंतिका’ जैसी पत्रिका का संपादन डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने किया है जिसके एक-एक अंक का संपादकीय साहित्य, समाज और संस्कृति के ज्वलंत दस्तावेज के रूप में आज भी अपना स्थान अक्षुण्ण बनाए रखने में सफल है।
"हम अवंतिका के माध्यम से हिन्दी के
मापदंड ऊंचा करने और उसे राष्ट्रभाषा के अनुरूप बनाने हेतु सतत् प्रयत्नशील रहेंगे।
भारत के संविधान ने घोषणा कर दी कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है पर अब तक हिन्दी
का राजतिलक हुआ कहां? सौभाग्य
सुंदरी हिन्दी को भारतवर्ष की सुयोग्य राजमहिषी बनाना ही अवंतिका का आदर्श
है।"1
वैसे तो इस पत्रिका का संपूर्ण कलेवर
ही महत्वपूर्ण होता था मगर इसके संपादकीय को जो महत्व मिला वह अपूर्व रहा। डॉ०
सुधांशु हर अंक में साहित्य, समाज, संस्कृति, भाषा, राजनीति आदि के ज्वलंत मुद्दों पर
संपादकीय लेख के माध्यम से विचार प्रकट करते थे।
"सुधांशु जी द्वारा लिखित अवन्तिका का
आठ पृष्ठीय संपादकीय साहित्यिक, सांस्कृतिक, शिक्षा
एवं भाषा और राजनीतिक दृष्टियों से काफी महत्वपूर्ण होता था।"2
अवन्तिका के अगस्त 1954 ई० के अंक में डॉ० सुधांशु ने 'भूदान और जीवन-दान', 'विश्वविद्यालय की उपाधियां और सरकारी
नौकरियां', ' नेपाल में
हिन्दी', 'भारतीय
पर-राष्ट्रनीति की सफलता', 'हमारा
हिन्दी-दिवस' जैसे
शीर्षकों से आठ पृष्ठों का सुदीर्घ संपादकीय लिखा है। अवन्तिका के हर अंक में इसी
तरह के महत्वपूर्ण संपादकीय लिखे गए हैं।
डॉ०
सुधांशु ने अनेक मुद्दों पर जो उस समय लिखा वह कालजयी प्रमाणित हुएं और उसकी
प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। विश्वविद्यालयों की शिक्षा में निरंतर ह्रास
परिलक्षित हो रहा है। अधिकांश छात्र/छात्राएं पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी और डिग्री
मात्र मानकर चलते हैं। शिक्षा का महत्व ज्ञान को मानने वाले छात्र रहे हीं नहीं।
डॉ० सुधांशु का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है-
"उपाधियों का मूल्य और महत्त्व इस समय
इतना बढ़ गया है कि अधिकांश ही नहीं; प्राय: सब विद्यार्थियों का एकमात्र
ध्येय, चाह जिस
प्रकार हो, उपाधियां
प्राप्त करना रह गया है। यदि यह कहा जाए कि सरकारी नौकरियां प्राप्त करने के लिए
ही आज के विद्यार्थी विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करते हैं तो यह कोई
अत्युक्ति की बात ना होगी।"3
जैसे-जैसे समय गुजरा है डॉ० सुधांशु के
इस कथन की प्रासंगिकता और भी बैठी है। यहीं उन्होंने आगे लिखा है,
"इस कारण शिक्षा का मानदंड क्रमश:
ह्रासशील हो रहा है। ज्ञानार्जन के लिए जो श्रद्धा तथा सत्यनिष्ठा चाहिए, दुर्भाग्य से वह हमारे देश के
विद्यार्थियों में दूसरे देश के विद्यार्थियों की अपेक्षा अल्पतम है। यह एक ऐसी
स्थिति है जिसपर राष्ट्र के कर्णधारों को विचार करना चाहिए।"4
डॉ० सुधांशु ने इस स्थिति के प्रति देश
के कर्णधारों को 65-67 वर्ष पहले
ही सचेत कर दिया था किंतु उत्तरोत्तर देश में उच्च शिक्षा की स्थिति बद् से बद्तर
होती चली गई है अब तो उच्च शिक्षा और सरकार भी विश्वविद्यालय को डिग्री बेचने की
दुकान मात्र मानकर चल रही है। अवंतिका के संपादकीय में समाज और राजनीति की दशा पर
भी पर्याप्त चिंतन किया गया है। साहित्य और भाषा विषयक चिंतन भी हर अंक के
संपादकीय में मौजूद हैं। राष्ट्रभाषा और क्षेत्रीय भाषा विषयक एक चिंतन द्रष्टव्य
है-
"राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रांतीय भाषाओं के
मार्ग में रोड़ा बनना नहीं चाहती। प्रांतीय भाषाओं का विकास और राष्ट्रभाषा हिन्दी
का विकास दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रांतीय भाषाओं के विकास एवं सुसंपन्नता से
राष्ट्रभाषा हिन्दी का संवर्धन ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु प्रांतीय
भाषाओं का अपना क्षेत्र है, वे अपने
क्षेत्र में पुष्पित-पल्लवित हों; किन्तु अंतर्देशीय तथा राष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रभाषा हिन्दी ही सारे देश का
प्रतिनिधित्व करे - हम यही चाहते हैं; और इसी से सारे देश की एकता एवं
संस्कृति अक्षुण्ण रह सकती है।"5
अवन्तिका पत्रिका मासिक प्रकाशित होती
थी। इसके हर अंक में, उस समय के
चर्चित रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित हुआ करती थी। इसके स्वरूप को जानने के लिए
इसके किसी अंक में प्रकाशित रचनाओं पर विहंग-दृष्टि डाल देना समीचीन होगा। इस
उद्देश्य से अवन्तिका के अक्टूबर 1954 अंक की चर्चा करते हैं। इस अंक में 'हिन्दी शिष्टमंडल के दक्षिण-यात्रा', 'संसदीय हिन्दी-परिषद्', 'जामिया मिलिया और शिक्षा मंत्रालय', 'राष्ट्रभाषा के प्रचारक कौन?', 'प्रकाशकों का संगठन' जैसे महत्वपूर्ण एवं समसामयिक विषयों
पर महत्वपूर्ण एवं सार्थक संपादकीय लिखे गए हैं। इस अंक में कई महत्वपूर्ण आलेख
प्रकाशित हैं, यथा- 'काव्य में दर्शन की समस्या' (श्रीहर्षनारायण), 'पंत की कविता' (श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह), 'धार्मिक विकास का मनोवैज्ञानिक
विश्लेषण' (श्री
कमलेश गौड़), 'स्थापत्य
कला का निकेतन छत्तीसगढ़ (सचित्र)' (श्री राजेंद्र लाल गुप्त), 'गोदान के कथानक की स्थापत्य-कला' (श्री रामप्रसन्न सिंह), 'संताली का लोक साहित्य' (श्री डोमन साहू), 'सूफी काव्य परंपरा' (श्री रामपूजन तिवारी), 'पुस्तक' शब्द की प्राचीनता और उसके पांच प्रकार' (श्री अगरचंद नाहटा) आदि। इसके अलावे इस
अंक में कहानियां, कविताएं/गीत
आदि भी प्रकाशित हैं।
कैलास भारद्वाज की कहानी 'रूप-अरूप', इंदिरा नूपुर की कहानी 'टप...टप...टम...!', मधुकर गंगाधर की कहानी 'कन्वोकेशन' आदि इस अंक में प्रकाशित हैं। कविताओं
में, आचार्य
जानकी वल्लभ शास्त्री की कविता 'जीवन-संगीत', भारत भूषण
अग्रवाल की कविता 'छांह के
छंद', श्री
गुलाब की कविता 'गीत', वीरेंद्र मिश्र के गीत, विश्वमोहन कुमार सिंह की कविता 'दूसरी पहेली', कमलापति शास्त्री के गीत आदि इस अंक के
विशेष शोभा हैं।
साहित्य की उक्त विधाओं के अलावा 'भारतीय वाड्•मय', 'विचार-संचय', सार-संकलन, विश्व-वार्ता', पुस्तकालोचन' आदि इस पत्रिका के स्थायी स्तंभ हैं।
पत्रिका के आलोच्य अंक में, 'विचार-संचय' स्तंभ के अंतर्गत 'मीमांसा की मनोवैज्ञानिकता' (श्री पद्मनारायण), श्री शांतिप्रिय द्विवेदी का लेख (श्री
रामगोपाल वाजपेयी), बिहारी की
महावरी (श्री अव्यक्त), संघर्ष और
सर्वोदय (श्री नृपेन्द्रनाथ गुप्त) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उस समय के प्रसिद्ध
साहित्यकारों ने लिखा है।
'सार-संकलन' स्तंभ के अंतर्गत, 'साहित्य में सौंदर्य बोध' (श्री प्रकाश चंद्र गुप्त), 'पुस्तकालय बहु-प्रयोजन संस्था के रूप
में' (डॉ०
धर्मेंद्र ब्रह्मचारी शास्त्री), 'नारी की पराधीनता: निदान और इलाज' (दादा धर्माधिकारी), 'भारतीय जीवन पर सिनेमा का प्रभाव' (श्री कन्हैयालाल भिन्डा) जैसे विविध
विषयक विचार/लेख प्रकाशित हैं। इनका पुर्नप्रकाशन अवन्तिका में, 'जन साहित्य', 'पुस्तकालय', 'सर्वोदय', 'जीवन साहित्य' जैसे प्रसिद्ध पत्रिकाओं से, साभार किया गया है।
'विश्व-वार्ता' अवन्तिका का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा
है जिसके अंतर्गत विश्व के विभिन्न देशों के महत्वपूर्ण क्रियाकलापों से पाठकों का
आलोचनात्मक परिचय कराया जाता रहा है। अक्टूबर 1954 वाले अंक में, श्री दिनेश प्रसाद सिंह ने, भारत, अमेरिका, जर्मनी, चीन, पुर्तगाल, लंका आदि देशों के समसामयिक मुद्दों की
चर्चा की है।
'पुस्तकालोचना' स्तंभ के अंतर्गत, पुस्तकों की आलोचना प्रस्तुत की जाती
थी। आलोच्य अंक में, छविनाथ
पाण्डेय, हंस कुमार
तिवारी, प्रेमशंकर
तिवारी, शंभुनाथ
बलियासे, प्रो०
विमला प्रसाद आदि के द्वारा की गई पुस्तक-आलोचना प्रकाशित हैं।
अवन्तिका के इन स्थाई स्तंभों की चर्चा
करते हुए डॉ० कृष्णानंद द्विवेदी ने 'बिहार की हिन्दी पत्रकारिता' नामक अपनी पुस्तक में लिखा है, "अवन्तिका के आरंभिक अंकों में पांच
स्तंभ- भारतीय वाड्•मय, विचार
संचय, सार-संकलन, विश्ववार्ता एवं पुस्तकालोचन थे। जनवरी
1953 में दो और नए स्तंभ- हिंदी वाड्•मय और
पाठकों के पत्र जुड़े।"6
उक्त
विवेचना से यह स्पष्ट है कि अवन्तिका के अंकों में साहित्य की प्राय: सभी विधाएं
तो प्रकाशित होती ही थी समाज, संस्कृति और राजनीतिक विषयक समसामयिक लेख भी प्रकाशित किए जाते थे। समय-समय
पर अवन्तिका के विशेषांक भी प्रकाशित होते रहे हैं। विशेषांकों का स्वरूप एवं उसका
साहित्यिक महत्व जानने के लिए किसी विशेषांक में प्रकाशित विषयों का अवलोकन कर
लेना भी विषयानुकूल होगा।
अवन्तिका का जनवरी 1954 अंक 'काव्यालोचनांक' विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया
गया। इस अंक
में काव्यशास्त्र, हिन्दी के
काव्य आंदोलनों एवं हिन्दी साहित्य की विभिन्न काव्य प्रवृत्तियों के साथ कई
कवियों की आलोचना भी प्रकाशित हैं। ये सभी आलोचनाएं हिन्दी के ख्यातिलब्ध आलोचकों
के द्वारा लिखे गएं हैं। शास्त्रीय पक्ष से संबंधित आलोचनाओं में 'काव्य का लक्षण' (सेठ कन्हैयालाल पोद्दार), 'काव्यालोचन का दार्शनिक आधार (डॉ०
रामखेलावन पांडेय), 'अलंकार
शास्त्र में संप्रदाय चिंतन' (श्री वाचस्पति शास्त्री), 'अलंकारों के पारस्परिक भेद' (प्रो० सिद्धिनाथ तिवारी), 'साधर्म्य अथवा उपमा' (डॉ० ओमप्रकाश), काव्य के शास्त्रीय दोष (श्री अभिराम
झा), 'काव्य-वृति' (प्रो० अंबा प्रसाद सुमन), 'रस-सिद्धांत का विकास' (डॉ० भगीरथ मिश्र), 'साहित्य शास्त्र में रीति का विवेचन' (श्री बुद्धि वल्लभ शास्त्री), 'वक्रोक्ति: कुंतक की मान्यताएं' (श्री केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'), भारतीय काव्यशास्त्र के इन महत्वपूर्ण
पक्षों के अलावे पाश्चात्य काव्यशास्त्र के विभिन्न पक्षों पर भी इस अंक में
समीक्षाएं प्रकाशित हैं, यथा-
टॉल्स्टॉय के कला-संबंधी सिद्धांत (श्री मदनमोहन प्रसाद), 'कला और क्रोचे' (प्रो० जगन्नाथ प्रसाद मिश्र), 'एलियट की आलोचना प्रणाली' (प्रो० नलिन विलोचन शर्मा), 'लीविस का काव्य-सिद्धांत' (प्रो० श्रीकांत गोविंद), कॉर्डवेल के काव्यालोचन संबंधी
सिद्धांत' (प्रो०
कैलास बिहारी सहाय), 'आर्नाल्ड
