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तुम आओगी ना

मैंने दिल के अरमान बिछा रखे हैं, तुम्हारे लिए तुम आओगी ना ? जमाने में किसी को नागवार नहीं मोहब्बत हमारी तुम मोहब्बत की डगर पर चलती जाओगी ना ? सब छोड़ आया हूं अपने पीछे, तुम्हारे लिए तुम हर कदम पर मेरा साथ निभाओगी ना ? मैं जलने को तैयार हूं बनकर परवाना तेरा बन कर समा तुम मेरी जिंदगी में उजाला लाओगी ना ? मर कर भी इन आंखों को रहेगा इंतजार तेरा कभी मेरी कब्र पर फूल चढ़ाने तुम आओगी ना ? हर हद से गुजर जाएगा ‘अमित’, इश्क में तेरे मेरी मैयत पर तुम दो कतरा आंसू गिराओगी ना ? @ अमित कुमार मिश्रा।

लड़की का पिता ( कविता)

 लड़की का पिता एक लड़की का पिता हूँ मैं। सात वर्ष  की है मेरी  पुत्री। उतने ही दिनों का है डर मेरा। मुझे जानवरों से लगता है भय। कुत्तों, भेड़ियों, लकड़बघों से, डर लगता नहीं मुझे। उनसे बचा सकता हूँ मैं अपनी बच्ची को। मुझे भय लगता है उन जानवरों से, जो मेरे इर्द-गिर्द, मेरे घर में, मेरे समाज, मेरे आस-पड़ोस में, मानव रूप में घूमते रहते हैं। उनसे कैसे बचाऊँ मैं अपनी लाडली को। पता नहीं वे कब, कहाँ, कैसा बैठे हो घात लगाकर। शायद शैतान भी शर्मा जाए इंसानों का यह रूप देख। एक पल को भी ओझल होने देता नहीं मैं अपनी आँखों से। किसके भरोसे पर छोरू मैं लाडली की कोमलता को। क्या किसी के भी पास नहीं है जवाब ? सिर्फ मुझे ही नहीं, मुझ जैसे अनगिनत पिता को, सालता है यह सवाल। आए दिन की घृणित घटनाओं से, कांप रहा है पिता का दिल, भयभीत है माता की ममता, रोता है भाई का मन, पूछ रही है मेरी लाडली की आँखें। आप सब क्यो है भयभीत ? मेरी रक्षा को खड़े है आप, चाचा, मौसा, फूफा, भाई, पड़ोस में रहने वाले अंकल, पुलिस की वर्दी पहने लोग। फिर किससे ख़तरा है मुझे ? मैं कैसे समझाऊँ उसे, ...

‘एक प्रश्न’ - एक विचार. ( विमर्श )

एक प्रश्न-एक विचार                - अमित कुमार मिश्रा। यदि प्रश्न पूछने की आजादी हो तो मैं अपना एक प्रश्न रखने की अनुमति चाहूंगा। समय-समय पर हमें अपने हर पहलू की समीक्षा करते रहने की आवश्यकता होती है, यदि ऐसा नहीं की जाए तो हम बहुत कुछ अ-अनिवार्य ढ़ोते रह जाते हैं और अनिवार्य अंग हमसे अछूते रह जाते हैं। मैं, एक कमजोर ही सही लेकिन हिंदी का छात्र रहा हूं इस नाते एक प्रश्न बार-बार मेरे मस्तिष्क में उठक-बैठक करता रहा है। कि हम जिस विश्वविद्यालय में पढ़ें या उस तरह के अनेक विश्वविद्यालय जो हमारे राज्य में स्थित हैं, उसमें पाठ्यक्रम कौन निर्धारित करता है ? जिसे यह कार्य दिया गया है क्या वह सश्रम अपने कार्य को संपादित कर रहा है ? मुझे इसमें संदेह है। यह जग जाहिर है कि बिहार की मिट्टी में ऐसी उर्वरक शक्ति है जिसने हिंदी साहित्य को एक से एक अनमोल निधि दिए हैं। लेकिन हमारी विद्या अनमोल निधियों को कबाड़ी की दुकान पर बेचने में विश्वास रखती है। बी.ए. के दौरान मैंने हिंदी के 8 प्रश्न-पत्र झेलें, एम.ए. के दौरान 16 प्रश्न-पत्र। इस तरह कुल मिलाकर 24 प्रश्न-पत्...

शायरी के पन्नें ( शायरी )

शायरी के पन्नें।                             अमित कुमार मिश्रा. १. मुझसे बेवफाई की, तेरे लिए,          जा इतनी सजा काफी है। मेरे किसी शेर में न अब,                 तेरी जगह बाकी है। २. देख, तू जाते-जाते भी मुझे इनायत फरमा गई बेवफा खुद बनी, मुझे जहां में शायर बना गई। ३. सारा जहां तो बैरी है, किस-किस से अब मैं बचाऊं तुझे ? सीना छलनी अपनों ने किया, ऐ दिल! कहां ले जाऊं तुझे ? ४. खुदा के दरबार में मंज़ूर होगी उसी की प्रीत, जो तैर कर जाएगा, धार के विपरित। ५. ये नशीले नैन, रसीले होंठ, दीवाना बना कर रख देंगी अगर हो जाए नजरे-करम,                          ‘अमित’ को बागी बना के रख देंगी। ६. आप की गलियों में मेरा रोज का आना जाना है  आप मुझे नहीं जानती, मगर मेरा यह दिल, सदियों...