साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

                 साहित्य की प्रासंगिकता।
                                         - अमित कुमार मिश्रा।

पिछले कुछ दिनों से मेरे मित्र मुझसे तरह-तरह के प्रश्न पूछ ले रहे हैं। आज एक मित्र ने पूछा, ‘आप लोग, जो साहित्य पढ़ते-पढ़ाते हैं, उससे समाज को क्या फायदा है ?’ अब वैसे तो आदमी कुछ न कुछ बतला दे यह संभव है लेकिन प्रश्नकर्ता उससे संतुष्ट हो ही जाए यह अपने बस की बात नहीं। मेरे मित्र ने मुझे चिंता में डूबा देख एक दिन का मौहलत सोचने के लिए दिया। परिणामस्वरूप अब मैं सोच रहा हूं। तथ्य मेरे समक्ष यह है कि ‘समाज में साहित्य की क्या प्रासंगिकता है’, इसे कौन पढ़ता है, कौन इससे प्रभावित होता है ? मैं साहित्य का छात्र हूं और केवल छात्र ही हूं। अतः मुझे अपनी बात प्रमाणिक रूप से कहने के लिए किसी बड़े आलोचक के कथन का सहारा लेना पड़ेगा, मेरी अपनी क्या सोच है इस बात का महत्व तब तक नहीं है जब तक मैं केवल छात्र हूं। इसलिए मैं उन विचारकों की वाणी स्मरण करने लगा जहां उम्मीद की कोई आशा प्रज्वलित हो रही थी। मेरे सामने कभी प्लेटो आकर कहते हैं, ‘साहित्य समाज के लिए नुकसानदेय है, इसे समाज से बाहर करो। यह लोगों को तुम्हारी तरह आलसी बनाता है, उसकी वीरता को श्रृंगार में डुबोकर मारता है, आदि आदि। कभी अरस्तु आकर खंडन करते हैं, ‘नहीं साहित्य लोगों का संस्कार परिष्कृत करता है, यह समाज के लिए अति आवश्यक है। यह पाठक को भौतिक सुख दे-न-दे मानसिक सुख जरूर प्रदान करता है। इस हड़कंप में पाश्चात्य से लेकर भारतीय विचारक तक मुझे दिख रहे थे। शुक्ल जी आएं, ‘साहित्य को समाज की संचित चित्तवृत्ति का कोष’ बतला कर चले गएं। तत्क्षण प्रेमचंद ने कहा, अरे रुको! दर्पण तो वह दिखलाता है, जो मौजूद है। कुछ गुजरे हुए अश्क भी संभाले रहता है। लेकिन साहित्य तो समाज (राजनीति) के आगे-आगे मसाल लेकर चलता है, उसे राह दिखलाता है।’ प्रेमचंद का सुझाव अच्छा लगा लेकिन यह समय-सापेक्ष नहीं था। उनका दौड़ अलग था। आज साहित्य, राजनीति की गाड़ी का बैक लाइट है, हेड लाइट नहीं। बैक लाइट बनकर राजनीति की पूंछ पकड़कर पुरस्कार पाने का युग है। आजकल राज्यसभा, विधानपरिषद आदि में भी, साहित्य के बैक लाइटों की कुर्सी पर, दिग्गजों की नजर है। साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष वगैरा अनेक पद राजनीतिक बैक लाइटों के लिए सुरक्षित हैं। आज के समय ने प्रेमचंद को झूठला दिया है। कुछ समय बाद नामवर सिंह ने कहा, ‘साहित्य सृजन की प्रक्रिया में, समाज से लेखक, लेखक से साहित्य और साहित्य से पुनः समाज प्रभावित होता है। यह मुझे प्रभावशाली लगा, मैंने सोचा यहीं से कोई जवाब खोज निकालूंगा। मुझे क्या पता था यहां रुकना मेरे लिए और उलझाऊ साबित होगा। सबसे पहला प्रश्न उठा कि समाज तो तब प्रभावित हो जब साहित्य, समाज तक पहुंचे। आज जिस साहित्य का सृजन हो रहा है उसमें, लेखक की कमाई, प्रकाशक की कमाई, विक्रेता की कमाई,……, पुस्तक की कीमत, तीन सौ, पांच सौ, सात सौ,……। समाज की बड़ी संख्या निश्चय ही इसे खरीदने से रही। लेखक और प्रकाशक जिन रसूख वालों को भेंट स्वरूप पुस्तक देते हैं, वे पुस्तक को अपनी अलमारी तक पहुंचाने के अलावे किसी प्रकार की सहृदयता नहीं दिखलाते, कारण उनकी व्यस्त जीवनशैली है। एक वर्ग आता है छात्रों का। यहां दो तरह की परिस्थितियां हैं, जिनका विषय साहित्य नहीं है वे साहित्य में बहुत कम रूचि लेते हैं। कुछ साहित्यिक विषय वाले रुचि लेते हैं, वे बेचारे तो चाय तक उधार पीते हैं, महंगी पुस्तक क्या खरीदेंगे। आज तक मैंने किसी पुस्तक के लोकार्पण में यह नहीं देखा कि किसी छात्र को पुस्तक भेंट की गई हो, उन्हें खरीदने