दिल की आवाज ( कविता )

जिंदगी के आंचल से कुछ लम्हे चुरा लिया करता हूं
मैं गीत नहीं लिखता दर्द की दुकान लगा लिया करता हूं.

जो गम का भारी बोझ हो सीने पर, आ जाना मेरे पास मैं
खुशी के बदले गम को खरीद लिया करता हूं.

ये बेखबर समझते हैं जिंदगी की तलाश में हैं हम
मैं तो हर सांस में मौत को आवाज दिया करता हूं।

हाथ टूटे, पैर टूटे, दिल भी टूटे, इससे क्या?
मैं मिट्टी हूं, मिट्टी में मिल जाने को बेताब रहा करता हूं।

जिन्हें चाहत हो, उन्हीं को मिले जिंदगी में मुकाम
मैं राहगीर हूं, सफर में ही मस्त रहा करता हूं।

बहुत दिखा चुका अब समेट लूं अपने दर्द की दुकान
कुछ अश्क ऐसे भी हैं जिन्हें आंखों में समेट लिया करता हूं।


@ अमित कुमार मिश्रा।

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