दलित चेतना से संपृक्त हिन्दी महाकाव्य (आलेख)
दलित चेतना से संपृक्त हिन्दी महाकाव्य - अमित कुमार मिश्रा अतिथि व्याख्याता, हिन्दी विभाग, एच.एस.कॉलेज, उदाकिशुनगंज। संपर्क- 9304302308, amitraju532@gmail.com हिन्दी के दलित महाकाव्यों पर विमर्श करते हुए दो कोटियां समक्ष होती हैं | एक में उन महाकाव्यों को रखा जा सकता है जिसमें दलित-विषयक चिंतन मौजूद हैं | दूसरी कोटि में उन महाकाव्यों को रखा जा सकता है जिसकी रचना दलित रचनाकारों ने स्वानुभूति के आधार पर की है | यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि छायावाद के बाद के युग में लिखे गए काव्यों में महाकाव्य की संख्या क्रमशः घटती गई है | वस्तुतः साहित्य, समाज सापेक्ष होता है | साहित्य कमोवेश उसी रूप में ढलता है जिस रूप में कि समाज उसे अंगीकृत कर सकें | आदिकाल और भक्तिकाल में कथा कहने की पद्धति का चलन था | चरित्रों का विकास समाज-निर्माण और जन-संदेश के लिए किया जा रहा था | इसलिए इस काल में महाकाव्य का चलन अधिक रहा | रीतिकाल में काव्य-सृजन क्षणिक प्रभाव के निमित्त किया जा रहा था | वस्तुत: यहां कवियों के पास न तो प्रबंध- रचना के लिए प्रर्याप्त समय था, न धैर्य | दूसरी ओर उनके श्रोता या...