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हसरतों की नाव ( ग़ज़ल ).

हसरतों की नाव.       - अमित कुमार मिश्रा. अपने कातिल को आज मैं मुआफ कर आया दुश्मन को अपने, घर का पता दे आया । मुहब्बत तो उन्हें पहले भी न थी मुझसे आज नफरत करने का हक भी छीन आया। वक्त से न सुनाई जाएगी, मेरी बर्बादी का सबब मैं खुद ही जमाने को हकीकत बता आया। उसके कदमों की मिट्टी बंद है मेरी मुट्ठी में मैं शहर से जाते-जाते यह सौगात ले आया। अभी हौसला न टूटा है ‘अमित’ रिश्वतों के टूट कर बिखरने से लो मैं फिर से हसरतों की नाव बना लाया।

विरह के गीत (कविता)

प्रतीक्षा असह्य हो जाती है तब नाम लेता हूं, तुम्हें सबसे छुपाता हूं मन-ही-मन गुनगुनाता हूं। हृदय जब याद में तेरी प्रबल चित्कार करती है, अधर को भींच कर अपने नयन को सींच लेता हूं। तृषित चातकी बनकर तुम्हारी बाट जोहूं मैं तृषा जब कुंठित होती है हृदय में आह भरता हूं। ‘प्रबल है पीड़ प्रेमी की’ यही खुद को बताता हूं निगाहें मूंदकर अपनी तुम्हें खुद में बुलाता हूं। तुम्हें दृग में बसा कर मैं नयन कुंडी चढ़ाता हूं कोई जब पूछता तुमको विरह के गीत गाता हूं। © अमित कुमार मिश्रा.