संदेश

जुलाई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आज का भारतीय समाज और प्रेमचंद (लेख).

आज का भारतीय समाज और प्रेमचंद। प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में कथा सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है। किसी भी रचनाकार को सम्राट की उपाधि यूं ही नहीं मिल जाती है। सम्राट अपने क्षेत्र का एकछत्र राजा होता है। प्रेमचंद के साहित्य का जब हम अवलोकन करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को मनोरंजन और तिलस्म के दलदल से उबार कर यथार्थ की उस भूमि पर स्थापित किया जहां से भारतीय साहित्य को एक नवीन उत्कर्ष प्राप्त हुआ।  आज जिस हिंदी साहित्य का डंका पूरे विश्व में बज रहा है उस हिंदी का स्वरूप खासकर गद्य का स्वरूप मनोरंजन के अलावे पाठकों को कुछ भी देने में असमर्थ था। हां कुछ उपदेश अवश्य मिल जाते थे लेकिन वे साहित्य समाज सापेक्ष नहीं थे। भारत के सामने जितनी बड़ी समस्या यह थी कि वह अंग्रेजों की पराधीनता से स्वतंत्रता अविलंब प्राप्त करें उससे बड़ी समस्या यह थी कि भारतीय जनमानस में व्याप्त कुरीतियों का निवारण जल्द से जल्द हो। शासन से त्रस्त लोगों की संख्या उतनी नहीं थी जितनी संख्या में लोग कुरीतियों और सामाजिक विडंबनाओं के कारण त्रस्त थे। कबीरदास के बाद ऐसा लगता था शायद भार...

रिश्तों की हकीकत (लघुकथा)

रिश्तों की हकीकत (लघुकथा) मनोहर रोज की तरह सुबह से ही अपनी नई गाड़ी को धोने-साफकरने में लगा हुआ था। यह उसके नित्यप्रति का नियम था कि घंटों अपनी गाड़ी को पहले पानी से धोता फिर सूखे कपड़े से पोछकर उस पर तेल लगाता। गाड़ी हमेशा चमचमाती रहती। मनोहर हमेशा ख्याल रखता कि गाड़ी पर कोई खरोच न आए। अपनी गाड़ी पर मनोहर का स्नेह जितना बढ़ता परिवार के प्रति उसका रूप उतना ही उग्र होता जा रहा था। आज जब उसने अपनी गाड़ी चमचमा कर लगाई उसके कुछ ही देर बाद उसका बड़ा भाई अपनी गाड़ी निकाल रहा था। भूलवश उसका पैर मनोहर की गाड़ी से जा लगा। बस फिर क्या था मनोहर ने अपने भाई (बड़े भाई) को जमकर लताड़ लगाया और यह कह कर माफ कर दिया कि, 'आज तुम्हारा दिन अच्छा था वर्ना अभी तक मैं थप्पड़ लगा चुका होता।' दो खरोच आई थी, एक गाड़ी पर दूसरा किसी के दिल पर। मनोहर कपड़े को तेल में भिगोकर गाड़ी का खरोच मिटाने लगा।

थोड़ी सी आग (कविता)

थोड़ी सी आग थोड़ा सा पानी और अन्न के कुछ दानें चाहिए मुझे, मेरे जीवन के लिए। कुछ कपड़ें एक खपरैल और खिलखिलाते बच्चें चाहिए मुझे, मेरे सुख के लिए। मैं चाहता हूं बस इतना दे दो मुझे बाकी की दुनिया तुम रख लो मैं नि:स्वार्थ खिलखिलाते बच्चों की हंसी को अपनी जमा पूंजी की तरह संजोए रखना चाहता हूं मेरे जीवन के लिए।

रथ में मेरा हौसला जुता रह गया (गज़ल)

सीने से लगते ही मेरे पिघल गया दो कतरा आंसू ही सब कह गया । बारिशों  की  इसमें  शरारत  नहीं धूप निकली और मकां मेरा ढ़ह गया । बदन में बाकी थी साँस ही इतनी दिन ढ़लने से पहले सूरज छिप गया। मेरी चिता की आग बुझने न देना सब जल गया मगर ख़ाक रह गया। सूरज का घोड़ा तो दम तोड़ चुका रथ में मेरा हौसला जुता रह गया । मैं वारिस हूँ इसकी निशां नहीं मिटने दूंगा चिराग बुझ गएं मेरी आंख में उजाला रह गया। -अमित कुमार मिश्रा .

जिजीविषा (कविता)

थोड़ी खुशी और बहुत अचरज हुआ यह देख कर कि मेरे मोहल्ले का वह बुजुर्ग अभी भी अपनी बदहाली में जिंदा है दो बरस पहले जब मैं उन्हें देखकर शहर गया था यही महसूस किया अब ये कुछ महीनों से ज्यादा नहीं जीने वाले लेकिन उन्होंने कहा था, 'अभी मेरी जिंदगी लंबे अरसे तक चलने वाली है। भीष्म याद है तुम्हें, जिसने मृत्यु को अपने बस में कर रखा था? मैं वैसा योद्धा तो नहीं लेकिन मेरी जिजीविषा कतई कमजोर नहीं। मेरे पांच पुत्र हैं और मैंने संकल्प कर रखा है मैं दम तोड़ूगा तो उसी समय जब वे पांचों मेरे पास होंगे और मैं जानता हूं वह दिन आना कितना मुश्किल है। जब से गए हैं मेरे बेटे गांव छोड़कर कभी एक तो कभी दूसरा आता तीन-चार दिनों में वापस चला जाता। मुझे शिकायत उनसे नहीं क्योंकि जानता हूं गांव में उनके पास जीविका का साधन भी नहीं शहर में वे जीवन के प्रति संघर्षरत तो है यहां तो संघर्ष करने को कुछ बचा ही नहीं। मुझे याद नहीं अंतिम बार कब इकट्ठे मेरे पास आए थे सभी शायद तब जब उसकी मां का निधन हुआ था। वह भी बाट जोहती रही थी एक बार, सिर्फ एक बार अपने सभी पुत्रों को एक साथ देख ले फिर खु...

ताउम्र जिंदगी तन्हा ही बसर कर आया (गज़ल)

जिन्दगी  तू  मुझे  किस  मोड़ पर ले आया एक बार फिर उसके दहलीज पर ले आया। मैं  कतराता  रहा  हूं  जिसकी  राह में आने से तू बहला कर मुझे उसकी जिन्दगी में ले आया। सब झेला है, तेरी यह ठिठोली भी सह लूंगा अपनी बिसात पर तू मुझे मोहरा बना लाया। अपनी  पारी  तो हमने कभी खेली ही नहीं वक्त मेरी जिन्दगी को खिलौना बना लाया। अरे, तू मुझसे मिलने आया भी तो उस वक्त जब मैं खुद  को खुद ही से जुदा कर आया। अब तो दरवाजा खोल दे हवाओं के लिए 'अमित' ताउम्र  जिंदगी  तन्हा  ही  बसर  कर  आया।