गुनगुनी धूप (कविता)
कितनी प्यारी है यह गुनगुनी धूप ठंड से सिहरते बदन पर मां के कोमल स्पर्श-सा सुखद पिता के छत्र सा विराट है यह धूप । बरसों बाद मैंने महसूस की है इसे इस महानगर में धूप भी खिलती है पता ही कहां था जब से आया हूं फैक्ट्री की खतर-पटर के सिवा कुछ दिखा ही नहीं सुबह के घुसे कहीं शाम ढले निकलता हूं और फिर वही सिलनभरा बदबूदार कमरा यही तो है हमारी महानगरीय जिंदगी । छुट्टी होती है रविवार को लेकिन हमसे ओवरटाइम का मोह छूटने कहां पाता है वही तो हमारे पूरे सप्ताह की बीड़ी का इंतजाम है । आज नगर में हड़ताल है चारों ओर चक्का जाम है निकल आया हूं मैं मनुआ, सरबन और ईशर के साथ मकान के पीछे वाले मैदान में वैसे तो पूरे मैदान में गंदगी है चारों तरफ दौड़ते सूअर हैं लेकिन मां के कोमल स्पर्श-सी यह धूप आह अद्भुत।