यही सच है. (व्यंग्य कविता)


बीए किया, एमए किया, कर बैठा गुनाह
बाप के पैसे से होता है निर्वाह।

बार-बार फारम में लगता है पैसा
बाप सोचे, पूत कपूत निकला कैसा।

हर बार जाता हूं, देता हूं इंटरव्यू
घर को लौट आता हूं,‌ लटका कर मुंह।

आमदनी कुछ नहीं, पैसे कैसे बचे
बेरोजगारी में साले साले जनते हैं बच्चे।

खाली जेब बीवी को लगता हूं फटीचर
कहती है धोखा दिया, बतलाकर भावी टीचर।

मिसाल देकर, बच्चों को लोग करे भयभीत
साला, पढ़-लिख कर क्या करेगा, बनेगा ‘अमित’।

अमित कुमार मिश्रा

टिप्पणियाँ

  1. परंपरागत दौर और बेरोजगारी दोनों को एक साथ बांधने का कवि ने यह सुन्दर प्रयास किया है ।

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