के काव्यालोचन संबंधी सिद्धांत' (श्री प्रभाकर माचवे), 'एडलर और काव्य प्रेरणा' (श्री राजमल जैन), 'पश्चिमी
साहित्य-समीक्षा' (श्री
नंददुलारे वाजपेयी) आदि। उक्त आलोचनाओं की विषय विविधता से स्पष्ट दिख पड़ता है कि
अवन्तिका के इस अंक में भारतीय और पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र के प्राय: प्रमुख
समीक्षा पद्धतियों की आलोचना इस अंक में मौजूद हैं।
इसके अलावे हिन्दी साहित्य की विभिन्न
प्रवृत्तियों पर आलोचकों की समीक्षा दृष्टि भी इस विशेषांक में प्रकाशित हैं।
उदाहरण द्रष्टव्य है- 'भक्तिकाल
की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि' (प्रो० मोती साह), 'वैष्णव भक्ति का विकास और हिन्दी के
भक्त कवि' (प्रो०
शिवनंदन प्रसाद), 'रीतिकालीन
श्रृंगार-साधना और नायिका-भेद' (प्रो० बच्चन सिंह), 'रीतिकाल
का नया मूल्यांकन' (प्रो०
रामधारी सिंह 'दिनकर'), 'हिन्दी साहित्य का द्विवेदी युग' (गोवर्धन प्रसाद सदय), 'प्रगतिवादी काव्य पर एक दृष्टि' (श्री ब्रजकिशोर चतुर्वेदी), 'प्रयोगवादी काव्य के सुस्पष्ट स्वर' (श्री विश्वंभर मानव), 'प्रयोगशील कविता का भविष्य' (श्री गिरिजा कुमार माथुर), प्रपद्यवाद की दार्शनिक पृष्ठभूमि' (प्रो० केसरी कुमार), 'हिन्दी की आधुनिक राष्ट्रीय कविता' (प्रो० विनय मोहन शर्मा), 'हिन्दी आलोचना: अगला कदम' (डॉ० देवराज) आदि।
अवन्तिका के इस विशेषांक में हिन्दी के
विभिन्न कालखण्डों से संबंधित कवियों की आलोचनाएं भी प्रकाशित हैं। 'सिद्ध कवियों की भाषा' (महापंडित राहुल सांकृत्यायन), 'कबीर साहब की प्रतीक-योजना' (श्री परशुराम चतुर्वेदी) 'विद्यापति: साधक या श्रृंगारी' (श्री शीलभद्र), 'विद्यापति और सूरदास की राधाएं' (आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री), 'सूर की कविता का भाव-पक्ष' (श्री सदानंद झा), 'सूर और तुलसी की सगुन साधना' (श्री नरेंद्रनारायण लाल), 'केशवदास का आचार्यत्व' (डॉ० नगेंद्र), 'भूषण के काव्य की कतिपय विशेषताएं' (डॉ० टीकमसिंह तोमर), 'घनानंद' (डॉ० सुधीद्रं), 'भारतेंदु हरिश्चंद्र' (प्रो० नर्मदेश्वर झा) जैसे उत्कृष्ट
आलोचनाएं इसमें प्रकाशित है।
छायावाद पर तो अनेक लेख इस विशेषांक
में प्रकाशित हैं। 'छायावाद
का आरंभ कब हुआ' शीर्षक से
एक परिसंवाद इस अंक में शोभायमान है जिसमें, रामनरेश त्रिपाठी, सियारामशरण गुप्त, पंत, नंददुलारे वाजपेयी, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जैसे कई
विद्वानों के अभिमत प्रकाशित है। इसके अलावे छायावाद के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश
डालते 'गुप्त-बंधु
और छायावाद' (शांतिप्रिय
द्विवेदी), 'छायावाद
के आविर्भाव के सामाजिक कारण' (श्री शंभूनाथ सिंह), 'छायावादी
कविता की प्रेरणा भूमि' (डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी), 'छायावाद में नारी' (आरसी प्रसाद सिंह), 'कामायनी में मनस्तत्व की परंपरा तथा
मनु' (श्री
रामानंद शर्मा) आदि आलेख भी इस अंक में शामिल हैं। ये लेख छायावाद को लेकर
तद्युगीन विद्वानों के विचार संपूर्णता से प्रकट करने में सक्षम हैं।
यह एक विशेषांक ही अवन्तिका के विराट
स्वरूप एवं उसकी महत्ता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। अवन्तिका के इस 'काव्यालोचनांक' विशेषांक में एक ओर भारतीय एवं पाश्चात्य
समीक्षा पद्धति के शास्त्रीय पक्ष विवेचित हैं तो वहीं दूसरी ओर सिद्ध साहित्य से
