द्रुमों की छांव के गीत (डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों से गुजरते हुए)
द्रुमों की छांव के गीत (डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों से गुजरते हुए) - अमित कुमार मिश्रा। सांप्रतिक हिंदी कविता और गीतों में विषय विविधता परिलक्षित होती है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि जीवन के संदर्भों से जुड़कर जो कविताएं और गीत लिखे जाते हैं उनमें जीवन का हर रंग समाया होता है। उसमें राग भी रहता है और आग भी; उसमें जीवन का प्रेम भी है और संघर्ष भी। जो कुछ प्रेयस्कर और श्रेयस्कर है वह सब साहित्य में अपना समुचित स्थान पाता है। श्रेष्ठ साहित्यकार वही है जो जीवन के किसी एक रंग में बंधा न रह कर जीवन के हर रंग को खूबसूरती से रूपायित करे। अभी जो कविताएं और गीत लिखे जा रहे हैं उनमें एक तथ्य ध्यान आकृष्ट करने वाला है कि प्रकृति की ओर रचनाकारों का रुझान कम हुआ है। यह नहीं कहा जा सकता है कि साहित्य को जीवन से काटकर प्रकृति के छांव में ही स्थापित कर देना उचित है परंतु साहित्य में प्रकृति के वर्णन की कमी होना भी ठीक नहीं है। डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों में वैसे तो मानव जीवन और प्रकृति के विविध रूप चित्रित हैं। उनके नवगीतों के भाव एवं कला पक्ष अत्यंत सधे हुए हैं। लेकिन सर्वाधिक ध्य...