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प्रेम पुजारी ( कविता )

हर शै के तह में जाकर देखो कोई और फसाना होता है। हर यार वफा की मूरत है बस वक्त बेवफा होता है। कैसे तेरा दिल तोड़ेगा दिल जिसका बसेरा होता है। क़ायम न रहा जो वादे-वफा पर वह कोई लूटेरा होता है। मंदिर के देवता को छोड़ो पत्थर बस पत्थर होता है। तू लाख पटक ले सिर चाहे कोई सुनवाई न होता है। सच्चा इक मीत बनाकर देख कुछ कहे बिना सब सुनता है। 'अमित' ऐसे दिवानों का कायल जो प्रेम पुजारी होता है। @ अमित कुमार मिश्रा।

दिल की आवाज ( कविता )

जिंदगी के आंचल से कुछ लम्हे चुरा लिया करता हूं मैं गीत नहीं लिखता दर्द की दुकान लगा लिया करता हूं. जो गम का भारी बोझ हो सीने पर, आ जाना मेरे पास मैं खुशी के बदले गम को खरीद लिया करता हूं. ये बेखबर समझते हैं जिंदगी की तलाश में हैं हम मैं तो हर सांस में मौत को आवाज दिया करता हूं। हाथ टूटे, पैर टूटे, दिल भी टूटे, इससे क्या? मैं मिट्टी हूं, मिट्टी में मिल जाने को बेताब रहा करता हूं। जिन्हें चाहत हो, उन्हीं को मिले जिंदगी में मुकाम मैं राहगीर हूं, सफर में ही मस्त रहा करता हूं। बहुत दिखा चुका अब समेट लूं अपने दर्द की दुकान कुछ अश्क ऐसे भी हैं जिन्हें आंखों में समेट लिया करता हूं। @ अमित कुमार मिश्रा।