संदेश

जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

द्रुमों की छांव के गीत (डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों से गुजरते हुए)

चित्र
 द्रुमों की छांव के गीत   (डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों से गुजरते हुए) - अमित कुमार मिश्रा। सांप्रतिक हिंदी कविता और गीतों में विषय विविधता परिलक्षित होती है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि जीवन के संदर्भों से जुड़कर जो कविताएं और गीत लिखे जाते हैं उनमें जीवन का हर रंग समाया होता है। उसमें राग भी रहता है और आग भी; उसमें जीवन का प्रेम भी है और संघर्ष भी। जो कुछ प्रेयस्कर और श्रेयस्कर है वह सब साहित्य में अपना समुचित स्थान पाता है। श्रेष्ठ साहित्यकार वही है जो जीवन के किसी एक रंग में बंधा न रह कर जीवन के हर रंग को खूबसूरती से रूपायित करे। अभी जो कविताएं और गीत लिखे जा रहे हैं उनमें एक तथ्य ध्यान आकृष्ट करने वाला है कि प्रकृति की ओर रचनाकारों का रुझान कम हुआ है। यह नहीं कहा जा सकता है कि साहित्य को जीवन से काटकर प्रकृति के छांव में ही स्थापित कर देना उचित है परंतु साहित्य में प्रकृति के वर्णन की कमी होना भी ठीक नहीं है।  डॉ. अमरकांत कुमर के गीतों में वैसे तो मानव जीवन और प्रकृति के विविध रूप चित्रित हैं। उनके नवगीतों के भाव एवं कला पक्ष अत्यंत सधे हुए हैं। लेकिन सर्वाधिक ध्य...

रोशनी अमीरी गरीबी नहीं देखती ( डॉ रत्नेश्वर सिंह की कविताओं की समीक्षा)

  अमित कुमार मिश्रा । मानव जीवन के विविधता भरे और सांप्रदायिक उन्माद के इस दौर में सामाजिक सौहार्द की कविताएं लिखी जा रही हैं यह अत्यंत संतोषप्रद है। मानव जीवन की जटिलता जैसे-जैसे बढ़ती है साहित्य की प्रासंगिकता भी बढ़ती जाती है। साहित्य समाज को समाज से, व्यक्ति को व्यक्ति से और मानव को मानव एवं प्रकृति से जोड़े रखने का एक महत्वपूर्ण साधन है। हिंदी साहित्य ने किसी भी दौर में अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ने का प्रयास नहीं किया। हिंदी के जागरूक कवि हर दौर में पाठकों को जीवन की दशा और दिशा से रूबरू कराते रहे हैं। संप्रति अनेक साहित्यकार साहित्यिक-धर्म का निर्वाह करते हुए राजनीतिक दुराग्रहों से अलग हटकर समाज को नई दिशा दिखाने के पथ पर अग्रसर हैं। अभी विषयानुकूल चर्चा की जा रही है डॉ. रत्नेश्वर सिंह की कविताओं की। पिछले दिनों उनकी कुछ कविताएं 'काव्य सरिता' शीर्षक साझा संकलन में प्रकाशित होकर आई हैं। इस संकलन का संपादन सुरेंद्र शर्मा सागर एवं सुधा चौधरी राज जी ने किया है। वैसे तो इस संकलन में डॉ. सिंह के अलावे १९ अन्य कवियों की कविताएं भी प्रकाशित हैं जो विभिन्न समसामयिक मुद्दों से जोड़...

हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद

 हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद - अमित कुमार मिश्रा।  हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद का प्रादुर्भाव यूरोपीय साहित्य की प्रेरणा से हुआ | डॉ० बच्चन सिंह का मानना है कि पूर्वी यूरोप में स्वच्छंदतावाद का उद्भव सामंतवाद और विदेशी शासन के विरुद्ध हुआ | भारतीय स्वच्छंदतावाद अंग्रेजी के स्वच्छंदतावाद से प्रेरित न होकर पूर्वी यूरोप के स्वच्छंदतावाद से प्रेरित है | भारतीय साहित्य में इसका प्रवेश द्वार बांग्ला साहित्य है | उल्लेख्य है कि हिंदी में स्वच्छंदतावाद का कलेवर विशुद्ध भारतीय है | स्वच्छंदतावाद, अंग्रेजी रोमैण्टिसिज्म (Romanticism) का हिंदी रूपांतरण है | हिंदी में इस शब्द का प्रयोग पहली बार संभवतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ही अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में, पं० श्रीधर पाठक की आलोचना के क्रम में किया | "इस प्रकार की स्वछंदता का आभास पहले पहल पं० श्रीधर पाठक ने ही दिया | उन्होंने प्रकृति के रूढ़िबद्ध रूपों तक ही न रहकर अपनी आंखों से भी उसके रूपों को देखा |" 1 यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि आचार्य शुक्ल ने श्रीधर पाठक को ही सच्चे स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक माना है और इस ...

रेणु की पत्रकारिता में मानवीय संवेदना

रेणु की पत्रकारिता में मानवीय संवेदना  अमित कुमार मिश्रा  फणीश्वरनाथ रेणु का नाम हिंदी कथा साहित्य में जितने सम्मान से लिया जाता है उतने ही सम्मान से पत्रकारिता के क्षेत्र में भी लिया जाता है । उन्होंने कथा साहित्य में भी नवीन शैली (आंचलिकता) का प्रतिपादन किया और पत्रकारिता में भी नवीन शैली (रिपोर्ताज) की स्थापना की । हिंदी पत्रकारिता में रेणु ने रिपोर्ताज के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं । वैसे हिंदी रिपोर्ताज रेणु के लिखने से पहले ही विकसित हो चुका था लेकिन रेणु ने इस विधा को एक अलग पहचान दिलायी । रेणु के रिपोर्ताज की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ० अमरनाथ ने लिखा है- ”रेणु के रिपोर्ताज में भाव जगत का एक नया संदर्भ है, जिसमें अनेक क्रांतिकथाएं उभर कर आई हैं ।“ सच्चे अर्थों में रेणु ने पत्रकारिता की हीं नहीं, हिंदी जगत को वास्तविक पत्रकारिता से परिचय भी करवाया । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जब कहा कि ‘आरंभ में साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे से घुले-मिले थे ।’ तब शायद पत्रकारिता और साहित्य विलग हो चुके थे लेकिन रेणु ने पुनः यह प्रमाणित कर दिया कि साहित्य और पत्रक...