छायावाद का यह संयोग

छायावाद का यह संयोग .
  सीमा कुमारी .

छायावादी काव्य में प्रकृति के मानवीकरण को बड़ा महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। छायावाद के सभी कवियों ने प्रकृति को मानवीय स्वरूप में इस तरह चित्रित कर दिया है जैसे वह साक्षात मूर्तिमय होकर नजरों के सामने तैर रहा हो। इसमें जो सर्वाधिक सुखद अनुभूति मिलती है वह यह है कि इनके काव्य में एक समय-तारतम्य सा नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति अपने सुंदर स्वरूप में, एक ही दिन में इन सभी रचनाकारों का आमंत्रण स्वीकार करती है और अलग-अलग समय पर इनके पास जाती है, इन्हें आनंद विभोर करती है और कविता का वरदान देकर कहीं और अपना वादा निभाने लौट पड़ती है। सबसे पहले आमंत्रण स्वीकार होता है 'जयशंकर प्रसाद' का और यह प्रकृति, सुंदरी-उषा का वेश धारण कर  उनके हृदय पर दस्तक देती है। जयशंकर प्रसाद उस सुंदरी का वर्णन करते हुए लिखने हैं,
अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट उषा नागरी।
अंबर रूपी पनघट में जल भर्ती हुई यह सुंदरी, जयशंकर प्रसाद के मन को मोहित कर वहां से इठलाती-बलखाती हुई चल पड़ती है। दिन भर का सफर तैय करती है और पहुंच जाती है निराला को आत्मविभोर करने। संध्या के समय वह परी के रूप में निराला के हृदय को मोहित कर लेती है और निराला लिखते हैं,
दिवसावसान का समय-
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या सुंदरी, परी सी,
धीरे, धीरे, धीरे.
सांझ का समय निराला के साथ गुजार कर वह प्रकृतिक सौंदर्य फिर वहां से बिजली सी चमकती, लचकती हुई चल पड़ती है और अपने लाज-संकोच के कारण उसे रात किसी पुरुष के साथ गुजारना गवारा नहीं होता है। वह रात में आतिथ्य स्वीकारती है, छायावाद की कवयित्री 'महादेवी वर्मा' का। महादेवी वर्मा के ह्रदय में रात का प्रवास करते हुए वह उनके हृदय को भाव निमग्न कर देती है और उसी भाव में डूबी हुई महादेवी लिखती हैं,
धीरे-धीरे उतर क्षितिज से
आ वसंत रजनी।
कितना सुखद संयोग है अगर इन रचनाओं के रचनाकाल की दूरी को मिटाकर सिर्फ रचना को देखी जाए तो ऐसा लगता है जैसे यह सौंदर्य रूपी प्रकृति सुबह उठकर प्रसाद से मिल, दिन भर बाबरी सी फिरती हुई निराला के पास जाती है और रात घिरती देख लरजती हुई वहां से उठ भागती है और महादेवी जी के घर जाकर विश्राम करती है। यह एक मुग्ध कर देने वाला सुखद संयोग जान पड़ता है।
अब एक प्रश्न उठता है कि इन दिनों छायावाद के चौथे स्तंभ 'पंत जी' कहां थे, उन्होंने उस सुंदरी को आमंत्रित क्यों नहीं किया ? सुंदरी ने, दोपहर में जो खाली समय बचा था उस समय पंत जी का आतिथ्य क्यों नहीं स्वीकार लिया ? इसका उत्तर स्वयं पंत जी के काव्य में मिलता है कि बाकी तीन कवियों ने उस सुन्दरी को आमंत्रित किया, अपने घर बुलाया, जबकि पंत जी खुद अपना घर छोड़ कर उस सुन्दरी की गोद में ही जा बसे थे। ऐसे में  उन्हें उस सुंदरी को कहीं अन्यत्र बुलाने की आवश्यकता ही क्या थी ?
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
कैसे उलझा दूं लोचन
बाले तेरे बाल जाल में।
हिंदी साहित्य में निमग्न कर देने वाला ऐसा संयोग छायावाद के अलावे और कहीं नहीं दिखता। सच में छायावाद हिंदी साहित्य का मनोहारी युग है।

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