जिम्मेदारी (कविता)

बाबू! तुम प्यार का मतलब जानते हो,
प्रेम को परिभाषित करते हो,
लैला-मजनूं, हीर-रांझा, लाखों किस्से जानते हो,
तुम अलग हो बाबू
         तुम्हारी दुनिया अलग है
मैं अपने बारे में बतलाऊं सुनोगे ?
मैं प्रेम नहीं करता
हमारी दुनिया में प्रेम है ही नहीं
यहाँ है तो बस...
ओ क्या कहते हैं उसे...
हां...जिम्मेदारी।

साढ़े तीन साल बाद आया था बिहार
आज लौट रहा हूँ हैदराबाद
एकइस दिन की छूटी में,
चौदह दिन रहा गांव में
इसी में खेत-खलिहान, रिश्ते-नातें सब देखना था।

शादी के बाद आठवें दिन चला गया था
इस बार ठीक से देख सका उसे
खूब बात की रात-रात भर
सोनूआ के माय बनने के बाद
खूब गोरा गई है रूपीया
पीठ-बांह सब चिकना गया है
बहुते अच्छी लगती है...
       आप देखते तब कहते।

खूब रो रही थी, साथ आने का जिद कर रही थी
बहुत मनाया तब जाकर राजी हुई
ओ इसबार एक साड़ी और
पायल लेते आया था...छुपाकर
घर में पता चलता तो सब कहते...
ही ही...ही..मऊगा...
सात सौ रुपईया दे दिए हैं अलग से
नुकाकर...नहीं त सब कहता
ही ही...ही, हें हें...हें...
अब फेर तीन चार साल में आना होगा
इसबार मालिक से कहेंगे पइसा बढ़ाबे ला
सोनूआ के पढ़ाबे-लिखाबे पड़ेगा न
फेर ऊहो हाकिम बन जाएगा
ऊहो पढ़ेगा लैला-मजनूं, हीर-रांझा के किस्सा।

अच्छा लगता है आपका स्टेशन आ गया
उतरीयगा...अच्छा परणाम।

- अमित कुमार मिश्रा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )