रोशनी अमीरी गरीबी नहीं देखती ( डॉ रत्नेश्वर सिंह की कविताओं की समीक्षा)

  अमित कुमार मिश्रा ।

मानव जीवन के विविधता भरे और सांप्रदायिक उन्माद के इस दौर में सामाजिक सौहार्द की कविताएं लिखी जा रही हैं यह अत्यंत संतोषप्रद है। मानव जीवन की जटिलता जैसे-जैसे बढ़ती है साहित्य की प्रासंगिकता भी बढ़ती जाती है। साहित्य समाज को समाज से, व्यक्ति को व्यक्ति से और मानव को मानव एवं प्रकृति से जोड़े रखने का एक महत्वपूर्ण साधन है। हिंदी साहित्य ने किसी भी दौर में अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ने का प्रयास नहीं किया। हिंदी के जागरूक कवि हर दौर में पाठकों को जीवन की दशा और दिशा से रूबरू कराते रहे हैं। संप्रति अनेक साहित्यकार साहित्यिक-धर्म का निर्वाह करते हुए राजनीतिक दुराग्रहों से अलग हटकर समाज को नई दिशा दिखाने के पथ पर अग्रसर हैं। अभी विषयानुकूल चर्चा की जा रही है डॉ. रत्नेश्वर सिंह की कविताओं की। पिछले दिनों उनकी कुछ कविताएं 'काव्य सरिता' शीर्षक साझा संकलन में प्रकाशित होकर आई हैं। इस संकलन का संपादन सुरेंद्र शर्मा सागर एवं सुधा चौधरी राज जी ने किया है। वैसे तो इस संकलन में डॉ. सिंह के अलावे १९ अन्य कवियों की कविताएं भी प्रकाशित हैं जो विभिन्न समसामयिक मुद्दों से जोड़कर लिखी गई हैं और इन कविताओं का महत्व स्वच्छ समाज, देश और वातावरण के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है। किंतु यहां अन्य कवियों की कविताओं की चर्चा नहीं की जा रही है क्योंकि समीक्षा का फलक संपूर्ण रूप में उसे समेटने की इजाजत नहीं देता है। अतः डॉ रत्नेश्वर सिंह की कविताओं से होकर गुजरना ही इस समीक्षा की सीमा है और इसका उद्देश्य भी। 

डॉ. सिंह गीतकार हैं। गीत लिखते हैं और उससे भी बढ़कर विभिन्न पटल पर गीत गाते हैं। उन्हें हिंदी के काव्य प्रेमियों का विशाल समर्थन प्राप्त है। उनकी कविताएं छंद मुक्त विधा में लिखी गई हैं। समग्र रूप से कविताओं को देखने पर यह पता लग जाता है कि उनकी छंद मुक्त कविताएं स्वयं मुक्त होकर पाठकों को उन्मुक्त कर जाती हैं। 

उनकी बहुचर्चित कविताओं में 'माटी का दीया' एक प्रमुख कविता है। कविता में सामाजिक सौहार्द को लेकर मधुर संकेत दिए गये हैं। कवि कहते हैं, "बड़े प्यार से जतन से जलाया था / माटी का एक दीया / इस उम्मीद में कि उसके आसपास के / तमाम बुझे हुए दीए जल जाएंगे ।" [१] नि:संदेह यह व्यक्ति से समष्टि की ओर अग्रसर होने का संदेश है कि एक दीये से संपूर्ण दीया प्रज्वलित हो उठेगा और जीवन से अंधकार को मिटाने की दिशा में यह एक सार्थक पहल होगी। कवि के विश्वास का यह दीया जब जले तो इसकी रोशनी में कुछ विशेषताओं का बड़ा महत्व है। रोशनी चाहे दीये की हो, चाहे विवेक की, चाहे मानव हृदय की उसके प्रज्वलित होने की सार्थकता तभी है जब वह अंधेरे का नाश करे। जब वह अज्ञानता का नाश करे, जब वह द्वेष का नाश करे।  

"रोशनी जो अमीर गरीब नहीं देखती / रोशनी जो हिंदू मुसलमान नहीं देखती / × × × वह छिटकती है समान रूप से सब ओर।" [२]

