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सच से मुठभेड़ (लेख)

सच से मुठभेड़.                   “सीने का दर्द कल भी जिंदा था,                     आज भी मुकम्मल है।                     सच का स्वाद कल भी कड़वा था,                     आज भी जहरीला है।” आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है ‘प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।’ हम जैसे छात्र जो शुक्ल जी के इतिहास के सहारे ही डेगा-डेगी आगे बढ़ता रहा है, उस में इतना साहस नहीं कि शुक्ल जी की मान्यता का खंडन कर दे। तब तो बिल्कुल नहीं जबकि इतिहास को समझने की क्षमता भी विकसित नहीं हुई है। खैर, इसी मान्यता के आलोक में मैं दो-चार बात कहने की कोशिश करूंगा। दो-चार बात ही इसलिए की उससे अधिक कहने की मेरी क्षमता नहीं है। हम सभी चाहते हैं कि हमारा समाज, हमारा देश, भ्रष्टाचार और क्षुद्रता से आगे बढ़े। देश-समाज की नींव विद्यालय और महाविद्यालयों में पड़ती है। इन स्थानों पर एक स्...

प्राणदान, ( कहानी.)

प्राणदान                    सुबह से ही घर के सारे लोग तैयारी में लगे हैं, आस-पड़ोस में उत्सव का माहौल बना हुआ था, सभी कुछ-न-कुछ भूमिका निभाने में तल्लीन हैं। प्राणेश बाबू आज अपनी बेटी का तिलक लेकर जाने वाले हैं। सुलेखा के लिए वे पिछले चार वर्षों से वर की तलाश कर रहे हैं। उन्हे तो कई रिश्ते पसंद आए लेकिन लड़के वालों की मांग स्वीकारना उनके लिए संभव नहीं हो सका। वैसे सुलेखा ने बी.एस.सी. तक की पढ़ाई की है, गृह कार्य में निपुण है, लेकिन भारत में बहू-बेटी लक्ष्मी मानी जाती है। अब सोचिए, लक्ष्मी जिस घर से विदा हो रही हो वह कर्ज में न डूबे और जिस घर में जा रही हो वहाँ पांच-दस लाख शगुन न आ सके तो लानत है ऐसी लक्ष्मी पर।  सुलेखा के लिए जिस वर की तलाश प्राणेश बाबू ने की है वह सर्वगुण संपन्न है, साक्षात भगवान राम। बल्कि राम से भी गुणी। राम, पिता के कहने पर घर से गए थे, ये महाशय संदीप जी, गांव के पंचायत में लड़की छेड़ने का मामला आते ही गृह त्यागकर दिल्ली चले गए। जाते समय कुछ पैसा भी घर से लेकर गए थे। दो वर्ष बाद लौटे हैं।  संदीप के पिता, ...

यही सच है. (व्यंग्य कविता)

बीए किया, एमए किया, कर बैठा गुनाह बाप के पैसे से होता है निर्वाह। बार-बार फारम में लगता है पैसा बाप सोचे, पूत कपूत निकला कैसा। हर बार जाता हूं, देता हूं इंटरव्यू घर को लौट आता हूं,‌ लटका कर मुंह। आमदनी कुछ नहीं, पैसे कैसे बचे बेरोजगारी में साले साले जनते हैं बच्चे। खाली जेब बीवी को लगता हूं फटीचर कहती है धोखा दिया, बतलाकर भावी टीचर। मिसाल देकर, बच्चों को लोग करे भयभीत साला, पढ़-लिख कर क्या करेगा, बनेगा ‘अमित’। अमित कुमार मिश्रा

बेरोजगारी ( कहानी )

बेरोजगारी.     (कहानी)                                            अमित कुमार मिश्रा। लो भाई सुनो, मैं एक कहानी सुनाता हूं। मेरे पास कहानी सुनाने की ठोस वजह यह है कि मैं इन दिनों अबल दरजे का बेरोजगार हूं। इन दिनों मतलब अभी तक। आपके पास सुनने की क्या वजह है, आप जानो। मैं आपको यकीन दिलाता हूं जैसे ही मुझे कोई काम मिल जाता है मैं आपको कहानी सुना कर परेशान करना बंद कर दूंगा। अब मुझे काम कब मिलेगा यह तो भगवान भी नहीं जानता। वजह दो में से कोई एक है। पहला हमारी व्यवस्था (सरकार) निकम्मी है, जैसा मुझे लगता है; दूसरा मैं निकम्मा हूं, जैसा व्यवस्था समझती है। सही क्या है, पता नहीं। दोनों अपना-अपना तर्क लेकर मैदान में खड़े हैं। खैर, इसका निर्णय बाद में होगा अभी कहानी सुनाता हूं। चूंकि किसी ना किसी को परंपरागत, कथानायक होना ही है; तो मैं ही क्या बुरा हूं। आज भी रोज की तरह अपने एक मित्र के पास से चाय पीकर मैं पैदल ही लौट रहा था। मैं अलग-अलग दिन अलग-अलग मित्र के पास जाता हूं...