लेकर प्रयोगवाद तक आलोचनाएं प्रकाशित है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर प्रसाद
की कामायनी तक पर चर्चा की गई है। अवन्तिका के 'काव्यालोचनांक' विशेषांक की विशेषता बताते हुए डॉ०
कृष्णानंद द्विवेदी ने लिखा है, "जनवरी 1954 ई० में
उसने काव्यालोचनांक विशेषांक प्रकाशित किया। इसमें हिन्दी साहित्य के विविध विषयों
पर भरपूर सामग्री प्रकाशित की गई थी।7
यह बात
अलग है कि अवन्तिका का प्रकाशन छः वर्ष की अल्प-अवधि तक ही किया जा सका किंतु इस
अल्प-अवधि में ही अवन्तिका ने जो कीर्तिमान स्थापित कर दिखलाया वह हिन्दी साहित्य
की कुछ गिनी-चुनी पत्रिकाओं के हिस्से में ही आता है। इस पत्रिका में दिनकर, प्रभात, पंत, हजारी प्रसाद द्विवेदी, हंस कुमार तिवारी, केशरी कुमार, शांतिप्रिय द्विवेदी, प्रभाकर माचवे, नंददुलारे वाजपेयी, जानकीवल्लभ शास्त्री सरीखे, हिन्दी साहित्य के युग पुरुष प्रकाशित
हुआ करते थे।
पत्रिका के स्वरूप को देखकर स्वमेव
सिद्ध हो जाता है कि इस पत्रिका ने हिन्दी साहित्य और राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास
में कितनी महत्ती भूमिका निभाई है। इसका प्रकाशन असमय बंद होना हिन्दी भाषा और
साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति रही। उस समय इसके पुर्नप्रकाशन की संभावना लोगों के
हृदय में थी जो पूरी नहीं हो सकी। अब भी अवन्तिका के अंकों का संरक्षण-संवर्धन हो
एवं आज की हिन्दी पीढ़ी को उसका परिचय मिले यह आवश्यक है। अवन्तिका के प्रायः सभी
अंक पटना में 'साहित्य-यात्रा' के संपादक डॉ० कलानाथ मिश्र के पास
सुरक्षित हैं और डॉ० मिश्र समय-समय पर 'साहित्य-यात्रा' के दस्तावेज स्तंभ में अवन्तिका के
महत्वपूर्ण लेखों एवं संपादकीय अंशों को प्रकाशित भी करते हैं जिसमें अवन्तिका की
कीर्ति का परिचय हिन्दी जगत को मिल सके। वस्तुत: डॉ० कलानाथ मिश्र अवन्तिका के
उत्तराधिकारी भी ठहरते हैं क्योंकि अवन्तिका का प्रकाशन जिन 'जयनाथ मिश्र' के प्रबंधकन में होता था वे डॉ० मिश्र
के चाचा थे।
अतः निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है
कि 'अवन्तिका' हिन्दी की कालजयी पत्रिकाओं में
अग्रगण्य है जिसने न सिर्फ हिन्दी साहित्य के विकास में अमूल्य योगदान दिया अपितु
संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिलने के पश्चात उसे राष्ट्रव्यापी स्वरूप
देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मात्र छः वर्षों की अल्प-अवधि में अवन्तिका
ने जो कर दिखलाया वह हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के लिए एक मिसाल है। हिन्दी
की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में अवन्तिका का स्थान अक्षुण्ण है।
संदर्भ सूची :
1. द्विवेदी, डॉ कृष्णानंद- बिहार की हिंदी
पत्रकारिता, प्रवाल
प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : 1996, पृष्ठ- 120
2. झा, कल्याण कुमार- बिहार की हिंदी
साहित्यिक पत्रकारिता, साहित्य
कला संगम प्रकाशन, बेतिया, प्रथम संस्करण : 1977, पृष्ठ- 96
3. सुधांशु, डॉ लक्ष्मी नारायण - संपादकीय, अवंतिका, अगस्त 1954, पृष्ठ-05
4. वही, पृष्ठ -06
5. वही, पृष्ठ -08
6. द्विवेदी, डॉ कृष्णानंद- बिहार की हिंदी
पत्रकारिता, प्रवाल
प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : 1996, पृष्ठ- 120
7. वही, पृष्ठ - 122
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