की सलाह दी जाती है। मंच पर विराजमान नेता, प्रोफ़ेसर, अफसर, गरीब और पढ़ाकू हैं अतः उन्हें पुस्तक उपहार स्वरूप दी जाती है। यहां छोटा-मोटा लेखक नामचीन लेखकों को अपनी पुस्तक देकर खुद को सार्थक समझते हैं। उन्हें क्या पता, या शायद जानते भी हो कि, ये नामचीन साहित्यकार मंच से जाते ही उसकी पुस्तक को भूल जाएगा, पढ़ना तो दूर सूंघने की भी जहमत नहीं उठाएगा। लोकार्पण वगैरह में जो बड़े-बड़े विद्वान लोकार्पित पुस्तक पर व्याख्यान देते हैं, वह भी पढ़ कर नहीं देते। यकीन नहीं आता तो सोचिए अभी पुस्तक मिली और पांच-दस मिनट में व्याख्यान है। अब कालिदास को पोथी छूकर ज्ञान प्राप्त करने का समय तो रहा नहीं।
कितना मनोरंजक है जो पढ़ेगा नहीं उसे पुस्तक भेंट की जाती है, जो पढ़ना चाहता है खरीद नहीं पाता। कुल मिलाकर साहित्य समाज से दूर है। लोकार्पण समारोह में जो खर्च होता है उससे यदि साहित्य को पाठक तक पहुंचाया जाए तो संभवत अधिक सार्थक था। पेपरबैक में किताब सस्ती कीमत में उपलब्ध कराना संभव है, लेकिन कोई उसे छापने को तैयार नहीं; कारण वहां कमाई नाममात्र को है। एक दिन घूमते-घूमते मैं भी किताब छपवाने पहुंच गया। वहां पता चला किताब की कीमत ₹450 रखी जाएगी। अब मैं वह किताब खुद के खर्च से लेकर मित्रों को देने से रहा और खरीदने को कहूं किस मुंह से। सभी तो साथ में पैसों की कमी से हाफ-हाफ कप चाय पीते हैं। अतः पुस्तक छपवाने का इरादा स्थगित करना पड़ा। निकला ही था तो सोचा कुछ पत्रिकाओं में भी झांकता चलूं। वहां संपादक महोदय ने कहा, ‘आप देना, मुझे पसंद आया तो कोई एक छाप दूंगा।’ मैं उलझन में फंसा पसंद, नापसंद का निर्णय ये करेंगे तो पाठक क्या करेगा। इन्हें पसंद आए इसके लिए मुझे इनके मनोनुकूल लिखना पड़ेगा और जाहिर सी बात है जो रचना किसी व्यक्ति विशेष की रूचि से प्रभावित होकर लिखी जाए उसमें लेखक की मौलिकता दम तोड़ देगी। बाद में पता चला अब पत्रिका भी समाज में पढ़ी नहीं जा रही, ऐसे में पाठक अपनी प्रतिक्रिया क्या और कैसे देगा ? अर्थात् साहित्य के द्वारा समाज का प्रभावित होना भी संभव नहीं लग रहा है। आलोचको-विचारकों ने समय-समय पर साहित्य का सामाजिक सरोकार सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। यह सही भी है लेकिन आज के साहित्यिक चमक-दमक में समाज (एक बड़ा वर्ग) साहित्य से नजर चुराने को विवश है। साहित्यकार आज समाजिक पहलुओं को विषय बनाने के बजाय राजनीतिक विश्लेषण में अधिक सक्रिय है। एक और छोटी सी बात, आज लेखकों का एक कुनबा बन गया है लेकिन पाठक कहीं नहीं रहे। लोग जो समय पुस्तकों में गुजारते थे अब चेहरे की किताब (facebook) पढ़ने में गुजारते हैं। वहां आप लिख नहीं सकते, वहां किसी पृष्ठ को दो सेकंड का समय देना भी अधिक जान पड़ता है और साहित्य का पृष्ठ एक-आध घंटे का समय जरूर मांगता है, अतः वहां भी पाठकों से जुड़ना मुश्किल है। साहित्य को समाज से जोड़ा जा सके, अरस्तु, प्रेमचंद, शुक्ल जी, नामवर सिंह आदि की समाज और साहित्य संबंधी परिकल्पना साकार हो, इसके लिए जरूरी है कि साहित्य को राजनीति और लोभियों से मुक्त किया जाए। सच्चा साहित्यकार लिखते समय, समाज को सामने रखकर लिखे पुरस्कार और राजनीति को नहीं, किसी प्रकाशक या आलोचक के व्यक्तिक दृष्टिकोण को नहीं। लोकार्पण तथा रसूखदार व्यक्तियों को पुस्तक भेंट करने के बजाय उसे पाठक तक पहुंचाने में राशि खर्च की जाए। अंत में विनयपूर्वक यही कहूंगा कि साहित्य का जुड़ाव समाज से होगा तभी साहित्य समाज को प्रभावित करेगा और समाज साहित्य को दिशा देगा। साहित्य को बाजार से बचाना परम आवश्यक है। बाजार नगरवधू (वेश्याओं) के लिए है कुलवधू के लिए नहीं।

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