जुलूस, ( लघुकथा )

जुलूस।               - अमित कुमार मिश्रा।

डॉक्टर बृजमोहन ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह से उसकी गाड़ी इस भीड़ भाड़ से निकालने का मौका दे दिया जाए। काफी देर जहोजहद करने के बाद जब उसने देखा की गाड़ी आगे ले जाने का कोई उपाय नहीं है तो वह सामने खड़े पुलिस वालों से विनती करने लगा, लगभग गिड़गिड़ाते हुए उसने कहा- 

“मेरी क्लीनिक में एक मरीज काफी गंभीर हालत में पड़ा हुआ है यदि मैं वक्त पर नहीं पहुंचा तो उसकी जान भी जा सकती है। कृपया मुझे जाने का मार्ग दे दीजिए।” 

इस पर पुलिस के एक अधिकारी ने झल्लाते हुए कहा-

“सभी को किसी न किसी कारण से जाने की जल्दी पड़ी है लेकिन ध्यान से सुन लो डॉक्टर जब तक विधायक जी का जुलूस यहां से गुजर नहीं जाता तब तक एक साइकिल तक मैं आगे नहीं बढ़ने दूंगा, चुपचाप जाकर अपनी गाड़ी में बैठो।”  काफी विनती करने पर भी कोई असर ना होता देख डॉक्टर आकर गाड़ी में बैठ गए। वे अपने इलाके के एक प्रसिद्ध डॉक्टर थे। आसपास के दस-बारह गांव के मरीज उन्हीं के यहां अपना इलाज करवाते थे। वे शहर के सरकारी अस्पताल से रिटायर होने के बाद यहां सदर बाजार में अपनी क्लीनिक में बैठते थे जहां उन्होंने आपातकालीन स्थिति के लिए भी सभी सामान जुटा रखा था। इस क्षेत्र में उनके अलावे जितने भी डॉक्टर थे वे सभी छोटी मोटी बीमारियों में कुछ दवा तो दे दिया करते थे लेकिन विशेष आपातकालीन स्थिति में एक डॉक्टर बृजमोहन हीं मरीजों को देख पाते थे। जिला वहां से लगभग अठाईस किलोमीटर दूर था, भीड़ भाड़ के वक्त जिला अस्पताल जाने में डेढ़ से दो घंटे का समय भी लग जाता था। 

अभी कुछ वक्त पहले थकान से हल्का बुखार महसूस करते हुए डॉक्टर साहब अपने पुश्तैनी मकान में बैठे ही थे कि क्लीनिक से फोन आया ‘एक मरीज जिसका एक्सीडेंट एक ट्रैक्टर से हो गया है वह काफी गंभीर हालत में क्लीनिक पर लाया गया है, यदि तुरंत ही उसका इलाज नहीं किया गया तो उसका प्राण बचा पाना मुश्किल होगा।’ डॉक्टर साहब ने अपने कंपाउंडर को कुछ दवा बतलाकर निर्देश देते हुए कहा कि मैं तुरंत ही घर से निकल रहा हूं। 

उनके घर से क्लीनिक का फासला लगभग छः किलोमीटर का था। वे अभी दो किलोमीटर गांव से निकलकर मुख्य मार्ग पर पहुंचे ही थे कि एक बड़े जाम का सामना करना पड़ा। मालूम करने पर पता चला कि क्षेत्रीय विधायक जुलूस निकाल रहा है जिस कारण पुलिस वालों ने बाकी यातायात को काफी समय से रोक रखा है। विधायक जी का सरकार में बहुत दबदबा है और थानेदार को डिस्ट्रिक्ट सुपरिंटेंडेंट ने यह निर्देश दिया है कि विधायक जी के जुलूस का जिम्मा ठीक ढंग से निभाया जाए और यातायात को समय रहते पहले ही सड़क के किनारे खड़ा करवा दिया जाए। गाड़ी में बैठे बैठे डॉक्टर साहब ने सोचा-

“ये पुलिसवाले नेताओं की गुलामी करते हैं बाकी किसी की इज्जत करने का इन्हें तमीज ही नहीं आप डॉक्टर, इंजीनियर, मास्टर, प्रोफेसर कुछ भी हों इनके लिए इनके चपरासी से ज्यादा नहीं।”

“मुझे पिछले कच्चे रास्ते से ही निकल जाना चाहिए था पता नहीं क्लीनिक में मरीज का क्या हाल होगा।” कंपाउंडर ने इतनी देर में दो तीन बार फोन करके मरीज की स्थिति और बिगड़ने की सूचना दी थी। मरीज एक बाईस वर्षीय युवक था जो अपनी मोटरसाइ से कहीं जा रहा था और ट्रैक्टर से उसकी सीधी टक्कर हो गई थी, जिसके कारण उसका सर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था। वह बेहोश था और रक्त बूरी तरह से प्रवाहित हो रहा था। डॉक्टर ने जैसे ही गाड़ी पीछे करनी चाहि उसने देखा कि पीछे गाड़ियों की लंबी कतार लगी है और गाड़ी थोड़ी सी भी पीछे करने की गुंजाइश नहीं है।झुंझलाकर वे गाड़ी से उतरे और पुनः दरोगा जी के पास जाकर विनती करने लगें। इस बार दरोगा जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने डॉक्टर के छाती पर हाथ रखकर पीछे धक्का देते हुए कहा- “सबसे अधिक जल्दी तुम्हें ही पड़ी है अगर तुमने एक बार भी और मुझे परेशान किया तो ऐसी पिटाई करूंगा कि तुम्हें खुद डॉक्टर की जरूरत पड़ जाएगी।” डॉक्टर साहब ने अपने पूरे जीवन में ऐसी बेइज्जती कभी महसूस नहीं की थी उन्हें लग रहा था जैसे उनके छाती पर दरोगा का हाथ चिपक गया हो और एक असहनीय बोझ उनके सीने को दबाए जा रही थी लेकिन उन्हें अपनी बेइज्जती से अधिक मरीज की चिंता साल रही थी और वे चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गए। 

लगभग आधे घंटे बाद जुलूस के गुजर जाने पर जब यातायात सुचारु किया गया तब वे बेतहाशा गाड़ी भगाते हुए अपने क्लीनिक पर पहुंचे लेकिन लगभग दस मिनट के परिश्रम के बाद उन्होंने मरीज को मृत घोषित कर दिया। मरीज के परिजन रोने चिल्लाने लगे और डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर जाकर निढाल से बैठ गए। मरीज को ना बचा पाने का दर्द और सीने पर दरोगा के पंजे का दबाव वे एक साथ महसूस कर रहे थे, और अंदर ही अंदर उनकी बेचैनी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। कुछ समय बाद जब काफी शोर-शराबा सुनकर वे बाहर निकले तो उन्होंने देखा इस इलाके का थानेदार सुधीर सिंह शव के पास बैठकर बिलख-बिलख कर रो रहा है पूछने पर पता चला कि मरने वाला उनका इकलौता लड़का था। यह सुनते ही डॉक्टर को लगा कि जैसे उसके सीने पर चिपका हुआ पंजा धीरे धीरे अलग होने लगा है और उनके सीने पर जो असहनीय बोझ पड़ा हुआ था धीरे धीरे कम सा होने लगा। वे एक लंबी सांस खींचते हुए अपने चेंबर में जाकर बैठ गए।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )