हिंदी के विकास में अन्य भाषा के शब्दों का योगदान, (आलेख.)
हिंदी के विकास में अन्य भाषा के शब्दों का योगदान
अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’
हमारी चिंतन प्रक्रिया मौलिक भाषा से ही जन्म लेती है, आकार पाती है। संपूर्ण भारतीय वांग्मय, सभ्यता एवं संस्कृति, अपने सामासिक रूप में हिंदी भाषा में प्रतिबिंबित है। हिंदी भाषा आज इतनी समृद्ध हो चुकी है कि वह विश्व भाषा बनने की दिशा में सबसे आगे है। वस्तुतः किसी भाषा का प्रवाह नदी की तरह होती है, भाषा जब प्रवाहित होती है तब वह अपने प्रभाव क्षेत्र में पड़ने वाली अनेक भाषाओं से कुछ न कुछ शब्द अर्जीत करती रहती है। अपनी इस महायात्रा के मार्ग में हिंदी को जो कुछ भी श्रेयस्कर और विशिष्ट मिला हिंदी ने ग्रहण करने में कभी संकोच नहीं की। सोलह भाषा रूपी नदियों का जल मिला है तब जाकर हिंदी ने यह रूप ग्रहण की है। हिंदी ने उदारतापूर्वक अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं। हिंदी के शब्द भंडार को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज स्त्रोतों से शब्द ग्रहण किए हैं। उर्दू जबान तो हिंदी की सगी बहन की तरह उसकी पूरक ही रही है। हिंदी में अरबी और फारसी के शब्दों के घुलमिल जाने की सार्थकता पर विचार करते हुए प्रेमचंद ने कहा है- “हिंदी में हजारों शब्द, हजारों क्रियाएं, अरबी और फारसी से आई है और ससुराल में आकर घर की देवी हो गई हैं। यहां स्पष्टत: घर की देवी हो जाने से प्रेमचंद का तात्पर्य पूर्णता उनके हिंदी में विलीन हो जाने से है। अंग्रेजी शासन के प्रभाव स्वरूप हमने अंग्रेजी से अनेक शब्द लिए जो हिंदी में इस तरह समाहित हो गए हैं जिससे लगता है कि उनका निर्माण हिंदी भाषा के लिए ही हुआ हो। अन्य भाषा, यथा- अरबी, फारसी, डच, पुर्तगाली, फ्रेंच, जापानी आदि सभी भाषाओं से हिंदी ने शब्द ग्रहण किए हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है-
तुर्की से, तोप, बंदूक, कुर्ता, कैंची, चाकू।
जापानी से, रिक्शा।
पुर्तगाली से, अचार, काजू, कमीज, तौलिया, बाल्टी।
अंग्रेजी से, कमांडर, कर्नल, बेंच, टिकट, सिगरेट, ट्रैक्टर आदि।
जब हम इन शब्दों का प्रयोग हिंदी में करते हैं तब क्षण भर को भी यह प्रतीत नहीं होता कि ये शब्द आयातीत हैं। हिंदी भाषा के साथ वे शब्द इस प्रकार रच-बस गए हैं कि वह हिंदी की अपनी ही उपज लगती है। भाषा का धर्म ही जल की तरह प्रवाहमान रहना है। जिस प्रकार स्थिर जल दूषित हो जाता है उसी प्रकार भाषा भी यदि प्रवाहित न हो रही हो तो वह अपनी शक्ति खो देगी, दूषित हो जाएगी। भाषा अपनी आवश्यकता, देशकाल, वातावरण के अनुरूप शब्द गढ़ती भी है और उदारतापूर्वक ग्रहण भी करती है, यही भाषा की स्वभाविक प्रकृति है। कथा-सम्राट प्रेमचंद ने भाषा के प्रवाहवान होने की प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि- “भाषा सुंदरी को कोठरी में बंद करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं लेकिन उसके जीवन का मूल्य देकर।” यदि हम हिंदी में आने वाले अन्य भाषा के शब्दों को रोकने, हिंदी के प्रवाह को कोठरी में बंद करने का प्रयास करते हैं तो यह हिंदी की शक्ति को घटाना ही होगा। हिंदी में अनेक शब्द ऐसे भी हैं जिसे हिंदी ने भारत की ही अन्य भाषाओं से ग्रहण किए हैं, उस शब्द में अपने देश की मिट्टी कि वही जानी पहचानी महक मिलती है जो हिंदी के अपने शब्दों की है। भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, अवधी आदि प्रांतीय भाषा के शब्दों ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी के विकास में प्रांतीय भाषा के योगदान को स्वीकार करते हुए महादेवी वर्मा ने कहा है- “सभी भारतीय भाषाओं ने अपने चिंतन तथा भावना की उपलब्धियों से राष्ट्र-भाषा को समृद्ध किया है। उनकी देशगत भिन्नता, उनकी तत्त्वगत एकता से प्राणवती होने के कारण महार्घ है।” हिंदी के वैश्विक परिदृश्य और उसकी गतिशीलता पर दृष्टिपात करने से यह सहज ही ज्ञात हो जाता है कि हिंदी आज एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में उभर रही है। 1999 ई. में किए गए अपने सर्वेक्षण के आधार पर जयंति प्रसाद नौटियाल ने हिंदी बोलने वालों की संख्या सवा अरब के लगभग माना है, जिसकी संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। दिन-प्रतिदिन हिंदी के शब्द भंडार में हो रही वृद्धि, उसकी शक्ति को बढ़ा रही है। यही कारण है कि आज देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी की शिक्षा दी जा रही है। हिंदी के समृद्ध होते शब्दकोश का ही चमत्कार है कि आज कंप्यूटर, विज्ञान, अभियांत्रिकी आदि की शिक्षा पाना हिंदी माध्यम से भी संभव हो सका है। इसके लिए हिंदी ने अनेक विदेशी शब्दों को उदारतापूर्वक अपनाया है, जो भाषा की प्रगति का ध्योतक है, इन्हीं कारणों से हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन भी हुआ। आज का युग बाजारवाद का युग है। कई प्रकार की वस्तुएं एक दूसरे देश से आयात-निर्यात करते हैं। भारत में भी देश-विदेश से अनेक वस्तुएं आयातीत किए जाते हैं। ऐसे में उन वस्तुओं के लिए हिंदी कोई शब्द गढ़े इसकी बहुत आवश्यकता नहीं है। उसके लिए हिंदी में उस शब्द का प्रयोग किया जा सकता है जो कि उसके उत्पादक देश में प्रचलित हो, यथा- कंप्यूटर, मोबाइल, रेल, टिकट, कार आदि, को उसी रूप में मान लेने से हिंदी को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचती। अपितु लाभ ही हुआ है। एक प्रश्न यह बनता है कि उन वस्तुओं के नाम या वे शब्द उसी रूप में स्वीकृत कर ली जाए या उसका हिंदी में अनुवाद किया जाए। इस समस्या पर विचार करते हुए डॉ. पुष्पलता भट्ट ने कहा है “जहां पर शब्द हिंदी की प्रकृति में घुल मिल जाए वहां पर उनका जबरदस्ती अनुवाद नहीं करना चाहिए।” इस बात से इंकार नहीं की जा सकती है कि ऐसे शब्दों की संख्या को नियंत्रित रखने की आवश्यकता अवश्य है। हिंदी के प्रयोक्ताओं में एक वर्ग ऐसा भी है जो हिंदी के स्वरुप को खंडित करने में सक्रिय है। यह वर्ग अभिव्यक्ति के लिए भाषा में अपने सक्षम पर्याप्त शब्द होने के बावजूद इसमें अंग्रेजी की बैसाखी लगाने की चेष्टा करता है। इससे भाषा का प्रवाह बाधित होता है एवं उसके स्वरुप में विकृति आ जाती है। अक्सर यह देखने को मिल जाता है कि हिंदी बोलते हुए आज के युवा, हां,नहीं, आदि के स्थान पर यस,नो, का प्रयोग करते हैं। किसी प्रकार की गलती हो जाने पर जब हम ‘क्षमा करें’ शब्द का प्रयोग करते हैं तब महसूस होता है कि वह ह्रदय से निकली है जबकि आजकल लोग जानबूझकर किसी को कष्ट पहुंचा कर ‘सॉरी’ कहते हुए निकल जाते हैं। ऐसा करने से हिंदी के स्वरुप को हानि होती है। हिंदी भाषियों की कोशिश होनी चाहिए कि वह अधिकाधिक हिंदी के शब्दों का ही प्रयोग करें। अन्य भाषा के शब्दों का उपयोग आवश्यकता भर ही करे। ध्यान इस बात कि रखनी चाहिए कि हिंदी में बाहर से आने वाले शब्दों की संख्या इतनी न हो कि वह हिंदी भाषा के अधीन रहकर काम करने के स्थान पर उसी को अधिकार च्युत करने का प्रयास करने लगे। जिस प्रकार किसी राष्ट्र की संप्रभुता एवं स्वाभिमान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज एवं राज्य चिन्ह होता है ठीक उसी प्रकार राष्ट्र की संस्कृति एवं भाषा भी उसके आत्मगौरव और अस्मिता का प्रतीक होता है। भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुए महादेवी वर्मा ने कहा था कि ‘भाषा मानव की सबसे रहस्यमय तथा मौलिक उपलब्धि है। प्रतेक भाषा आपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण करने योग्य है। परंतु अपनी समग्र बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही संभव है।’ ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि भाषा का स्वरूप सरल एवं लचीला हो। भाषा में प्रयुक्त शब्द ऐसे हो कि देशभर में बोली और समझी जा सके। इसी उद्देश्य से हिंदी ने भारत में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं। हिंदी ने अपने देश में बोली जाने वाली भाषाओं के अलावे ऊपर विचार किए गए विदेशी स्रोतों से आयातित शब्दों को इस तरह पचा लिया है कि शिक्षित और अशिक्षित समस्त हिंदी भाषी लोग उन्हें भली प्रकार बोलते और समझते हैं।
निष्कर्ष यही निकलता है कि हिंदी भाषा में प्रयुक्त अन्य भाषा के शब्दों को हिंदी ने इस प्रकार आत्मसात कर लिया है कि उन शब्दों में भारतीय संस्कृति की गूंज सुनाई पड़ती है। हिंदी ने उदारतापूर्वक सभी स्रोतों से शब्द ग्रहण कर अपनी सामासिक शक्ति अर्जित की है और यह हिंदी के विकास में अत्यंत ही सार्थक प्रमाणित हुआ है। सामाजिक दृष्टि से वही शब्द सरल है जो व्यवहार में आ रहा है इससे कोई बहस नहीं कि वह तुर्की से आया है या अरबी से या पुर्तगाली से।
अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’
हमारी चिंतन प्रक्रिया मौलिक भाषा से ही जन्म लेती है, आकार पाती है। संपूर्ण भारतीय वांग्मय, सभ्यता एवं संस्कृति, अपने सामासिक रूप में हिंदी भाषा में प्रतिबिंबित है। हिंदी भाषा आज इतनी समृद्ध हो चुकी है कि वह विश्व भाषा बनने की दिशा में सबसे आगे है। वस्तुतः किसी भाषा का प्रवाह नदी की तरह होती है, भाषा जब प्रवाहित होती है तब वह अपने प्रभाव क्षेत्र में पड़ने वाली अनेक भाषाओं से कुछ न कुछ शब्द अर्जीत करती रहती है। अपनी इस महायात्रा के मार्ग में हिंदी को जो कुछ भी श्रेयस्कर और विशिष्ट मिला हिंदी ने ग्रहण करने में कभी संकोच नहीं की। सोलह भाषा रूपी नदियों का जल मिला है तब जाकर हिंदी ने यह रूप ग्रहण की है। हिंदी ने उदारतापूर्वक अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं। हिंदी के शब्द भंडार को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज स्त्रोतों से शब्द ग्रहण किए हैं। उर्दू जबान तो हिंदी की सगी बहन की तरह उसकी पूरक ही रही है। हिंदी में अरबी और फारसी के शब्दों के घुलमिल जाने की सार्थकता पर विचार करते हुए प्रेमचंद ने कहा है- “हिंदी में हजारों शब्द, हजारों क्रियाएं, अरबी और फारसी से आई है और ससुराल में आकर घर की देवी हो गई हैं। यहां स्पष्टत: घर की देवी हो जाने से प्रेमचंद का तात्पर्य पूर्णता उनके हिंदी में विलीन हो जाने से है। अंग्रेजी शासन के प्रभाव स्वरूप हमने अंग्रेजी से अनेक शब्द लिए जो हिंदी में इस तरह समाहित हो गए हैं जिससे लगता है कि उनका निर्माण हिंदी भाषा के लिए ही हुआ हो। अन्य भाषा, यथा- अरबी, फारसी, डच, पुर्तगाली, फ्रेंच, जापानी आदि सभी भाषाओं से हिंदी ने शब्द ग्रहण किए हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है-
तुर्की से, तोप, बंदूक, कुर्ता, कैंची, चाकू।
जापानी से, रिक्शा।
पुर्तगाली से, अचार, काजू, कमीज, तौलिया, बाल्टी।
अंग्रेजी से, कमांडर, कर्नल, बेंच, टिकट, सिगरेट, ट्रैक्टर आदि।
जब हम इन शब्दों का प्रयोग हिंदी में करते हैं तब क्षण भर को भी यह प्रतीत नहीं होता कि ये शब्द आयातीत हैं। हिंदी भाषा के साथ वे शब्द इस प्रकार रच-बस गए हैं कि वह हिंदी की अपनी ही उपज लगती है। भाषा का धर्म ही जल की तरह प्रवाहमान रहना है। जिस प्रकार स्थिर जल दूषित हो जाता है उसी प्रकार भाषा भी यदि प्रवाहित न हो रही हो तो वह अपनी शक्ति खो देगी, दूषित हो जाएगी। भाषा अपनी आवश्यकता, देशकाल, वातावरण के अनुरूप शब्द गढ़ती भी है और उदारतापूर्वक ग्रहण भी करती है, यही भाषा की स्वभाविक प्रकृति है। कथा-सम्राट प्रेमचंद ने भाषा के प्रवाहवान होने की प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि- “भाषा सुंदरी को कोठरी में बंद करके आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं लेकिन उसके जीवन का मूल्य देकर।” यदि हम हिंदी में आने वाले अन्य भाषा के शब्दों को रोकने, हिंदी के प्रवाह को कोठरी में बंद करने का प्रयास करते हैं तो यह हिंदी की शक्ति को घटाना ही होगा। हिंदी में अनेक शब्द ऐसे भी हैं जिसे हिंदी ने भारत की ही अन्य भाषाओं से ग्रहण किए हैं, उस शब्द में अपने देश की मिट्टी कि वही जानी पहचानी महक मिलती है जो हिंदी के अपने शब्दों की है। भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, अवधी आदि प्रांतीय भाषा के शब्दों ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी के विकास में प्रांतीय भाषा के योगदान को स्वीकार करते हुए महादेवी वर्मा ने कहा है- “सभी भारतीय भाषाओं ने अपने चिंतन तथा भावना की उपलब्धियों से राष्ट्र-भाषा को समृद्ध किया है। उनकी देशगत भिन्नता, उनकी तत्त्वगत एकता से प्राणवती होने के कारण महार्घ है।” हिंदी के वैश्विक परिदृश्य और उसकी गतिशीलता पर दृष्टिपात करने से यह सहज ही ज्ञात हो जाता है कि हिंदी आज एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में उभर रही है। 1999 ई. में किए गए अपने सर्वेक्षण के आधार पर जयंति प्रसाद नौटियाल ने हिंदी बोलने वालों की संख्या सवा अरब के लगभग माना है, जिसकी संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। दिन-प्रतिदिन हिंदी के शब्द भंडार में हो रही वृद्धि, उसकी शक्ति को बढ़ा रही है। यही कारण है कि आज देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी की शिक्षा दी जा रही है। हिंदी के समृद्ध होते शब्दकोश का ही चमत्कार है कि आज कंप्यूटर, विज्ञान, अभियांत्रिकी आदि की शिक्षा पाना हिंदी माध्यम से भी संभव हो सका है। इसके लिए हिंदी ने अनेक विदेशी शब्दों को उदारतापूर्वक अपनाया है, जो भाषा की प्रगति का ध्योतक है, इन्हीं कारणों से हिंदी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन भी हुआ। आज का युग बाजारवाद का युग है। कई प्रकार की वस्तुएं एक दूसरे देश से आयात-निर्यात करते हैं। भारत में भी देश-विदेश से अनेक वस्तुएं आयातीत किए जाते हैं। ऐसे में उन वस्तुओं के लिए हिंदी कोई शब्द गढ़े इसकी बहुत आवश्यकता नहीं है। उसके लिए हिंदी में उस शब्द का प्रयोग किया जा सकता है जो कि उसके उत्पादक देश में प्रचलित हो, यथा- कंप्यूटर, मोबाइल, रेल, टिकट, कार