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बचपन जवानी बुढ़ापा (कविता)

बचपन जवानी बुढ़ापा इस बचपन और बुढ़ापे के बीच सचमुच कुछ आता है क्या ? मैं निरंतर ढूंढता हूं उस कड़ी को, जिसने मुझे बचपन से बुढापा तक लाया । मजदूर पिता ने बचपन में जो खिलौने दिए थे उसमें खिलौना नहीं था काम से बेकार पड़ा सामान था, जिस पाठशाला में भेजा गया वहां पढ़ाई नहीं सिर्फ खिचड़ी थी, बारह वर्ष की उम्र में मैंने काम पकड़ी थी। बीते समय के साथ जवानी नहीं आई आएं तो, बीवी, बच्चे और बुढ़ापा जवानी ने आंह नहीं भरी, अंगराई नहीं ली न ही अरमान मचलें। इन तीन बच्चों का जनक भी यौवन का उन्माद नहीं एक सामान्य थका हुआ जीवन है। दस-बारह घंटे मजदूरी के बाद पत्नी का यौवन भी बोझ सा लगता है, बच्चों की ठिठोली अनजानी और उसकी बोली बेगानी लगती है । दिन भर रिक्शा नहीं पाताल से अपने लिए सांस खींचता हूं शाम को सस्ती शराब पीता हूं । सच कहूं तो पहले थकान मिटाने को पीता था अब जिस्म में सिर्फ शराब ही बचा है, आंखों से अब धुंधला दिखता है अठाईस वर्षीय पत्नी के चेहरे पर झुर्रियों का पहरा लगता है । दो बच्चे चिथड़े में नंगा बचपन गुजारते हैं बड़ा पिछले वर्ष से काम पड़ जाता है बिना जवान हुए व...

कबीर का मानवतावाद (लेख)

 कबीर का मानवतावाद - सीमा कुमारी . कबीरा तुमने क्या पाया, सच से नेह लगाए सच का दर्पण या जग में कौड़ी मोल बिकाये। कबीरदास को इस लोक में अवतरित हुए लगभग सवा छः सौ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन समय आज भी वहीं का वहीं ठहरा हुआ है। कबीर यदि आज भी होते तो उसी तरह जंजीरों में बांधकर डूबोए गए होते, हाथी के पैरों तले रौंदवाए गए होते और यकीन मानिए कबीर तब भले ही बच निकले हो आज बचना नामुमकिन होता। कबीर ने समाज को सच का आइना दिखाने का जो दुस्साहस किया उसकी सजा हर युग में एक समान होती है।  मैं कबीर को भगवान या कोई अवतारी पुरुष नहीं मानता हूं। मेरी नजर में वे एक नायक की तरह हैं जिसका इस समाज में पैदा होकर विकसित होना आश्चर्य की बात कदाचित नहीं है। उन्हें भगवान या अवतारी पुरुष की संज्ञा देकर लोग उन्हें आमजन से अलग कर देने पर उतारू होते हैं ताकि यह साबित कर दिया जाए कि कबीर ने जो किया वह करना किसी आमजन के लिए, किसी सामान्य पुरुष के लिए संभव नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि लोग कबीर से प्रेरणा लेकर सच के मार्ग पर अडिग रहें। समाज को सन्मार्ग पर लाने की लड़ाई में खुद आगे बढ़ें न की किसी...

छायावाद का यह संयोग

छायावाद का यह संयोग .   सीमा कुमारी . छायावादी काव्य में प्रकृति के मानवीकरण को बड़ा महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। छायावाद के सभी कवियों ने प्रकृति को मानवीय स्वरूप में इस तरह चित्रित कर दिया है जैसे वह साक्षात मूर्तिमय होकर नजरों के सामने तैर रहा हो। इसमें जो सर्वाधिक सुखद अनुभूति मिलती है वह यह है कि इनके काव्य में एक समय-तारतम्य सा नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति अपने सुंदर स्वरूप में, एक ही दिन में इन सभी रचनाकारों का आमंत्रण स्वीकार करती है और अलग-अलग समय पर इनके पास जाती है, इन्हें आनंद विभोर करती है और कविता का वरदान देकर कहीं और अपना वादा निभाने लौट पड़ती है। सबसे पहले आमंत्रण स्वीकार होता है 'जयशंकर प्रसाद' का और यह प्रकृति, सुंदरी-उषा का वेश धारण कर  उनके हृदय पर दस्तक देती है। जयशंकर प्रसाद उस सुंदरी का वर्णन करते हुए लिखने हैं, अंबर पनघट में डुबो रही तारा-घट उषा नागरी। अंबर रूपी पनघट में जल भर्ती हुई यह सुंदरी, जयशंकर प्रसाद के मन को मोहित कर वहां से इठलाती-बलखाती हुई चल पड़ती है। दिन भर का सफर तैय करती है और पहुंच जाती है निराला को आत्मविभोर करने। संध्य...

हर मूरत में प्रिय! तेरी सूरत देखता हूं।

आंख खुलते ही अक्सर तुम्हें देखता हूं तुम ही आती नजर हो जिधर देखता हूं। रूप तेरी बसी है निगाहों में ऐसी खुद में झांकू भी मैं तो तुम्हें देखता हूं। दर्पणों ने किया है शरारत ये कैसा जब भी गुजरूं इधर से तुम्हें देखता हूं। होश में भी मदहोशी का असर देखता हूं अक्स मदिरा में तिरते तेरा देखता हूं। मंदिर-मस्जिदों के लाख खाक छाने है मैंने हर मूरत में प्रिय! तेरी सूरत देखता हूं। - अमित कुमार मिश्रा।