स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

- सीमा कुमारी 

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (तदर्थ), हिन्दी विभाग 

बी.एस.एस. कॉलेज, सुपौल। 

संपर्क - 8507474110, sss2seema@gmail.com 


स्त्री अस्मिता से जुड़े महाकाव्यों में उन महाकाव्यों की चर्चा की जा सकती है जिसमें स्त्री के आत्मगौरव, उसके अधिकार, उसकी सामाजिक चेतना, उसकी राजनैतिक स्थिति और उसके आत्म-वेदना का यथार्थ का वर्णन किया गया हो | हिंदी साहित्य में आदिकाल स्त्रियों की दशा को लेकर सर्वाधिक कुत्सित रहा है | इसमें सिर्फ साहित्य को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि साहित्य समाज सापेक्ष होता है और तदयुगीन समाज वैसा ही था, जहां स्त्रियों को भोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझा जाता था | 

स्त्रियों के साथ समुचित न्याय भक्तिकालीन साहित्य भी नहीं कर सका | वहां या तो स्त्री को नर्क का दरवाजा बना दिया गया या फिर स्वर्ग की देवी | उसका वास्तविक स्थान उसे यहां भी प्राप्त नहीं हो सका | भक्तिकालीन साहित्य में कृष्णभक्ति शाखा में गोपिकाओं का वर्णन अवश्य ध्यान आकर्षित करता है, जहां न सिर्फ गोपिकाओं के प्रेम का सूक्ष्म निरूपण किया गया है अपितु उसे कई तरह की आजादी भी दी गई है | कृष्ण से प्रेम करने के लिए वे पूरी तरह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करती हैं | उनके द्वारा गायों को दुहना, मक्खन निकालना, दूध और मक्खन का व्यापार करना, ये सब उसके आर्थिक संबलता का परिचायक है, जो कि स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व को निरूपित करने में काफी मददगार है | 

रीतिकाल एक बार फिर से आदिकालीन परिवेश को हीं दुहरा बैठा जहां स्त्री को पूर्णतः भोग और श्रृंगार का साधन बना दिया गया |

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में अनेक तरह के क्रांतिकारी परिवर्तन लक्षित हुएं | अब स्त्री सिर्फ रसोई और अपने देह तक सीमित नहीं रह गई थी | रानी लक्ष्मीबाई, रजिया सुल्तान आदि का परिचय तो मिला ही था, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान यह भी दिख गया कि स्त्री किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कमजोर या कमतर नहीं है | फिर चाहे क्षेत्र राजनैतिक हो, आर्थिक हो, सामाजिक हो या फिर संघर्ष का | भारतेंदु युग में स्त्रियों की अवस्था को सुधारने के कदम उठने आरंभ हो गए | द्विवेदी युगीन और छायावादी काव्य में स्त्री अस्मिता से जुड़े अनेक आयाम उद्घाटित हुए | इस दिशा में 'आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी' का लेख 'कवि की उर्मिला विषयक उदासीनता' और 'रवींद्रनाथ टैगोर' का लेख 'काव्येर उपेक्षिता' मील का पत्थर साबित हुआ | जिसने साहित्यकारों पर एक प्रश्न चिन्ह लगाया और यह सोचने पर विवश किया कि भारतीय साहित्य में राम-लक्ष्मण, महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर जैसे चरित्र नायकों पर इतने ग्रंथ रचे गयें तब फिर इन सबों को प्रेरणा देने वाली, इनके पीछे इनकी जिम्मेदारियों को कुशलतापूर्वक निभाने वाली, इनकी पत्नियां क्यों उपेक्षित रखी गयीं | इसके बाद हिंदी के अनेक कवियों ने ठहरकर यह चिंतन किया कि वे मनीषषियां जो सदैव उपेक्षित रही हैं, उनका कर्म कितना गौरवमयी रहा है | अपने आदर्श पर चलते हुए उन्होंने कैसे आत्मोत्सर्ग करके परिवार और समाज को प्रकाशमान किया, और तब स्त्री की गौरवपूर्ण अस्मिता का वर्णन करते हुए 'राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त' ने घोषित किया -

"गोपा बिना गौतम भी ग्राह्य नहीं मुझको |" 1

मैथिलीशरण गुप्त ने एक ओर 'यशोधरा' नामक खंडकाव्य का प्रणयन किया जिसमें गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा के आत्म-बलिदान, त्याग, प्रेम, मर्यादित विरह आदि का वर्णन किया तो वहीं दूसरी ओर 'साकेत' में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के प्रेम का वर्णन करते हुए उर्मिला के एक-एक आंसू को मोती के समान आत्मसात कर इस काव्य का सृजन किया | मैथिलीशरण गुप्त ने स्त्री अस्मिता को लेकर एक नई दृष्टि, नये युग की घोषणा करते हुए लिखा -

