सच से मुठभेड़ (लेख)
सच से मुठभेड़. “सीने का दर्द कल भी जिंदा था, आज भी मुकम्मल है। सच का स्वाद कल भी कड़वा था, आज भी जहरीला है।” आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है ‘प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।’ हम जैसे छात्र जो शुक्ल जी के इतिहास के सहारे ही डेगा-डेगी आगे बढ़ता रहा है, उस में इतना साहस नहीं कि शुक्ल जी की मान्यता का खंडन कर दे। तब तो बिल्कुल नहीं जबकि इतिहास को समझने की क्षमता भी विकसित नहीं हुई है। खैर, इसी मान्यता के आलोक में मैं दो-चार बात कहने की कोशिश करूंगा। दो-चार बात ही इसलिए की उससे अधिक कहने की मेरी क्षमता नहीं है। हम सभी चाहते हैं कि हमारा समाज, हमारा देश, भ्रष्टाचार और क्षुद्रता से आगे बढ़े। देश-समाज की नींव विद्यालय और महाविद्यालयों में पड़ती है। इन स्थानों पर एक स्...