गजल


मैं   बहुत   ढूंढता  हूं  मगर  नजर  नहीं  आता 
कितना  भी  पुराना  हो  इश्क  असर  नहीं जाता 

उसने  सूरज  के  हाथों  सलाम   भेजी   तो  है 
एक  मैं  हूं  कि  कभी  उजाले  में  नहीं  जाता 

रौनक-ए-बहार   ने   छला   है  कुछ  इस  कदर 
जहां रोशनी हो मैं मकां के उस हिस्से में नहीं जाता

उन दिनों  इस्तकबाल  किया करता था बहारों का मैं
अब शामें गुजर जाती हैं कोई परिंदा इधर नहीं आता

हवाएं   लिए   आती   हैं   खुशबू  मेरे  गांव की
मैं  जिस  रास्ते से आया था वह वापस नहीं जाता।

ये  कैसी  सीढ़ियां बना  रखी  है इन शहरवालों ने 
जिस पर चलकर कोई  किसी से मिलने नहीं जाता।

- अमित कुमार मिश्रा 

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