रोशनी का प्रभाव हर ओर समान रूप से होना चाहिए वह मानव और मानव के बीच भेद मिटाने का कार्य करती है न कि खाई बनाने का। लेकिन वहीं कवि की चिंता इस बात को लेकर और बढ़ जाती है कि मुल्क में बल्कि कहे तो विश्व के हर एक देश में कुछ ऐसे लोग हमेशा मौजूद रहते हैं जो रोशनी को अंधेरे में तब्दील करने पर आमादा रहते हैं। ये लोग समूचे मानव जाति के लिए सदैव खतरा बन कर मंडराते रहते हैं और मानव जाति असुरक्षित रहती है। "आज रोशनी को अंधेरे में / तब्दील करना चाहते हैं / चंद लोग / राइफलों गनों और बमों के धमाके से / आवाम की शांति भंग करने में / लगे हैं चंद लोग।" [३]

कवि, कविता-सृजन की प्रक्रिया में रत रहते हुए निरंतर उस मार्ग को खोज लाने को उद्यत हैं जो शांति और भाईचारे की ओर समाज को ले जाने में सहायक सिद्ध हो। कवि इस बात से वाकिफ है कि देश में चारों ओर जातीय उन्माद और सांप्रदायिक तनाव का माहौल है। यह माहौल एक सुनियोजित योजना के तहत बनाया गया है जिसे मिटाना अत्यंत दुष्कर है क्योंकि इसके पीछे जो राजनीति हो रही है वह निरंतर इस आग को भड़काती रहती है। कवि दृढ़ संकल्पित है कि वह देश में सांप्रदायिक माहौल को बिगड़ने से बचा लेगा और इसके लिए उसका हथियार उसकी कविताएं हैं। "लेकिन उस गाने गुनगुनाने / कहने और लिखने की चाह में / इतना कुछ गा चुका हूँ गुनगुना चुका हूँ / कह चुका हूँ और लिख चुका हूँ / कि एक रास्ता बन गया है / जब भी फैलेगा जहर / जातीय उन्माद का / सांप्रदायिक तनाव का / लोग इसी रास्ते से होकर अपने अपने / घर को जाएंगे।" [४]

इस क्रम में कवि का स्वर अनेक स्थलों पर क्रांतिधर्मा रूप भी अख्तियार कर लेता है। जहां उसे यह लगता है कि अब चांदनी पुष्प-छाया में पलकर सुमधुर, कोमल बनने से काम नहीं चलने वाला है वहां वह जीवन-पथ पर अग्रसर होते हुए आग का रूप अख्तियार कर लेने का संदेश देने से नहीं चूकते हैं।

 समय और समाज के अनुरूप कविताएं लिखना डॉ रत्नेश्वर सिंह की प्रवृत्ति रही है। आज मानव जितना संतप्त बाहर के समाज से है उससे कम आंतरिक कलह से भी नहीं। वह शारीरिक रूप से भी थका हुआ है और मानसिक रूप से भी टूट चुका है। ऐसी अवस्था में मनुष्य के पास दो ही विकल्प बचते हैं या तो वह आत्महत्या कर ले और जीवन की समस्याओं से निजात पा जाए या फिर जमकर जीवन की इन परिस्थितियों से टक्कर लेने के लिए कमर कस ले। "जरूरत इस बात की नहीं कि हम / हर तरह की पीड़ा संताप / घुटन शारीरिक मानसिक उत्पीड़न शोषण को / चुपचाप सहते रहें शांत और सुप्त मन से / बल्कि शोषण की जमीन पर / आग बनकर बरस जाने की जरूरत है आज।" [५] साहित्य सृजन के पथ पर कवि किसी के पद का अनुगमन करना स्वीकार नहीं करते हैं। इसके लिए खुद का अपना अलग रास्ता बनाना कवि को अधिक स्वीकार्य है, "लेकिन मैं सोचता हूं / कि उम्मीद छोड़ देनी होगी / चांद से चांदनी को उधार लेने की बात / अब अपने चेहरे से जगमगाने की जरूरत है आज।" [६] कवि काव्य रचना के दौरान कभी समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, दुश्वारियां और शोषण के प्रति आक्रोशित हो उठता है तो कभी कवि- मन प्रेम की अनंत गहराइयों में उतर कर स्वच्छ और उन्मुक्त प्रेम को ग्रहण करता है। वह चाहता है कि उसके जीवन में प्रेम से भरा एक घर हो जहां जीवन-संग्राम से थक कर जब लौटे तो उसे प्रेम की शीतल छाया मिल सके, "हार जाऊं तो लौट आना चाहूंगा / तुम्हारे पास / क्योंकि तुम / घोंसला हो हमारा।" [७] लेकिन कवि के लिए यह एहसास भी निरंतर बना रहता है कि ऐसे घर का निर्माण हो पाना संभव होना कितना मुश्किल है। हम उस समय में जी रहे हैं जहां दो धूर जमीन के लिए भाई भाई का खून बहाने पर तुला रहता है। वहां एक ऐसे घर का निर्माण अत्यंत कठिन प्रतीत होता है जहां जीवन की उलझनों से थका-हारा मनुष्य लौट कर आए और उसे कुछ क्षण की शांति मिल सके। "कि एक भाई अपने सहोदर भाई के / खून का प्यासा बन बैठा है / दो धूर जमीन के लिए/ ऐसे में धर्म ग्रंथों में / वर्णित सत्य पर तथा महापुरुषों के कथन पर / सहसा नहीं होता है विश्वास।" [८]

कवि अपनी लगभग कविताओं में देश और समाज की समस्याओं को लेकर चिंतित जान पड़ते हैं और इस तथ्य के आधार पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कवि अपने समाज को लेकर, अपने देश को लेकर निरंतर काव्य सृजन में रत है और जन सरोकार से उनका इतना लगाव होना उन्हें जनकवि की श्रेणियों में खड़ा करता है। वे समाज के बिखरने से चिंतित हैं, देश के बिखरने से चिंतित हैं। वे चिंतित है कि उसका प्यारा सा गांव धीरे-धीरे कहीं खोता जा रहा है। वे जब शहर से अपने गांव जाते हैं तो उन्हें अपना गांव नहीं मिलता है। वे अपने गांव की प्राकृतिक छटाओं के लुप्त हो जाने पर चिंतित हैं। 

कवि गांव, घर, देश, समाज आदि के विघटित अवस्था के लिए निरंतर सवाल उठाते हैं। वे सवाल उससे नहीं करते हैं जो तलवार की बात करता है अपितु उनका सवाल उससे है जो तलवार पर चलने की हुनर रखता है। उनका सवाल उनसे नहीं है जो इन सबों को बिखेरने के लिए जिम्मेदार है उनका सवाल उनसे है जो इन्हें फिर से सवारने की क्षमता रखता है 'कि क्या वह कवि के साथ मिलकर अपने गांव, समाज को फिर से सवारने के उद्योग में लग सकता है। "यह सवाल मैं उनसे नहीं पूछता / जो महज तलवार की बात करते हैं / बल्कि यह सवाल उनसे है / जो तलवार की धार पर चलते हैं।" [९]

रत्नेश्वर सिंह की कविताओं पर बात करते हुए अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि कवि ने जीवन के विविध प्रसंगों को लेकर कविताएं लिखी है लेकिन अभी उनके हृदय से बहुत उद्गार निकलने बाकी हैं। कवि खुद भी अपने अब तक के सृजन से संतुष्ट नहीं हैं, उनकी प्यास बाकी है। वे जानते हैं कि अभी बहुत कुछ लिखना, कहना बाकी रह गया है, "मैं जो गीत गाना चाहता था / वह गा नहीं पाया अब तलक / जो मैं छंद गुनगुनाना चाहता था / गुनगुना नहीं पाया अब तलक / जो कहना चाहता था, लिखना चाहता था / वह न कह पाया, न लिख पाया / अब तलक।" [९०] तो इस अवस्था में पाठकों को एवं उनकी कविताओं और गीतों के प्रिय, श्रोताओं को उनके आगे के साहित्य-सृजन की अपेक्षा रहेगी ।


संदर्भ  :

१ . माटी का दीया - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

२ . माटी का दीया - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

३ . माटी का दीया - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

४ . गीत नहीं गा सका अब तलक - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

५ . जरूरत - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

६ . जरूरत - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

७ . तुम घोंसला हो हमारा - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

८ . दो धूर जमीन - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

९ . पीले सूखे पत्तों की पीड़ा - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 

१० . गीत नहीं गा सका अब तलक - रत्नेश्वर सिंह, काव्य सरिता - साझा काव्य संकलन, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ उत्तर प्रदेश। 


अमित कुमार मिश्रा

अतिथि व्याख्याता, हिंदी विभाग, हरिहर साह महाविद्यालय उदाकिशुनगंज, मधेपुरा।

संपर्क  - 9304302308


टिप्पणियाँ

  1. समीक्षा अच्छी है. साहित्यिक शुरुआत, साहित्य- कर्म भी. समीक्षा का धर्म ही है कि रचना में अन्तर्निहित सौन्दर्य, कहन, उद्देश्य आदि ( जो आम पाठक के पल्ले से बाहर हो) को सर्वसाधारण के लिए सुलभ बना दे. यह काम समीक्षक ने बखूबी किया है. कवि की रचनाधर्मिता, सामाजिक ताने- बाने को टूटने से बचाने की छटपटाहट, मानव- पुरुषार्थ, आशावादिता, कुछ कर गुजरने की प्यास/ ललक सब आपने उभारा है. इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं. वैसे कवि से परिचय के नाते कहा जा सकता है कि रत्नेश्वर जी के कथ्य और कर्म में अंतर नहीं है. वे जो सोचते हैं करते हैं रचते हैं और उसी में जीते भी हैं. इसलिए उनकी रचना सीधे मर्म तक पहुंचती है.---- नरेंद्र

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  2. बहुत आभार सर आपका इस स्नेह पूर्ण उद्गार के लिए।

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  3. कुशलतम समीक्षक डॉ रत्नेश्वर सिंह जी की रचनाओं की समीक्षा निसंदेह गर्व का विषय बन जाती है क्योंकि डा. साहब स्वयं मानव मन की अनुभूतियों के कुशलतम चितेरे हैं। इनकी रचनाओं का प्रवाह तीव्र और आयाम अत्यंत विस्तृत होता है। वहां तक पहुंचने वाला मस्तिष्क व हृदय ही उनका समग्र विश्लेषण कर सकता है। निसंदेह श्री अमित कुमार मिश्रा जी ने अपनी समीक्षा में आदरणीय डा. साहब की रचनाओं के विविध, विशिष्ट आयामों को सहजता से न सिर्फ स्पर्श किया है, बल्कि उनके मर्म को सांगोपांग सरलीकृत रूप में निरूपित करने में सफल रहे हैं। बहुत बधाइयां इनको और श्रेष्ठ रचना धर्मी कलमकार डा. रत्नेश्वर सिंह जी को।

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  4. इस आत्मीय टिप्पणी से हृदय आह्लादित हो उठा, अनंत आभार।

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  5. आपका कोई जवाब ही नही
    जैसे उत्कृष्ट अद्भुत गुरु वैसे ही अद्भुत शिष्य
    नमन है आपको इस बेहतरीन समीक्षा हेतु
    हार्दिक बधाइयां एवं कोटि कोटि आभार

    जवाब देंहटाएं
  6. आपका कोई जवाब ही नही
    जैसे उत्कृष्ट अद्भुत गुरु वैसे ही अद्भुत शिष्य
    नमन है आपको इस बेहतरीन समीक्षा हेतु
    हार्दिक बधाइयां एवं कोटि कोटि आभार
    शकुन्तला तोमर ग्वालियर

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  7. आत्मीय आभार मैडम शकुंतला तोमर जी आपका, आपकी इस टिप्पणी से अभिभूत हूं। आभार इसलिए भी कि
    आपने कविता के मर्म को समझा।

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  8. आदरणीय डॉ रत्नेश्वर सिंह जी मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर स्वयं एक कुशल समीक्षक, रचनाकार और गीतकार हैं जो अपने आप में एक सुखद विरोधाभास है, नदी के दो तट की भाँति है। आपकी रचनाओं की समीक्षा आपके शिष्य डॉ अमित कुमार मिश्रा द्वारा किया जाना और भी सुखद एहसास है। आप समीक्षा के गुण, कर्म और धर्म का पूर्णत निर्वाहन करते हुए दिखाई देते हैं। सरल और सहज शब्दों में रचना का संक्षिप्त विश्लेषण करके आम जन के लिए और सहज बना दिया है। अत: साहित्य को आपसे अनेक संभावनाएँ और उम्मीदें हैं। निश्चित रुप से आप बधाई और साधुवाद के पात्र हैं। सुंदर भविष्य की कामना में***
    मंजुला श्रीवास्तवा
    11/01/2022

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  9. आत्मीय आभार मैडम मंजुला श्रीवास्तव जी आपको प्रो अमित कुमार मिश्रा जी की समीक्षा पसंद आई ।आपके इस सकारात्मक टिप्पणी से अभिभूत हूं।
    डॉक्टर रत्नेश्वर सिंह।

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  10. आत्मीय आभार मैडम मंजुला श्रीवास्तवा आपको प्रो अमित कुमार मिश्रा के द्वारा की गई समीक्षा पसंद आई। आपके सकारात्मक टिप्पणी से अभिभूत हूं, धन्यवाद।
    डॉक्टर रत्नेश्वर सिंह
    दिनांक 11 जनवरी 2022

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