सोशल मीडिया: दुष्प्रभाव- ( आलेख )

          - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’.

सोशल मीडिया: दुष्परिणाम ।

मानवीय सभ्यता की क्रमिक विकास के अध्ययन विश्लेषण से मानवों की एक बहुत बड़ी कमजोरी उजागर होती है कि वह किसी भी चीज के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है। अपने नवीन खोजों के प्रति वह इस कदर आसक्त हो उठता है कि उसके परिणाम की चिंता ही नहीं करता। आधुनिकता के निर्माण में प्रकृति को नजरअंदाज करना इसका सबसे शक्तिशाली उदाहरण है। वर्तमान मानवीय जीवन में सोशल मीडिया ने प्रयोक्ताओं को अपने कैद में ले रखा है। प्रयोक्ता इससे जितना लाभ लेता है उससे कहीं अधिक नुकसान उठाता है। सोशल मीडिया से तात्पर्य इंटरनेट के उन माध्यमों से है जो मनुष्य से विचार-विनिमय के लिए एक वैश्विक मंच साझा कर रहा है। व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर, आदि सोशल मीडिया के प्रमुख माध्यम हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन माध्यमों ने मनुष्य को ज्ञान-विज्ञान से जोड़ा है। आज अधिकांश लोग खुद को लेखक, विचारक, पत्रकार, संपादक, हर रूप में उभारने में सफल हुए हैं। देश दुनिया की समस्त गतिविधियों से लोग न सिर्फ वाकिफ हैं वरन् उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी देने में सक्षम हैं। सोशल मीडिया के कारण ही लोग कमोबेश हर बात की जानकारी रखने लगे हैं। लोगों के भाषा ज्ञान में बढ़ोतरी हुई है।
लेकिन इन समस्त अच्छाइयों पर सोशल मीडिया के बुराई कई गुना भारी पड़ रहे हैं। सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को इस तरह पंक्तिबद्ध की जा सकती है-
१. सोशल मीडिया की सबसे बड़ी बुराई यह है कि इसने जहां पूरी दुनिया को आपस में जोड़ने का कार्य किया है वहीं लोगों को तन्हा भी कर दिया है। लोग अपने कामकाज से जो भी समय बचाते हैं उन्हें सोशल साइट पर खर्च कर देते हैं। भारत में तो स्थिति यह है कि लोग सोशल साइट पर समय बिताने के लिए अपने काम में कोताही बरतते भी दिख पड़ते हैं। कुछ भी कर रहे हो कान नोटिफिकेशन पर ही टिकी होती है।
     मां,बाप, बच्चे, सभी साथ में होते हुए भी अपने पसंदीदा साइट पर खुद को व्यस्त किए रहते हैं, नतीजा यह निकलता है कि वे एक दूसरे से जुड़ कर भी विमुख रहते हैं। और उनकी मानवीय संवेदना क्षीण होती चली जाती है।
२. सोशल मीडिया के दूसरे सबसे बड़े दुष्परिणाम का प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। मनुष्य के द्वारा सोशल मीडिया के अतिशय प्रयोग का असर मानव की दृश्यता, श्रवण-शक्ति, नींद, सभी को प्रभावित कर रही है और मनुष्य नई-नई बीमारियों से घिरता जा रहा है। मोबाइल, लैपटॉप जैसे यंत्रों के लगातार प्रयोग के कारण प्रयोक्ता की दृश्यता और श्रवनियता क्षीण होती जा रही है। आंकड़े बतलाते हैं कि इंटरनेट के अधिक प्रयोग के कारण  लोगों की एकाग्रता भंग हो रही है और उनके याद्दाश्त पर भी इसका बुरा असर देखने को मिल रहा है। देर रात तक जागते रहने से नींद पूरी नहीं होती, लोग सुबह के सैर, व्यायाम आदि को समय नहीं दे पाते, बच्चे मैदान में खेलने के बजाय सोशल साइट पर समय बिताते हैं, जिससे शरीर सक्रिय होने के बजाय और निष्क्रिय होता जाता है। सोशल मीडिया न सिर्फ मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है बल्कि पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है। अन्य प्राणी भी इसके घातक प्रभाव झेलने को विवश हैं।
३. सोशल मीडिया पर लोग आपस में जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे से ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं, लेकिन यहां भ्रामक तथ्यों के द्वारा मनुष्य को मानसिक रूप से उद्वेलित करने का कार्य अधिक किया जा रहा है। जाति, धर्म, संप्रदाय आदि से संबंधित अनेक तरह के भ्रामक तथ्यों को असामाजिक तत्वों के द्वारा प्रचारित कर तनाव की स्थिति उत्पन्न कर दी जाती है। कत्ल, बलात्कार, दंगे आदि की खबरों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत की जाती है जिससे सामाजिक शांति भंग हो रही है। समाज की जिस एकता को तोड़ने में बड़ी बड़ी शक्तियां नाकामयाब हो रही थी उसे सोशल मीडिया बड़ी आसानी से तोड़ दे रही है। सोशल मीडिया पर बैठकर विचार प्रसारित कर रहे जिन व्यक्तियों को हम सामान्य मनुष्य समझ रहे होते हैं वे वास्तव में किसी ना किसी राजनीतिक या सांप्रदायिक पार्टी के द्वारा वित्त पोषित होते हैं। उनके द्वारा अपने विचारों से लोगों को सहमत करना सरल होता है क्योंकि लोग उसे अपने बीच का आदमी जान रहा होता है। और वह लोगों में तनाव उत्पन्न कर आसानी से असामाजिकता को जन्म दे देता है।
