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सितंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सच की बारी अगले साल, (लघुकथा.)

सच की बारी अगले साल.      अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’ जैसे जैसे हमारे महाविद्यालय का वार्षिक महोत्सव निकट आ रहा था वैसे वैसे तैयारियां और जोर पकड़ रही थी। इस बार के समारोह में स्वयं मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया गया था उनके साथ कुछ अन्य विशिष्ट मंत्रीगण भी थे जिनका आना लगभग सुनिश्चित था। पूरे महाविद्यालय में उत्साह का माहौल बना हुआ था, छात्र-छात्राओं से लेकर प्राचार्य और प्रधानाचार्य तक इस आयोजन की तैयारी में लगे हुए थे और वे किसी तरह का कसर बाकी नहीं रखना चाहते थे। सभी को एक हीं धुन सवार थी आयोजन ऐसा हो जिससे कि महाविद्यालय की छवि निखर उठे और पढ़ाई-लिखाई के माहौल में जो त्रुटि रहा गई थी उस पर पर्दा पर जाए। राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता में बढ़ोतरी हो तथा केंद्र की ओर से और तरक्की का अवसर प्राप्त हो सके। इसके लिए आवश्यक था कि आगंतुक, जिसमें कि ईश्वर की कृपा से स्वयं मुख्यमंत्री और मंत्रीगण शामिल थे, विश्वविद्यालय से प्रभावित होकर जाएं। छात्र-छात्राओं के एक समूह को आयोजन में प्रस्तुति के लिए तैयार किया जा रहा था। समूह में अलग-अलग विभाग के  कई छात्र छात्राएं शा...

सोशल मीडिया: दुष्प्रभाव- ( आलेख )

          - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’. सोशल मीडिया: दुष्परिणाम । मानवीय सभ्यता की क्रमिक विकास के अध्ययन विश्लेषण से मानवों की एक बहुत बड़ी कमजोरी उजागर होती है कि वह किसी भी चीज के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है। अपने नवीन खोजों के प्रति वह इस कदर आसक्त हो उठता है कि उसके परिणाम की चिंता ही नहीं करता। आधुनिकता के निर्माण में प्रकृति को नजरअंदाज करना इसका सबसे शक्तिशाली उदाहरण है। वर्तमान मानवीय जीवन में सोशल मीडिया ने प्रयोक्ताओं को अपने कैद में ले रखा है। प्रयोक्ता इससे जितना लाभ लेता है उससे कहीं अधिक नुकसान उठाता है। सोशल मीडिया से तात्पर्य इंटरनेट के उन माध्यमों से है जो मनुष्य से विचार-विनिमय के लिए एक वैश्विक मंच साझा कर रहा है। व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर, आदि सोशल मीडिया के प्रमुख माध्यम हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन माध्यमों ने मनुष्य को ज्ञान-विज्ञान से जोड़ा है। आज अधिकांश लोग खुद को लेखक, विचारक, पत्रकार, संपादक, हर रूप में उभारने में सफल हुए हैं। देश दुनिया की समस्त गतिविधियों से लोग न सिर्फ वाकिफ हैं वरन् उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी देन...

जुलूस, ( लघुकथा )

जुलूस।               -  अमित कुमार मिश्रा। डॉक्टर बृजमोहन ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह से उसकी गाड़ी इस भीड़ भाड़ से निकालने का मौका दे दिया जाए। काफी देर जहोजहद करने के बाद जब उसने देखा की गाड़ी आगे ले जाने का कोई उपाय नहीं है तो वह सामने खड़े पुलिस वालों से विनती करने लगा, लगभग गिड़गिड़ाते हुए उसने कहा-  “मेरी क्लीनिक में एक मरीज काफी गंभीर हालत में पड़ा हुआ है यदि मैं वक्त पर नहीं पहुंचा तो उसकी जान भी जा सकती है। कृपया मुझे जाने का मार्ग दे दीजिए।”  इस पर पुलिस के एक अधिकारी ने झल्लाते हुए कहा- “सभी को किसी न किसी कारण से जाने की जल्दी पड़ी है लेकिन ध्यान से सुन लो डॉक्टर जब तक विधायक जी का जुलूस यहां से गुजर नहीं जाता तब तक एक साइकिल तक मैं आगे नहीं बढ़ने दूंगा, चुपचाप जाकर अपनी गाड़ी में बैठो।”  काफी विनती करने पर भी कोई असर ना होता देख डॉक्टर आकर गाड़ी में बैठ गए। वे अपने इलाके के एक प्रसिद्ध डॉक्टर थे। आसपास के दस-बारह गांव के मरीज उन्हीं के यहां अपना इलाज करवाते थे। वे शहर के सरकारी अस्पताल से रिटायर होने के ...