आदि, को उसी रूप में मान लेने से हिंदी को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचती। अपितु लाभ ही हुआ है। एक प्रश्न यह बनता है कि उन वस्तुओं के नाम या वे शब्द उसी रूप में स्वीकृत कर ली जाए या उसका हिंदी में अनुवाद किया जाए। इस समस्या पर विचार करते हुए डॉ. पुष्पलता भट्ट ने कहा है “जहां पर शब्द हिंदी की प्रकृति में घुल मिल जाए वहां पर उनका जबरदस्ती अनुवाद नहीं करना चाहिए।” इस बात से इंकार नहीं की जा सकती है कि ऐसे शब्दों की संख्या को नियंत्रित रखने की आवश्यकता अवश्य है। हिंदी के प्रयोक्ताओं में एक वर्ग ऐसा भी है जो हिंदी के स्वरुप को खंडित करने में सक्रिय है। यह वर्ग अभिव्यक्ति के लिए भाषा में अपने सक्षम पर्याप्त शब्द होने के बावजूद इसमें अंग्रेजी की बैसाखी लगाने की चेष्टा करता है। इससे भाषा का प्रवाह बाधित होता है एवं उसके स्वरुप में विकृति आ जाती है। अक्सर यह देखने को मिल जाता है कि हिंदी बोलते हुए आज के युवा, हां,नहीं, आदि के स्थान पर यस,नो, का प्रयोग करते हैं। किसी प्रकार की गलती हो जाने पर जब हम ‘क्षमा करें’ शब्द का प्रयोग करते हैं तब महसूस होता है कि वह ह्रदय से निकली है जबकि आजकल लोग जानबूझकर किसी को कष्ट पहुंचा कर ‘सॉरी’ कहते हुए निकल जाते हैं। ऐसा करने से हिंदी के स्वरुप को हानि होती है। हिंदी भाषियों की कोशिश होनी चाहिए कि वह अधिकाधिक हिंदी के शब्दों का ही प्रयोग करें। अन्य भाषा के शब्दों का उपयोग आवश्यकता भर ही करे। ध्यान इस बात कि रखनी चाहिए कि हिंदी में बाहर से आने वाले शब्दों की संख्या इतनी न हो कि वह हिंदी भाषा के अधीन रहकर काम करने के स्थान पर उसी को अधिकार च्युत करने का प्रयास करने लगे। जिस प्रकार किसी राष्ट्र की संप्रभुता एवं स्वाभिमान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज एवं राज्य चिन्ह होता है ठीक उसी प्रकार राष्ट्र की संस्कृति एवं भाषा भी उसके आत्मगौरव और अस्मिता का प्रतीक होता है। भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुए महादेवी वर्मा ने कहा था कि ‘भाषा मानव की सबसे रहस्यमय तथा मौलिक उपलब्धि है। प्रतेक भाषा आपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण करने योग्य है। परंतु अपनी समग्र बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही संभव है।’ ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि भाषा का स्वरूप सरल एवं लचीला हो। भाषा में प्रयुक्त शब्द ऐसे हो कि देशभर में बोली और समझी जा सके। इसी उद्देश्य से हिंदी ने भारत में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं। हिंदी ने अपने देश में बोली जाने वाली भाषाओं के अलावे ऊपर विचार किए गए विदेशी स्रोतों से आयातित शब्दों को इस तरह पचा लिया है कि शिक्षित और अशिक्षित समस्त हिंदी भाषी लोग उन्हें भली प्रकार बोलते और समझते हैं।
निष्कर्ष यही निकलता है कि हिंदी भाषा में प्रयुक्त अन्य भाषा के शब्दों को हिंदी ने इस प्रकार आत्मसात कर लिया है कि उन शब्दों में भारतीय संस्कृति की गूंज सुनाई पड़ती है। हिंदी ने उदारतापूर्वक सभी स्रोतों से शब्द ग्रहण कर अपनी सामासिक शक्ति अर्जित की है और यह हिंदी के विकास में अत्यंत ही सार्थक प्रमाणित हुआ है। सामाजिक दृष्टि से वही शब्द सरल है जो व्यवहार में आ रहा है इससे कोई बहस नहीं कि वह तुर्की से आया है या अरबी से या पुर्तगाली से।
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