विरह के गीत (कविता)

प्रतीक्षा असह्य हो जाती है
तब नाम लेता हूं,
तुम्हें सबसे छुपाता हूं
मन-ही-मन गुनगुनाता हूं।

हृदय जब याद में तेरी
प्रबल चित्कार करती है,
अधर को भींच कर अपने
नयन को सींच लेता हूं।

तृषित चातकी बनकर
तुम्हारी बाट जोहूं मैं
तृषा जब कुंठित होती है
हृदय में आह भरता हूं।

‘प्रबल है पीड़ प्रेमी की’
यही खुद को बताता हूं
निगाहें मूंदकर अपनी
तुम्हें खुद में बुलाता हूं।

तुम्हें दृग में बसा कर मैं
नयन कुंडी चढ़ाता हूं
कोई जब पूछता तुमको
विरह के गीत गाता हूं।

© अमित कुमार मिश्रा.

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