न ही आते तो अच्छा था (कविता).

ऐसे आने से प्रिय तुम न ही आते तो अच्छा था। विरह अगन में जलना ही था मन न मिलाते तो अच्छा था। छोड़के ऐसे जाओगे गर न ही आते तो अच्छा था। प्रीत मुझे सिखलाया फिर क्यूं जीवन गीत सुनाया था क्यूं जब पतझड़ ही जीवन-नियति ऐसे क्षण में सरस बसंत से रो-रो कर मैं यही कहूंगी न ही आते तो अच्छा था। जब़्त आंसू के बंधन खोले अधरों पर मुस्कान बिखेर नयनों में उन्माद छिपाए एक झलक दिखला जाते हो। तेरी निष्ठुर आंख मिचौली, से विनती मैं यही करूंगी- ऐसे आने से प्रिय तुम न ही आते तो अच्छा था। मन-मंदिर में छवि बसाकर हृदय में मिलन की आस जगाकर जाना ही था मुझे भुलाकर यादों की अंबार लगाकर। ऐसे आने से प्रिय तुम न ही आते तो अच्छा था। © अमित कुमार मिश्रा।

ग़ज़ल

ग़ज़ल             गैरों की  महफ़िल में रहते हो  दिन-रात, कभी मेरे भी दिल का दरवाज़ा खटखटा देते। औरों को पिलाया है तुमने इश्क़ का समंदर, कभी मुझको दो कतारा आँसू ही पिला देते। सब की जिन्दगी सवारती रही, बन कर बहार, मेरे गुलशन को  तुम पतझड़ ही  बना देते। लोगों को दिया है तुमने अमृत-कलश, मुझको ज़हर का प्याला ही थमा देते। गैरों की जिन्दगी को किया पूनम-सी रौशन, मेरे जिन्दगी में अमावश बनकर ही छा जाते। लोगों ने ठुकराया है तुम्हे हुस्नो-सबाब खोने के बाद, ऐसे   समय  में   तुम   मुझको   बुला लेते। इस  जहाँ में  जिया  था  बिल्कुल अकेला, उस जहाँ के सफ़र में 'अमित' को साथी बना लेते।

तुम्हारा स्नेह, ( कविता )

तुम्हारा स्नेह।              - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’. मेरे प्राण तुम्हें तब भी याद रखेंगे जब जीवन में, वह दौड़ चलेगा, जो समर्पित होगा काल को। धीरे-धीरे वह सब लौटाना पड़ेगा,मुझे जो जीवन ने दिया था, कभी। दृष्टि, श्रवन, वाक्, कुछ भी तो नहीं रह पाएंगे पास मेरे। सभी लौटा लेने को उद्यत जीवन, मेरे स्मृति शेष भी, छीन ले जाएगा। मैं कुछ नहीं रख सकूंगा न रखने की लालसा है। हां, बस तुम्हारा स्नेह, मुझसे न दिया जाएगा। गोपन रखूंगा मैं उसे, वह मुझसे लौटायी न जा सकेगी। मेरे प्राण एक क्षण, बस एक क्षण, ठगेंगे काल को। और, सब कुछ यहीं छोड़ जाने के नियम को तोड़, तुम्हारी कुछ स्नेहिल यादें मैं, उर की गहराई में छुपा लेता जाऊंगा, इस लोक से उस लोक तक।

हिंदी के विकास में अन्य भाषा के शब्दों का योगदान, (आलेख.)

हिंदी के विकास में अन्य भाषा के शब्दों का योगदान अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’ हमारी चिंतन प्रक्रिया मौलिक भाषा से ही जन्म लेती है, आकार पाती है। संपूर्ण भारतीय वांग्मय, सभ्यता एवं संस्कृति, अपने सामासिक रूप में हिंदी भाषा में प्रतिबिंबित है। हिंदी भाषा आज इतनी समृद्ध हो चुकी है कि वह विश्व भाषा बनने की दिशा में सबसे आगे है। वस्तुतः किसी भाषा का प्रवाह नदी की तरह होती है, भाषा जब प्रवाहित होती है तब वह अपने प्रभाव क्षेत्र में पड़ने वाली अनेक भाषाओं से कुछ न कुछ शब्द अर्जीत करती रहती है। अपनी इस महायात्रा के मार्ग में हिंदी को जो कुछ भी श्रेयस्कर और विशिष्ट मिला हिंदी ने ग्रहण करने में कभी संकोच नहीं की। सोलह भाषा रूपी नदियों का जल मिला है तब जाकर हिंदी ने यह रूप ग्रहण की है। हिंदी ने उदारतापूर्वक अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं। हिंदी के शब्द भंडार को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज स्त्रोतों से शब्द ग्रहण किए हैं। उर्दू जबान तो हिंदी की सगी बहन की तरह उसकी पूरक ही रही है। हिंदी में अरबी और फारसी के शब्दों के घुलमिल जाने की सार्थकता पर विचार करते हुए प्रेम...

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )

हिंदी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा लक्ष्मीकांत वर्मा द्वारा प्रतिपादित है। उनका मानना है कि साहित्य में या तो समूह मानव को स्थान दिया गया है या महामानव को, लघुमानव सदैव ही दूर रखा गया है। लघुमानव से उनका तात्पर्य उस मानव से है जो अपने यथार्थ में अपनी कमजोरियों, कुंठाओं के साथ जीता है। वास्तव में देखा जाए तो मानव अपनी कमजोरियों से पृथक नहीं है। उसके भीतर अनेक प्रकार की वासनाएं विद्यमान हैं जिसके कारण परंपरावादी उसे निकृष्ट समझता है। लक्ष्मीकांत वर्मा का मानना था कि छायावादी कवि जहां कल्पना लोक में विचरण करते रहे वहीं प्रगतिवादी कवियों के केंद्र में समूह मानव रहा इसमें कहीं भी लघुमानव अर्थात मानव को उसके व्यक्तिगत तौर पर, उपस्थित नहीं किया गया है।  ‘उनका (लक्ष्मीकांत वर्मा) मानना है कि लघु मानव में जिस मानव विशिष्टता एवं आत्मविश्वास का विशेष महत्व है, उसकी उपेक्षा छायावाद एवं प्रगतिवाद दोनों ने किया।’ १ और करीब जाकर देखें तो वास्तव में यहां मनुष्य को उसके एकात्म रूप में देखने का प्रयास है। यहां यह प्रयास किया गया था कि मनुष्य को कैसे समझा जाए, उसे कैसे परिभाषित किया जाए। यहां मनुष्...

रामकहानी, ( कहानी )

रामकहानी                 - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’ यह मेरी एक काल्पनिक और झूठी कहानी है। इसे मैं शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूं ताकि यह सच्ची भी हो तो वही लगे जो मैं लगाना चाहता हूं। चलिए शुरू करते हैं मेरे दादा से, दादा से इसलिए क्योंकि उनके पिता को मैंने देखी ही नहीं थी और यह अच्छा है अन्यथा आपको यह बेकार कहानी थोड़ी और लंबी झेलनी पड़ती। मेरे दादा एक किसान थे, एक ऐसा किसान जो कृषि और पशुपालन दोनों ही करते रहे। बस उन्होंने एक काम नहीं की- पढ़ाई। वे बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं थे जिस कारण मैं उन्हें तब तक हीन दृष्टि से देखता रहा जब तक कि पढ़-लिख‌ कर मैंने खुद को बेकारों की सूची में शामिल नहीं कर ली। जैसे ही मैं पढ़कर ज्ञानी हुआ सबसे पहले यही बोध हुआ कि मेरे दादा से ज्यादा समझदार और मुझसे ज्यादा बेवकूफ दुनिया भर में नहीं है। मैंने दादा को सदैव ही कठोर परिश्रम करते देखा, खुशी की बात यह थी कि उन्हें कभी जीवन से निराश नहीं होना पड़ा, मेरी तरह। यह उनके अशिक्षित होने का पुरस्कार था कि उन्होंने अपने बाल बच्चों समेत पूरे परिवार को हंसी खुशी से...