हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )

हिंदी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा लक्ष्मीकांत वर्मा द्वारा प्रतिपादित है। उनका मानना है कि साहित्य में या तो समूह मानव को स्थान दिया गया है या महामानव को, लघुमानव सदैव ही दूर रखा गया है। लघुमानव से उनका तात्पर्य उस मानव से है जो अपने यथार्थ में अपनी कमजोरियों, कुंठाओं के साथ जीता है। वास्तव में देखा जाए तो मानव अपनी कमजोरियों से पृथक नहीं है। उसके भीतर अनेक प्रकार की वासनाएं विद्यमान हैं जिसके कारण परंपरावादी उसे निकृष्ट समझता है। लक्ष्मीकांत वर्मा का मानना था कि छायावादी कवि जहां कल्पना लोक में विचरण करते रहे वहीं प्रगतिवादी कवियों के केंद्र में समूह मानव रहा इसमें कहीं भी लघुमानव अर्थात मानव को उसके व्यक्तिगत तौर पर, उपस्थित नहीं किया गया है। 
‘उनका (लक्ष्मीकांत वर्मा) मानना है कि लघु मानव में जिस मानव विशिष्टता एवं आत्मविश्वास का विशेष महत्व है, उसकी उपेक्षा छायावाद एवं प्रगतिवाद दोनों ने किया।’ १
और करीब जाकर देखें तो वास्तव में यहां मनुष्य को उसके एकात्म रूप में देखने का प्रयास है। यहां यह प्रयास किया गया था कि मनुष्य को कैसे समझा जाए, उसे कैसे परिभाषित किया जाए। यहां मनुष्य को समूह का एक अंग देखने के बजाय मनुष्य को स्वयं में पूर्ण रूप में देखने की चेष्टा की गई। नई कविता के दौड़ में चले इस आंदोलन ने वास्तव में यह प्रयास किया था कि मनुष्य को सदैव उसके भविष्य, वर्तमान या फिर समूह की चिंता दबाए रहती है। इन सबके बीच मनुष्य का स्वतंत्र व्यक्तित्व उभरने नहीं पाता है।
"नई कविता के दौर में लक्ष्मीकांत वर्मा द्वारा प्रयुक्त 'लघु मानव' शब्द और उसके पीछे की अवधारणा वास्तव में मनुष्य को समझने और उसे परिभाषित करने का एक प्रयास था, जो आरंभ से ही विरोध का शिकार होता रहा और इसलिए अधिक दिन तक चल नहीं सका।" २
वस्तुतः लक्ष्मीकांत वर्मा लघु मानव की अवधारणा मात्र में ही नहीं बल्कि पूरी नई कविता में ही मानव के स्वतंत्र व्यक्तित्व को पनपते देखते हैं। प्रथम सप्तक में उन्हें यह स्वर कुछ कमजोर अवश्य दिखा लेकिन दूसरे सप्ताह के बाद वे देखते हैं कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता कायम करने में सक्षम हो चुका है। वह अपनी स्वतंत्र सत्ता को न सिर्फ अनुभव करता है बल्कि काव्य में सहजता से व्यक्त भी कर रहा है। वह संप्रदायिक और सामूहिक दिखावे से कटकर स्वतंत्र चेतना की ओर बढ़ रहा है और इस बढ़ने में उसके कदमों में कोई लड़खड़ाहट नहीं है। लक्ष्मीकांत वर्मा लिखते हैं,
 "नई कविता का मूलाधार यह धारणा-शक्ति है, उसकी आंतरिक चेतना इसके प्रति सजग भी है। मनुष्य आज एक ओर अपने विकास के चरमोत्कर्ष पर है; दूसरी और उसे अपनी भाव-भूमि पर भी एक सत्य को सुरक्षित रखना है कि उसमें मनुष्य मात्र के प्रति आस्था है। इसलिए उसकी आस्था अपने में भी है। 
आदमी आज खीजता है, पकता है, टूटता है, बनता है; और इन परिस्थितियों में वह अपने और अपने से बाहर विषावत वातावरण से जूझता है। इस जूझने में, इस टूटने में, इस खीझने में और पकने की प्रक्रिया में निश्चय ही उसका आत्मविश्वास विकसित होता है। संप्रदायों के विष को आज के मानव ने काफी झेला है; इसलिए वह आज अपनी भाषा में बोलना चाहता है, अपनी शैली में कहने के लिए आग्रह करता है। यही उसकी विशेषता है।" ३
 डॉ. अमरनाथ ने लघु मानव को, समस्त मानव आत्मा का उसके लघु कलेवर में अर्थात उसके लघुता में उसके आत्मबोध का परिचय कराने वाली संज्ञा के रूप में परिभाषित किया है। अर्थात लघु मानव शब्द से लघु मानव के आत्म बोध की प्रतीति स्वीकार करते हैं। उन्होंने लिखा है, 
"लघु मानव एक संज्ञा थी जिसे समस्त व्यापक मानव-आत्मा का लघुतम आत्मबोध कहा जा सकता है।" ४
वर्मा जी का मानना है कि समूह का मानव अपने इतिहास- बोध यानी परंपराओं से दबा हुआ है और महामानव भविष्य के लिए आदर्श तैयार करने में लीन है, इसके बीच वर्तमान का मानव कुण्ठित हो रहा है।
"जब हम मनुष्य को, मनुष्य के रूप में ग्रहण करने की चेष्टा करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में सुपरमैन या अधिनायक का चित्र न आकर, लघु मानव का चित्र आता है, जो अपने लघु परिवेश में सतत जीवन के प्रति आस्था बनाए हुए हैं।" ५
एक ओर जहां ईश्वरवादी स्वयं के अहं को त्याग कर ईश्वर में लीन होने की शिक्षा देता है वहीं समूहवादी समाज की अवधारणा पर बल देते हुए व्यक्तित्व को समाज में लीन कर देने की शिक्षा देता है। लेकिन लघुमानव व्यक्तिवाद को मानता है और उसके लिए अहं की प्रधानता है।
"दरअसल अहं की आवश्यकता व्यक्तिवाद का उत्पाद है। लघुमानव ने प्रकारान्तर से व्यक्तिवाद को ही प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि लघुमानव व्यक्तिवाद को महत्व देता है, न कि समाज को।" ६
इस सिद्धांत को यदि एक उदाहरण के द्वारा समझे तो, हम अपने स्वभाविक काम इच्छा को इस कारण से दबाने के लिए विवश हो जाते हैं कि हमारा समूह उसे वर्जित मानता है, उसने उसकी स्वीकृति अपने शर्तों पर दी है, और हमारी महामानवता उसे आदर्श के पथ में बाधक मानता है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस परंपरा और भविष्य के बीच बेचारे मानव (लघुमानव) की प्राकृतिक इच्छा दबी रह जाती है और वह कुंठित होने लगता है। हिंदी साहित्य में आलोचकों ने लघुमानव की अवधारणा को सिरे से खारिज करते हुए इसे कुंठित मानव, छोटा आदमी, कर्दमवासी, असुरवादी, आदि शब्दों से दबा देने का प्रयत्न किया है। उनका मानना था कि लघु मानव की अवधारणा में जिस मानव को उभारा जा रहा है वह समाज से भिन्न है। लघुमानव की अवधारणा पर उक्त आक्षेप सुमित्रानंदन पंत, मुक्तिबोध, नामवर सिंह आदि ने की है। वहीं इस विचारधारा के पक्ष में भी कई कवि, आलोचक, खड़े हुए हैं। ‘रामस्वरूप चतुर्वेदी’ ने लघुमानव की अवधारणा से सहमत होकर कहा है-
 ‘नई कविता मूलतः मनुष्य की उसके वास्तविक परिवेश में उसके सारे लघु हर्ष विषादों के साथ एक मानवीय कथा है।’ ७
रघुवीर सहाय ने माना है कि- ‘छोटा आदमी बराबर छोटा परिवेश नहीं है। छोटा आदमी आसान नहीं है, उसको कलात्मक सामग्री के रूप में उपयोग करना बहुत बड़ा काम है।’ ८
परंपरा से जिस महामानव को साहित्य में रूपायित किया जाता रहा है वह खोखला और बनावटी है, वह अपने स्वाभाविक रूप में वर्णित नहीं है क्योंकि मनुष्य अपने स्वाभाविक कमजोरियों के साथ ही अपने वास्तविक रूप में होता है। मूलत: लघुमानव साहित्य की उस अवधारणा का खंडन करता है जिसने काव्य नायक के रूप में धीरललित, धीरप्रशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत जैसी धारणाओं को जन्म दिया था। लघुमानववाद यह मानता है कि यदि काव्य नायक उदात्त गुणों से संपन्न इंसान ही हो सकता है तब सामान्य मनुष्य साहित्य में कहां स्थान पा रहा है ? वर्मा जी के सामने दूसरा तथ्य प्रगतिवाद जैसे साहित्यिक आंदोलनों को लेकर था जिसमें जितनी भी समस्याएं, जितने भी विषय, काव्य में लिए गए हैं वे सभी समूह की समस्याएं या विषय हैं। वहां मजदूर वर्ग की समस्याएं हैं, किसानों की समस्याएं हैं, शोषितों की समस्याएं हैं लेकिन इतने मात्र से समाज पूरा नहीं हो जाता। समाज में उस उदात्तचरित्र-महामानव और समूह-मानव से इतर भी कुछ है, और बड़े पैमाने पर है। वह है- व्यक्तिगत मानव; इस व्यक्तिगत मानव को कैद कर दिया गया है। उसे अपनी इच्छाएं व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है, क्योंकि उसकी इच्छाएं वासनामयी है, कुंठित है, निम्नस्तरिय है। लेकिन उसकी इच्छाएं शुद्ध प्राकृतिक है जिसे आदर्श चरित्र और समूह के निर्माण हेतु जबरन भेंट चढ़ाया जा रहा है। मनुष्य अपने यथार्थ में राम, कृष्ण, बुद्ध, गांधी, जैसे महान विचार और चरित्र वाला नहीं है। उसके चरित्र में क्षुद्रता है,‌ उसकी इच्छाएं हैं, उसकी कामवासनाएं हैं, और यह उसका दोष नहीं है क्योंकि यह मनुष्य का व्यक्तिगत स्वभाव है। इस मनुष्य को, उसकी इच्छाओं को, साहित्य से वंचित रखा गया है। और उसे साहित्य में स्थान दिलाना ही लघुमानववाद का मूल उद्देश्य है। लक्ष्मीकांत वर्मा का लघु मानवतावाद समाज के बजाय व्यक्ति पर केंद्रित है।  
यहाँ यह भी विचारणीय है कि राम,कृष्ण, युधिष्ठिर, परशुराम जैसे महामानवों के भी जीवन के अंतिम चरण में यह दिख पड़ता है कि वे भी अपनी महानता से काफी हद तक टूट चुके थे। यहां तक कि उनके विचारों में अंततः इस महानता का बोझ ढ़ोते-ढ़ोते एक टूटन सी महसूस होती है। आत्माहंता का बोध वहां काफी जोर पकड़ने लगता है। इन महामानवों के सम्पूर्ण जीवन पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला गया कि ये महामानव अपनी महानता में लीन रहें, अपनी महानता को ढोते रहें और इस क्रम में उन्हें अपनी लघुता अर्थात अपने व्यक्तित्व (यह व्यक्तित्व उसके सामूहिक व्यक्तित्व का सूचक न होकर उसके लघु अर्थात आत्मा व्यक्तित्व का सूचक है) को महसूस करने का अवकाश ही नहीं मिला। और यही कारण है कि जब वे सामूहिक महानता से हटकर अपने नीज की ओर देखते हैं तो उन्हें एक निराशा हाथ लगती है। यह कृष्ण के महामानवता का ही परिणाम है कि उन्हें राधा को त्यागना पड़ा और जीवन के अंतिम चरण में उन्हें सर्वाधिक मलाल इसी बात का था। यह राम की महामानवता ही थी कि उन्हे अपनी पत्नी का त्याग करना पड़ा जिसकी पीड़ा तब-तब उठी जब-जब उनका  महामानव कमजोर पड़ा और लघु मानवता ने जोड़ पकड़ी। 
"वे (लक्ष्मीकांत वर्मा) पूछते हैं क्या यह लघुता उन महानायकों में नहीं है जो हर महत्ता के बाद आत्महत्या करते हैं- चाहे वह राम हों, युधिष्ठिर हों या परशुराम हों या हिटलर, स्तालिन में से कोई हो। वस्तुतः इन महामानवों को आत्म-हत्या करनी ही इसलिए पड़ती है कि लघुता के पोटेंशल का विरोध करते-करते निरर्थकता तक पहुंच जाते हैं।" ९
यह भी नितांत सत्य है कि अपने महानता के मद में मनुष्य सदैव अपनी इच्छाओं को दबाता है, उसे झूठलाता है। अपनी लघुता को झूठलाने का यह प्रयास, प्राकृतिक सत्य को झूठलाना है क्योंकि प्रकृति जब मानव का निर्माण करती है; बल्कि किसी भी जीव-जंतु का, किसी भी प्राणी मात्र का निर्माण करती है तो वह उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण करती है न कि उसके समूह का। समूह का निर्माण मानव स्वयं करता है। महानता का निर्माण मानव स्वयं करता है। यदि यह सिर्फ मानव की परिणति नहीं होती तो प्रकृति अपने द्वारा निर्मित हर जीव में महानता के अहं को भरती जाती। यह सिर्फ मानव की निर्मिति है कि वह महानता के लोभ में अपनी लघुता को सदैव नकारता जाता है। लघुता को झूठलाने का उसका यह दंभ अंततः उसके व्यक्तित्व के क्षरण के रूप में परिणत होत है।
"महत्ता के स्वप्न में या महामानवों के संदर्भ में प्रायः हम इस लघुता को महत्व नहीं देते और इसलिए हम अपनी चिंतन प्रक्रिया में और आचरण में भी केवल अपने को झूठलाते हैं, अपने अस्तित्व और अपने जीवन के प्रति एक दुराग्रह करते हैं।" १०
