लड़की का पिता ( कविता)
लड़की का पिता
एक लड़की का पिता हूँ मैं।
सात वर्ष की है मेरी पुत्री।
उतने ही दिनों का है डर मेरा।
मुझे जानवरों से लगता है भय।
कुत्तों, भेड़ियों, लकड़बघों से,
डर लगता नहीं मुझे।
उनसे बचा सकता हूँ मैं अपनी बच्ची को।
मुझे भय लगता है उन जानवरों से, जो
मेरे इर्द-गिर्द, मेरे घर में,
मेरे समाज, मेरे आस-पड़ोस में,
मानव रूप में घूमते रहते हैं।
उनसे कैसे बचाऊँ मैं अपनी लाडली को।
पता नहीं वे कब, कहाँ, कैसा
बैठे हो घात लगाकर।
शायद शैतान भी शर्मा जाए
इंसानों का यह रूप देख।
एक पल को भी ओझल होने
देता नहीं मैं अपनी आँखों से।
किसके भरोसे पर छोरू
मैं लाडली की कोमलता को।
क्या किसी के भी पास नहीं है जवाब ?
सिर्फ मुझे ही नहीं,
मुझ जैसे अनगिनत पिता को,
सालता है यह सवाल।
आए दिन की घृणित घटनाओं से,
कांप रहा है पिता का दिल,
भयभीत है माता की ममता,
रोता है भाई का मन,
पूछ रही है मेरी लाडली की आँखें।
आप सब क्यो है भयभीत ?
मेरी रक्षा को खड़े है आप,
चाचा, मौसा, फूफा, भाई,
पड़ोस में रहने वाले अंकल,
पुलिस की वर्दी पहने लोग।
फिर किससे ख़तरा है मुझे ?
मैं कैसे समझाऊँ उसे,
इनके होने से ही है भय मुझे।
इनके भरोसे छोड़ दूँ कैसे तुझे ?
ये जो देवता के रूप में,
प्रेम से पालते दिन-रात तुझे,
ना जाने क्यो हैवान बन,
नष्ट कर देते हैं सुन्दर उपवन।
हर कोई है नहीं गुनहगार।
लेकिन कुछ दरिदों के कर्म देख,
सबको शंका से देखता है पिता का मन।
- अमित मिश्र
मो•-8507473724
एक लड़की का पिता हूँ मैं।
सात वर्ष की है मेरी पुत्री।
उतने ही दिनों का है डर मेरा।
मुझे जानवरों से लगता है भय।
कुत्तों, भेड़ियों, लकड़बघों से,
डर लगता नहीं मुझे।
उनसे बचा सकता हूँ मैं अपनी बच्ची को।
मुझे भय लगता है उन जानवरों से, जो
मेरे इर्द-गिर्द, मेरे घर में,
मेरे समाज, मेरे आस-पड़ोस में,
मानव रूप में घूमते रहते हैं।
उनसे कैसे बचाऊँ मैं अपनी लाडली को।
पता नहीं वे कब, कहाँ, कैसा
बैठे हो घात लगाकर।
शायद शैतान भी शर्मा जाए
इंसानों का यह रूप देख।
एक पल को भी ओझल होने
देता नहीं मैं अपनी आँखों से।
किसके भरोसे पर छोरू
मैं लाडली की कोमलता को।
क्या किसी के भी पास नहीं है जवाब ?
सिर्फ मुझे ही नहीं,
मुझ जैसे अनगिनत पिता को,
सालता है यह सवाल।
आए दिन की घृणित घटनाओं से,
कांप रहा है पिता का दिल,
भयभीत है माता की ममता,
रोता है भाई का मन,
पूछ रही है मेरी लाडली की आँखें।
आप सब क्यो है भयभीत ?
मेरी रक्षा को खड़े है आप,
चाचा, मौसा, फूफा, भाई,
पड़ोस में रहने वाले अंकल,
पुलिस की वर्दी पहने लोग।
फिर किससे ख़तरा है मुझे ?
मैं कैसे समझाऊँ उसे,
इनके होने से ही है भय मुझे।
इनके भरोसे छोड़ दूँ कैसे तुझे ?
ये जो देवता के रूप में,
प्रेम से पालते दिन-रात तुझे,
ना जाने क्यो हैवान बन,
नष्ट कर देते हैं सुन्दर उपवन।
हर कोई है नहीं गुनहगार।
लेकिन कुछ दरिदों के कर्म देख,
सबको शंका से देखता है पिता का मन।
- अमित मिश्र
मो•-8507473724
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