"अबला जीवन हाय ! तुम्हारी यही कहानी/ आंचल में है दूध आंखों में पानी |"

नयी दृष्टि से विचार करते हुए कैकेयी के चरित्र को उद्घाटित किया और लिखा -

"यह सच है तो, लौट चलो घर को भैया/ अपराधिन मैं हूं तात, तुम्हारी मैया |"

आगे चलकर और भी अनेक काव्य स्त्री को महत्त्व देकर लिखे जाने लगे | इस दिशा में 'हरिऔध' कृत 'वैदेही वनवास', रामचरित उपाध्याय कृत 'देवी द्रौपदी', श्यामनारायण पाण्डेय कृत 'जौहर' आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें स्त्री जीवन के अलग-अलग पक्षों का चित्रण किया गया है | यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि पहले जहां पुरुषों को चरित्र नायक बनाकर काव्य रचना की परंपरा थी, वहीं अब स्त्री को केंद्रीय पात्र के रूप में ग्रहण किया जाने लगा | स्त्री अस्मिता को लेकर लिखे गए महाकाव्यों में 'जयशंकर प्रसाद' की 'कामायनी' का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है | इस महाकाव्य में स्त्री को न सिर्फ पुरुष की सहचरी अपितु प्रेरक शक्ति भी कहा गया है | मनु जब-जब अपने कर्म से विचलित होते हैं तब-तब श्रद्धा उन्हें कर्म का उपदेश देती है | यहां यह भी स्पष्ट चित्रित है कि आवश्यकता पड़ने पर वह मनु को कर्म का उपदेश भी देती है और मनु के विचलित होकर चले जाने पर स्वयं कर्मरत भी रहती है | स्त्री महिमा का बखान करते हुए 'कामायनी' के लज्जा सर्ग में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है -

"नारी तुम केवल श्रद्धा हो/ विश्वास रजत नग-पग-तल में/ पीयूष स्रोत सी बहा करो/ जीवन के सुन्दर समतल में |" 2

लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को केंद्र में रखकर मैथिलीशरण गुप्त ने तो 'साकेत' की रचना की हीं, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने 'उर्मिला' शीर्षक से छः सर्ग के प्रबंधकाव्य का सृजन किया | जिसमें उर्मिला के वैक्तित्व का निरूपण नवीन दृष्टिकोण से किया गया है | इस काव्य की प्रशंसा करते हुए डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने लिखा है -

"विषय वस्तु, प्रतिपादन शैली एवं शिल्पगत प्रौढ़ता की दृष्टि से भी यह काव्य 'साकेत' से भी अधिक सफल माना जाता है |" 3

केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' ने 'कैकेयी' शीर्षक प्रबंधकाव्य की रचना 1950 ई० में की | इस काव्य में कैकेयी के चरित्र को नवीन दृष्टिकोण से रूपायित करते हुए कैकेयी का महिमामंडन किया है | इस काव्य में कैकेयी के माध्यम से स्त्री की राजनैतिक चेतना का निरूपण भी किया गया है |

'डॉ० रत्नचंद्र शर्मा' ने 1966 ई० में 'शबरी' नाम से एक प्रबंध काव्य की रचना की है जिसमें मूल रूप से तो जाति प्रथा के प्रश्नों पर चिंतन किया गया है, लेकिन स्त्री संबंधी अनेक भाव भी वहां प्रकट किए गए हैं | 'अग्नि परीक्षा' (1984 ई०) उनका एक और भी महत्वपूर्ण है काव्य है जिसमें सीता के माध्यम से स्त्री जीवन की महानता का वर्णन किया गया है | इसी क्रम में राजेश्वरी अग्रवाल का 'सीता समाधि', परमानंद श्रीवास्तव का 'निष्कासिता', ज्ञानवती सक्सेना का 'वनवासिनी सीता', रमेशचंद्र का 'स्वर पाषाण शिला' आदि विशेष उल्लेखनीय हैं जिसमें मध्यकालीन कथाओं के माध्यम से आधुनिक चिंतन के अनुरूप स्त्री जीवन के अनेक परतों को खोला गया है | रांगेय राघव ने 'पांचाली' एवं नरेंद्र शर्मा ने 'द्रौपदी' प्रबंधकाव्य में द्रौपदी का चरित्रांकन नूतन दृष्टि से किया है | नरेंद्र शर्मा कृत 'द्रौपदी' काव्य की महत्ता उद्घाटित करते हुए डॉ गणपतिचन्द्र गुप्त ने लिखा है -

"इस महाभारत के विभिन्न प्रसंगों, घटनाओं और पात्रों का चित्रण स्वतंत्र दृष्टि से किया गया है | काव्य की विभिन्न घटनाओं और पात्रों का निरूपण प्रतीकात्मक रूप से करते हुए उनके माध्यम से मानव जीवन के शाश्वत मूल्यों की व्यंजना का प्रयास किया गया है | साथ हीं विभिन्न सामाजिक समस्याओं का भी समाधान आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए नारी को नर की प्रेरणा शक्ति सिद्ध किया गया है |" 4

राजेश्वर प्रसाद सिंह नारायण ने 'राधा श्रीकृष्ण' नामक काव्य का सृजन दो खंडों में किया है | इस काव्य में नर-नारी के भावात्मक संबंध को आधुनिक युगीन दृष्टिकोण से वर्णित किया है | गौरीशंकर मिश्र ने 1953 ई० में 'सावित्री' काव्य की रचना की | जिसमें पतिव्रता धर्म की महिमा का बखान किया गया है | स्त्री जीवन के अलग-अलग आयामों को कुशलतापूर्वक दिखलाने वाले काव्यों में रामधारी सिंह दिनकर कृत 'उर्वशी' का महत्वपूर्ण स्थान है | इस काव्य में एक साथ हीं अलग-अलग पात्रों के माध्यम से स्त्री के कई रूपों का वर्णन किया गया है | काव्य की नायिका उर्वशी के माध्यम से स्वच्छंद प्रेम का, औशिनरी के माध्यम से दांपत्य जीवन की जिम्मेदारियों का, सुकन्या के माध्यम से मर्यादा एवं सतीत्व का आदर्श प्रस्तुत किया गया है |

वस्तुत: इस काव्य की नायिका प्रत्येक दृष्टि से काम, स्वच्छंद प्रेम या निरूद्देश्य आनंद की प्रतीक है किंतु उसके समानांतर दांपत्य जीवन की रूढ़ मर्यादाओं या सतीत्व के आदर्श की प्रतीक औशिनरी एवं संतुलित दांपत्य जीवन की प्रतीक च्यवण-पत्नी सुकन्या की भी प्रतिष्ठा पूर्ण सहानुभूति से करते हुए अंतत: कवि ने काम एवं प्रेम से परिपूर्ण संतुलित दांपत्य जीवन को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है |" 5

राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने 'अम्बपाली' शीर्षक से प्रबंधकाव्य का सृजन किया है जिसमें वैशाली की राजनर्तकी आम्रपाली के आरंभिक जीवन के प्रेम, उल्लास, श्रृंगार, वैराग्य, संन्यास आदि के द्वंद को चित्रित किया गया है |

आधुनिक युगीन भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की नायिका रानी लक्ष्मीबाई को केंद्र में रखकर श्याम नारायण प्रसाद ने 'झांसी की रानी' (1955 ई०) की रचना की है | 'झांसी की रानी' शीर्षक से आनंद मिश्र ने भी 1956 में एक प्रबंधकाव्य का सृजन किया है | इन रचनाओं में रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य का वर्णन करते हुए स्त्री के शक्तिरूपा होने का एहसास कराया है | नरेंद्र शर्मा ने काल्पनिक प्रेम कथा पर आधारित प्रबंध काव्य का सृजन 'कामिनी' शीर्षक से किया है, जिसमें कवि का लक्ष्य स्त्री के ममतामयी स्वरूप का महिमामंडन करना था |

"कवि का लक्ष्य नारी के कामिनी रूप की अपेक्षा उसके मातृरूप की महत्ता का उद्घाटन करते हुए उसके जीवन की सार्थकता मातृत्व में दिखलाना है |" 6

स्त्री को केंद्र में रखकर और भी कई प्रबंधकाव्यों का सृजन हिंदी साहित्य में किया गया है | जिनमें मुंशीराम शर्मा कृत 'विरहिणी', सियारामशरण गुप्त कृत 'सुनंदा' और 'गोपिका', उमाकांत मालवीय कृत 'मां' आदि प्रमुख हैं |

इसी तरह से और भी कुछ ऐसे प्रबंधकाव्यों का सृजन किया गया है, जहां स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को सामने रखा गया है | इसमें से कुछ काव्यों में स्त्री के प्रेयसी पक्ष को हीं रूपायित किया गया है लेकिन ऐसे भी काव्य हैं जिसमें स्त्री की समस्त चेतना को आदर्श रूप में भी और यथार्थ रूप में भी रेखांकित किया गया है |


संदर्भ सूची  :

1. यशोधरा- मैथिलीशरण गुप्त, साकेत प्रकाशन, चिरगाँव-झाँसी, 21वाँ संस्करण 2010, पृ.-03

2. कामायनी, लज्जा सर्ग - जयशंकर प्रसाद, भारती भंडार, इलाहाबाद, दशम् संस्करण 2015 वि.स., पृ.- 106

3. हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, द्वितीय खंड - डॉ गणपति चंद्रगुप्त,  लोक भारती प्रकाशन, संशोधित संस्करण-1989, पृ.- 197

4. वहीं, पृ.- 202

5. वहीं, पृ.- 211

6. वहीं, पृ.- 231


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