कहीं-न-कहीं लघुमानवता की अवधारणा साहित्य के हरेक काव्य आंदोलन में किसी न किसी रूप में अकुलाता अवश्य रहा है। हर युग में महानता के आवरण के नीचे एक लघुता कसमसाती रही है लेकिन साहित्य का रचयिता जिन परिस्थितियों या जिन सामाजिक दौर से गुजर रहा होता है उसका वह अतिक्रमण नहीं कर पाता है। लक्ष्मीकांत वर्मा ने आधुनिक संदर्भ में मानव को अनेक स्तर पर टूटते-बिखरते देखा। तब उन्हें यह महसूस करने का अवसर मिला कि एक सुपरमैन, मसीहा या फिर महामानव सदैव लघुमानव के अरमानों की अस्थि पर अपनी विशालता ग्रहण करता है। उसे अपनी लघुता त्यागनी पड़ती है, अपनी इच्छाओं का दमन कर ही वह लोकनायक का रूप ग्रहण कर पाता है। 
"आज इस मानव और इसकी आस्था के अन्वेषण की आवश्यकता इसलिए है कि इतिहास के सुपरमैन या जन सत्ता के अधिनायक अथवा देवदूत या मसीहा ने अपनी समस्त महानता को लघु मानव की बलि देकर ही अपनाया है। कोई महानता जो इस बलि से विकसित होगी वह कहीं-न-कहीं अमानवीय एवं कुंठाग्रस्त भी अवश्य होगी क्योंकि उस महानता के साथ यह निहित है कि जीवन में कुछ ऐसा है जिसकी उपेक्षा करके, जीवन के अतिरिक्त मूल्यों पर बल दिया जा रहा है। यह प्रवृत्ति ही अपने में मानव मात्र के प्रति अविश्वास से आरंभ होती है।" ११
लघु मानवतावाद का पूरा जोर इसी तथ्य पर है कि मनुष्य सदैव समाज के लिए अपनी इच्छाओं की बलि क्यों देता रहे या फिर भविष्य के नाम पर उसकी इच्छाओं को दबाने का प्रयास क्यों किया जाता रहा है ? उसके सामने उसका गौरवमयी अतीत है, भविष्य की चिंताएं हैं; लेकिन उसका वह वर्तमान जो उसके भीतर कुलबुला रहा है, जो उसे आज की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरी कर अपनी इच्छाओं को तृप्त करने के लिए उकसा रहा है उन इच्छाओं को दबाकर वह अपने आप को कुंठित करने के अलावा और क्या कर रहा है। लघुमानवतावाद पर निरंतर यह आरोप लगता रहा किया कुंठा से ग्रस्त मानव, लघुमानव है। लेकिन इस आंदोलन ने प्रश्न ही यही खड़ा किया कि जिन कुंठाग्रस्त मानवों के अस्तित्व की बात यहां की गई है वह मानव आखिर कुंठित हुए ही क्यों हैं ? उनकी इच्छाओं को उनके भीतर दफनाकर उन्हें कुंठित किसने किया है ? गौरवशाली अतीत और स्वर्णिम भविष्य का सपना दिखाकर उसके वर्तमान को उससे छीन लेने का दोषी कौन है ? इन प्रश्नों पर विचार करते हुए लघुमानवतावाद, मनुष्य के लघु स्वरूप, उसकी लघु इच्छा, छोटी-छोटी जरूरत आदि के समर्थन में खड़ा है।

संदर्भ सूची :
१. अंतर्जाल पर अनिरुद्ध कुमार यादव का लेख, ‘नई कविता और लघु मानव का सिद्धांत।’ 
(लिंक- https://jankritimagazine.blogspot.com/2017/06/2017.html?m=1)
२. अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, पहला छात्र संस्करण- २०१२ पृ.- ३१२
३. वर्मा, लक्ष्मीकांत - नयी कविता के प्रतिमान, भारती प्रेस प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.- १५५
४. अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, पहला छात्र संस्करण २०१२, पृ.- ३१२
५.  वर्मा, लक्ष्मीकांत - नयी कविता के प्रतिमान, भारती प्रेस प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.- १६१.
६.  अंतर्जाल पर अनिरुद्ध कुमार यादव का लेख, ‘नई कविता और लघु मानव का सिद्धांत।’
( लिंक- https://jankritimagazine.blogspot.com/2017/06/2017.html?m=1)
७.  चतुर्वेदी, रामस्वरूप - समकालीन हिंदी साहित्य: विविध परिदृश्य, राधाकृष्ण प्रकाशन - २००८ पृ.-१२
८. यथार्थ का अर्थ, संपादक- सुरेश शर्मा, पृ- ६५.
९. अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, पहला छात्र संस्करण २०१२, पृ.- ३१३
१०. वहीं। 
११. वर्मा, लक्ष्मीकांत - नयी कविता के प्रतिमान, भारती प्रेस प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.- १६१

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