हम यह तो कहते हैं कि सोशल मीडिया ने लोगों को विचारशील बना दिया है किंतु यह वास्तविकता नहीं है, वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर भी लोग कुछ लोगों के द्वारा प्रचारित विचारों को प्रसारित मात्र करते हैं। किसी के द्वारा विस्तारित तथ्यों में उसका मौलिक मत सम्मिलित हो यह आवश्यक नहीं है। कुछ विशेष व्यक्ति अपने विचारों को इस तरह रखते हैं कि उसके जैसे विचारधारा के लोग इससे पूर्णत: समर्थित होकर इसको प्रचारित करें।
 इन दिनों राजनीतिक पार्टियां भी सोशल मीडिया के द्वारा अपना चुनाव-प्रचार कर रही है। यदि वे शुद्ध रूप से अपना प्रचार-प्रसार करते तो सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव कम दिखता किंतु पार्टियां अपने चुनाव-प्रचार के दौरान विरोधी पार्टियों से विरोध जताने के क्रम में निम्नतम स्तर पर चले जाते हैं परिणाम यह निकलता है कि यह विरोध राजनीति से चलकर सामाजिक रूप धारण कर लेता है और लोग आपस में जाति-धर्म के नाम पर बंटते चले जाते हैं।
४. सोशल मीडिया का एक दुष्प्रभाव यह भी है कि यहां लोग ऐसे ऐसे रिश्ते कायम कर ले रहे हैं जो उनके लिए न सिर्फ नुकसानदायक अपितु कई मामलों में जानलेवा भी साबित होता है। फेसबुक, व्हाट्सएप, टि्वटर आदि पर लोग एक दूसरे से रिश्ता कायम करते हैं और फिर वहां कुछ असामाजिक तस्वीर, वीडियो आदि के द्वारा मजबूर किए जाते हैं। इस तरह की अनेक घटनाएं सामने आई है। कई मामले में पीड़ित उस मानसिक तनाव को झेल नहीं पाता है और आत्महत्या तक कर बैठता है।
५. युवाओं के द्वारा ज्यादातर समय सोशल साइट पर बिताया जा रहा है और वह किताबों से दूर होते जा रहे हैं। जबकि यही समय उनके निर्माण का काल होता है। यह सही है कि सोशल साइटों पर भी पढ़ने को बहुत कुछ है किंतु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वहां भ्रामक चीजों की संख्या अधिक है। यहां समय बिताते हुए लोग अच्छी पुस्तकों के बजाय छोटी और प्रचारात्मक तथ्यों को अधिक महत्व देते हैं। यही कारण है कि पुस्तकों की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन घटती जा रही है।
६. सोशल मीडिया पर आए दिन तथ्यों की मनमानी प्रस्तुति देखने को मिलती रहती है, जिससे कभी किसी जाति, कभी किसी संप्रदाय, तो कई बार राष्ट्र को ही आहत होना पड़ता है। भारत में, भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुस्लिम, दलित-स्वर्ण आदि के मुद्दे को भुना कर आए दिन तनाव की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। कभी किसी मुस्लिम के द्वारा, हिंदू देवताओं को अपमानित करने वाली तस्वीर तो कभी किसी हिंदू के द्वारा मुसलमान की हत्या की तस्वीर वायरल की जाती है, कभी किसी मुस्लिम को तिरंगे को पांव तले रौंदते दिखलाया जाता है तो कभी किसी हिंदू को पाकिस्तानी-झंडे को कुचलते दिखलाया जाता है। इन तस्वीरों की वास्तविकता यही है कि ये सभी टेक्नोलॉजी द्वारा निर्मित हैं और सांप्रदायिक असंतोष को बढ़ाने के लिए तैयार किए जाते हैं।
   इन दिनों स्वर्ण-दलित, आरक्षण आदि के मुद्दे को प्रस्तुत कर कुछ नए चेहरे अपनी राजनीतिक पहचान बनाने में लगे हैं।
   सोशल साइटों पर युवतियों द्वारा डाले गए निजी तथा पारिवारिक तस्वीरों को भी टेक्नोलॉजी के सहारे गलत ढंग से तैयार कर, उसकी सामाजिक छवि बिगाड़ने की घटना सामने आती रहती है।
       निष्कर्षत: हम पाते हैं कि सोशल मीडिया के कई लाभ होने के बावजूद इसके नकारात्मक पक्ष ही अधिक हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्यों की जिम्मेदारी तैय नहीं है। दूसरी बात यह कि उपयोगकर्ता इसे साधन के रूप में स्वीकार करने की जगह साध्य मान बैठा है। सोशल मीडिया के अतिशय प्रयोग के कारण लोग अपने निजी रिश्तो के संरक्षण में भी असफल होते जा रहे हैं। परिणाम यही दिखता है कि सोशल मीडिया का मानव जीवन पर दुष्प्रभाव ही अधिक पड़ा है।

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