‘एक प्रश्न’ - एक विचार. ( विमर्श )

एक प्रश्न-एक विचार                - अमित कुमार मिश्रा।

यदि प्रश्न पूछने की आजादी हो तो मैं अपना एक प्रश्न रखने की अनुमति चाहूंगा। समय-समय पर हमें अपने हर पहलू की समीक्षा करते रहने की आवश्यकता होती है, यदि ऐसा नहीं की जाए तो हम बहुत कुछ अ-अनिवार्य ढ़ोते रह जाते हैं और अनिवार्य अंग हमसे अछूते रह जाते हैं। मैं, एक कमजोर ही सही लेकिन हिंदी का छात्र रहा हूं इस नाते एक प्रश्न बार-बार मेरे मस्तिष्क में उठक-बैठक करता रहा है। कि हम जिस विश्वविद्यालय में पढ़ें या उस तरह के अनेक विश्वविद्यालय जो हमारे राज्य में स्थित हैं, उसमें पाठ्यक्रम कौन निर्धारित करता है ? जिसे यह कार्य दिया गया है क्या वह सश्रम अपने कार्य को संपादित कर रहा है ? मुझे इसमें संदेह है।
यह जग जाहिर है कि बिहार की मिट्टी में ऐसी उर्वरक शक्ति है जिसने हिंदी साहित्य को एक से एक अनमोल निधि दिए हैं। लेकिन हमारी विद्या अनमोल निधियों को कबाड़ी की दुकान पर बेचने में विश्वास रखती है। बी.ए. के दौरान मैंने हिंदी के 8 प्रश्न-पत्र झेलें, एम.ए. के दौरान 16 प्रश्न-पत्र। इस तरह कुल मिलाकर 24 प्रश्न-पत्र। इसमें हिंदी के जन्म के सैकड़ों वर्ष पहले से लेकर और कहां कहां तक भ्रमण कराया गया लेकिन इसमें बिहार तो कहीं दिखा ही नहीं। बिहार के साहित्यकार कहीं भी नजर नहीं आ सकें। वही सारी पुरानी परिपाटी आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल। क्या फायदा है बार-बार उसी आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल को दोहराते रहने से जिसके संदर्भ आज जीवित ही नहीं हैं। यह मानता हूं कि ये सभी अनिवार्य हैं लेकिन अब इसे सीमित करने की आवश्यकता है। क्या यह उचित नहीं था इन 24 प्रश्न-पत्रों में अधिक नहीं तो कम से कम 4 ऐसे प्रश्न-पत्र होते जिनमें हमें बिहार के साहित्यकारों से परिचय कराया गया होता ? इसमें मगध विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर के 16वें पत्र के मोटे दस्तावेज में, एक इस तरह का पाठ्यक्रम दिखा अवश्य किंतु उसके प्रश्न नहीं छपते हैं। मतलब जो उसे पढ़ने की गुस्ताखी कर बैठे उसे परीक्षा हॉल में जाते हीं ठेंगा दिखा दिया जाता है। कोई मुझपर आक्षेप ना करे, न‌ झूठा आरोप लगाने की कोशिश करे क्योंकि मैंने खुद 16वें पत्र में 'स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य' पढ़ा था और मजबूरन परीक्षा सूरदास पर देनी पड़ी थी। क्योंकि सूरदास, तुलसीदास, प्रेमचंद और कोई एक और भी था, जिसके अलावे किसी का प्रश्न छापने की विश्वविद्यालय ने जहमत ही नहीं उठाई।
आज जब बात, देवेंद्र नाथ शर्मा, नलिन विलोचन शर्मा, अनूप लाल मंडल, मोहनलाल महतो, केदारनाथ मिश्र प्रभात, गोपाल सिंह नेपाली, आरसी प्रसाद सिंह, केसरी कुमार, शिवपूजन सहाय, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, रामवृक्ष बेनीपुरी, राधिका रमण प्रसाद सिंह, जानकी वल्लभ शास्त्री, हंस कुमार तिवारी जैसे रचनाकारों की आती है तो हम इस तरह विस्मय से देखते हैं जैसे ये फ्रेंच भाषा के साहित्यकार हो। हम इनमें से कितने को पढ़ पाए हैं ? कौन सा ऐसा विश्वविद्यालय है जो अपने पाठ्यक्रम में एक पत्र के रूप में इन रचनाकारों को लेकर चला हो ? मैं क्षमा चाहते हुए यह कहना चाहूंगा कि सिर्फ रेणु के ‘मैला आंचल’ और दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ को शामिल कर देने से बिहार की साहित्य का परिचय कम से कम उन छात्रों के लिए परिपूर्ण नहीं मानी जा सकती है जिन्होंने हिंदी साहित्य को 5-6 वर्षों का समय दिया हो। इससे अच्छा पाठ्यक्रम तो माध्यमिक विद्यालय, और उच्च विद्यालय के हिंदी साहित्य का है जिसमें बिहार के अनेक रचनाकारों को यथा उचित स्थान दिया गया है।
