रथ में मेरा हौसला जुता रह गया (गज़ल)
सीने से लगते ही मेरे पिघल गया
दो कतरा आंसू ही सब कह गया ।
बारिशों की इसमें शरारत नहीं
धूप निकली और मकां मेरा ढ़ह गया ।
बदन में बाकी थी साँस ही इतनी
दिन ढ़लने से पहले सूरज छिप गया।
मेरी चिता की आग बुझने न देना
सब जल गया मगर ख़ाक रह गया।
सूरज का घोड़ा तो दम तोड़ चुका
रथ में मेरा हौसला जुता रह गया ।
मैं वारिस हूँ इसकी निशां नहीं मिटने
दूंगा
चिराग बुझ गएं मेरी आंख में उजाला
रह गया।
-अमित कुमार मिश्रा .
दो कतरा आंसू ही सब कह गया ।
बारिशों की इसमें शरारत नहीं
धूप निकली और मकां मेरा ढ़ह गया ।
बदन में बाकी थी साँस ही इतनी
दिन ढ़लने से पहले सूरज छिप गया।
मेरी चिता की आग बुझने न देना
सब जल गया मगर ख़ाक रह गया।
सूरज का घोड़ा तो दम तोड़ चुका
रथ में मेरा हौसला जुता रह गया ।
मैं वारिस हूँ इसकी निशां नहीं मिटने
दूंगा
चिराग बुझ गएं मेरी आंख में उजाला
रह गया।
-अमित कुमार मिश्रा .
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