रथ में मेरा हौसला जुता रह गया (गज़ल)

सीने से लगते ही मेरे पिघल गया
दो कतरा आंसू ही सब कह गया ।

बारिशों  की  इसमें  शरारत  नहीं
धूप निकली और मकां मेरा ढ़ह गया ।

बदन में बाकी थी साँस ही इतनी
दिन ढ़लने से पहले सूरज छिप गया।

मेरी चिता की आग बुझने न देना
सब जल गया मगर ख़ाक रह गया।

सूरज का घोड़ा तो दम तोड़ चुका
रथ में मेरा हौसला जुता रह गया ।

मैं वारिस हूँ इसकी निशां नहीं मिटने
दूंगा
चिराग बुझ गएं मेरी आंख में उजाला
रह गया।

-अमित कुमार मिश्रा .

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