जग जाहिर है हिंदी में आरसी प्रसाद सिंह के गीतों को सिरोधार्य माना गया है लेकिन हमने तो आरसी प्रसाद सिंह के कोई गीत इन 5 वर्षों के लंबे चौड़े पाठ्यक्रम के दौरान कहीं नहीं देखें। हिंदी साहित्य में यह तथ्य सामने आता है कि जिसे हम प्रयोगवाद कहते हैं, उसके तत्त्व वास्तव में अज्ञेय के द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ से पहले ही आचार्य नलिन विलोचन शर्मा की कविताओं में परिलक्षित होने लगी थी लेकिन इसे एक छात्र कैसे समझ सकता है जबकि नलिन विलोचन शर्मा की कोई कविता किसी की नजरों के सामने कभी लाई ही नहीं जाती है। नलिन विलोचन शर्मा, देवेंद्र नाथ शर्मा, आदि की कुछ साहित्यिक समीक्षा या काव्य शास्त्रीय पक्षी दिखला कर ही हम कर्तव्य मुक्त हो जाते हैं। जब कि सही मायने में देखा जाए तो इनका सृजनात्मक साहित्य भी हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान रखता है। नलिन विलोचन शर्मा की कहानियां और देवेंद्र नाथ शर्मा की एकांकी में मानवता की जो उच्च भूमि है वह शायद ही कहीं और देखने को मिलती है लेकिन इन सबों की उपेक्षा बिहार में ही हो रही है, यह चिंतनीय है। बार-बार यह सुनने को मिल जाता है कि केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ ने ऐतिहासिक कर्ण, कैकेयी जैसे पात्रों को एक नए दृष्टिकोण से स्थापित किया है लेकिन यह स्थापना कहां है ? अगर किसी छात्र को दिखा हो तो वह मुझे बतलाए। यह किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं है और जो पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं है वह किसी भी दुकान की कचरे के ढेर में भी नहीं दिखती है। मुसीबत यह है कि हम बार-बार इतने लंबे-चौड़े समय में सिर्फ उन्हीं कुछ रचनाकारों को पढ़ते आ रहे हैं जिन्हें सदियों से हम पर लाद दिया गया है। क्या इसमें कुछ नवीनता लाने की आवश्यकता नहीं  है ? इस विषय में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे कुछ संस्थाओं को देखकर आशा की किरण जगती अवश्य है कि वहां बर्षों पुराने साहित्य के स्थान पर, नए और आज के संदर्भ में प्रभावी साहित्य को छात्रों के समक्ष रखा जा रहा है। लेकिन प्रश्न यह है कि हर विद्यार्थी उन्हीं विश्वविद्यालय में जाकर तो नहीं पढ़ सकता। यह मैं सिर्फ बिहार के संदर्भ में नहीं कहना चाह रहा, बिहार में मैं इसलिए इसको ठीक ढंग से देख सका हूं क्योंकि मेरा यहां से संबंध रहा है अन्य राज्यों की स्थिति का सही आकलन मुझे नहीं है किंतु उन राज्यों को भी चाहिए कि वे अपने साहित्यकारों को मरने ना दे उन्हें विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित कर जिलाए रखे।
दूसरी तरफ ध्यान जाता है बिहार से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं पर आज अनेक स्तरीय पत्र पत्रिकाएं बिहार से निकल रही है। बड़े सारे पन्ने होते हैं उसमें रंग-बिरंगी रचनाएं छपी होती हैं। उनमें से यदि चार पन्ने बिहार के साहित्यकारों के ऊपर आरक्षित कर दिए जाए तो मुझे नहीं लगता इससे उस पत्र का कुछ नुकसान हो सकता है। क्यों नहीं ऐसा किया जाता है कि बिहार के उक्त साहित्यकारों को उभार कर पत्र पत्रिका के संपादक उनकी रचनाओं को हर अंक में स्थान देते रहें ? इससे पाठकों को उन रचनाकारों को जानने समझने में कितनी सहूलियत मिल जाएगी। इस संदर्भ में एक नाम ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ से निकलने वाली ‘परिषद पत्रिका’ का सम्मान से लिया जा सकता है जिसमें बिहार के साहित्यकारों पर विशेषांक निकाल कर कुछ हद तक उन्हें जिलाए रखने का सार्थक प्रयास किया गया है।
तीसरी बात आती है उन सरकारी, गैर-सरकारी सम्मेलनों की जो रचनाकारों के जन्म या पुण्यतिथि पर रखे जाते हैं। वहां बड़े-बड़े विद्वजन, इन रचनाकारों के महानता का गुणगान करते हैं। ये रचनाकार अपने सामाजिक जीवन में क्या थे, उनकी परिवारिक स्थिति क्या थी, इसी को बार-बार दुहराते रहने से कहीं अधिक आवश्यक है कि उनकी रचनाओं को रखा जाए। लोग उनकी समीक्षा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने यह लिखा, वह लिखा, ऐसा लिखा, वैसा ऐसा लिखा कहीं यह उजागर नहीं होता कि उन्होंने क्या लिखा, बिना रचना को जाने केवल कुछ विद्वानों के मुंह से उसकी समीक्षा सुन लेना कितनी आनंददाई है इसकी कल्पना की जा सकती है। वहीं कुछ लोग अगर उस रचनाकार की, जिसकी पुण्यतिथि या जन्मतिथि मनाई जा रही है, मूल-रचना को रखें तो कम से कम वहां बैठे लोग उस रचना से वाकिफ तो हो सकेंगे।
अंत में, मैं माफी चाहता हूं उन विद्वजनों से जिनकी बंधी- बंधाई परिपाटी में खलल डालने का मैं एक बार फिर से गुनहगार बन बैठा हूं।

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