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गुनगुनी धूप (कविता)

कितनी प्यारी है यह गुनगुनी धूप  ठंड से सिहरते बदन पर  मां के कोमल स्पर्श-सा सुखद  पिता के छत्र सा विराट है यह धूप । बरसों बाद मैंने महसूस की है इसे  इस महानगर में धूप भी खिलती है  पता ही कहां था  जब से आया हूं फैक्ट्री की खतर-पटर के सिवा  कुछ दिखा ही नहीं  सुबह के घुसे कहीं शाम ढले निकलता हूं  और फिर वही सिलनभरा बदबूदार कमरा  यही तो है हमारी महानगरीय जिंदगी । छुट्टी होती है रविवार को लेकिन  हमसे ओवरटाइम का मोह छूटने कहां पाता है  वही तो हमारे पूरे सप्ताह की बीड़ी का इंतजाम है । आज नगर में हड़ताल है  चारों ओर चक्का जाम है  निकल आया हूं मैं मनुआ, सरबन और ईशर के साथ मकान के पीछे वाले मैदान में  वैसे तो पूरे मैदान में गंदगी है  चारों तरफ दौड़ते सूअर हैं  लेकिन मां के कोमल स्पर्श-सी यह धूप  आह अद्भुत।

जिम्मेदारी (कविता)

बाबू! तुम प्यार का मतलब जानते हो, प्रेम को परिभाषित करते हो, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, लाखों किस्से जानते हो, तुम अलग हो बाबू          तुम्हारी दुनिया अलग है मैं अपने बारे में बतलाऊं सुनोगे ? मैं प्रेम नहीं करता हमारी दुनिया में प्रेम है ही नहीं यहाँ है तो बस... ओ क्या कहते हैं उसे... हां...जिम्मेदारी। साढ़े तीन साल बाद आया था बिहार आज लौट रहा हूँ हैदराबाद एकइस दिन की छूटी में, चौदह दिन रहा गांव में इसी में खेत-खलिहान, रिश्ते-नातें सब देखना था। शादी के बाद आठवें दिन चला गया था इस बार ठीक से देख सका उसे खूब बात की रात-रात भर सोनूआ के माय बनने के बाद खूब गोरा गई है रूपीया पीठ-बांह सब चिकना गया है बहुते अच्छी लगती है...        आप देखते तब कहते। खूब रो रही थी, साथ आने का जिद कर रही थी बहुत मनाया तब जाकर राजी हुई ओ इसबार एक साड़ी और पायल लेते आया था...छुपाकर घर में पता चलता तो सब कहते... ही ही...ही..मऊगा... सात सौ रुपईया दे दिए हैं अलग से नुकाकर...नहीं त सब कहता ही ही...ही, हें हें...हें... अब फेर तीन चार साल में आन...

गजल

मैं   बहुत   ढूंढता  हूं  मगर  नजर  नहीं  आता  कितना  भी  पुराना  हो  इश्क  असर  नहीं जाता  उसने  सूरज  के  हाथों  सलाम   भेजी   तो  है  एक  मैं  हूं  कि  कभी  उजाले  में  नहीं  जाता  रौनक-ए-बहार   ने   छला   है  कुछ  इस  कदर  जहां रोशनी हो मैं मकां के उस हिस्से में नहीं जाता उन दिनों  इस्तकबाल  किया करता था बहारों का मैं अब शामें गुजर जाती हैं कोई परिंदा इधर नहीं आता हवाएं   लिए   आती   हैं   खुशबू  मेरे  गांव की मैं  जिस  रास्ते से आया था वह वापस नहीं जाता। ये  कैसी  सीढ़ियां बना  रखी  है इन शहरवालों ने  जिस पर चलकर कोई  किसी से मिलने नहीं जाता। - अमित कुमार मिश्रा