हालावाद (लेख)
हालावाद - सीमा कुमारी । हिंदी कविता में हालावाद का प्रवाह उस समय जोरो पर था जब समानांतर रूप से एक ओर छायावाद तो दूसरी ओर राष्ट्रीय भावधारा की कविताएं लिखी जा रही थी। हालावाद के उपजने में उस समय के राजनीतिक, सामाजिक पृष्ठभूमि की अहम भूमिका रही है। राजनैतिक रूप से भारतीय राजनीति करवट बदल रही थी। स्वाधीनता आंदोलन जो पिछले कई वर्षों से निरंतर चला आ रहा था उसका असर स्पष्ट दिखने लगा था। एक नयी राजनीतिक पारी की शुरुआत होने वाली थी। इस समय आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था और हर तरफ एक नयी बेचैनी का माहौल बना हुआ था। समाज नए-नए रूप में निर्मित और विखंडित हो रहा था। भारतीय संस्कृति का संरक्षण, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव सब इन्हीं दिनों पैर पसार रहे थे। हर तरफ एक बेचैनी का माहौल था जिसमें घिरकर मनुष्य स्वयं को त्रस्त पा रहा था। संघर्षों के बीच ही उसका जीवन कट रहा था। ऐसे में मनुष्य के लिए जो वस्तु अप्राप्य था वह है जीवन का आनंद, जीवन का प्रेम। हिंदी साहित्य में आरंभ से ही देखा जाए तो साहित्यकारों को दो पक्षों को लेकर चलते हुए देखा गया है। एक पक्ष तो उन साधु-संत प्रवृत्ति वाले साहित्यकारों का ह...