प्राणदान, ( कहानी.)
प्राणदान
सुबह से ही घर के सारे लोग तैयारी में लगे हैं, आस-पड़ोस में उत्सव का माहौल बना हुआ था, सभी कुछ-न-कुछ भूमिका निभाने में तल्लीन हैं। प्राणेश बाबू आज अपनी बेटी का तिलक लेकर जाने वाले हैं। सुलेखा के लिए वे पिछले चार वर्षों से वर की तलाश कर रहे हैं। उन्हे तो कई रिश्ते पसंद आए लेकिन लड़के वालों की मांग स्वीकारना उनके लिए संभव नहीं हो सका। वैसे सुलेखा ने बी.एस.सी. तक की पढ़ाई की है, गृह कार्य में निपुण है, लेकिन भारत में बहू-बेटी लक्ष्मी मानी जाती है। अब सोचिए, लक्ष्मी जिस घर से विदा हो रही हो वह कर्ज में न डूबे और जिस घर में जा रही हो वहाँ पांच-दस लाख शगुन न आ सके तो लानत है ऐसी लक्ष्मी पर।
सुबह से ही घर के सारे लोग तैयारी में लगे हैं, आस-पड़ोस में उत्सव का माहौल बना हुआ था, सभी कुछ-न-कुछ भूमिका निभाने में तल्लीन हैं। प्राणेश बाबू आज अपनी बेटी का तिलक लेकर जाने वाले हैं। सुलेखा के लिए वे पिछले चार वर्षों से वर की तलाश कर रहे हैं। उन्हे तो कई रिश्ते पसंद आए लेकिन लड़के वालों की मांग स्वीकारना उनके लिए संभव नहीं हो सका। वैसे सुलेखा ने बी.एस.सी. तक की पढ़ाई की है, गृह कार्य में निपुण है, लेकिन भारत में बहू-बेटी लक्ष्मी मानी जाती है। अब सोचिए, लक्ष्मी जिस घर से विदा हो रही हो वह कर्ज में न डूबे और जिस घर में जा रही हो वहाँ पांच-दस लाख शगुन न आ सके तो लानत है ऐसी लक्ष्मी पर।
सुलेखा के लिए जिस वर की तलाश प्राणेश बाबू ने की है वह सर्वगुण संपन्न है, साक्षात भगवान राम। बल्कि राम से भी गुणी। राम, पिता के कहने पर घर से गए थे, ये महाशय संदीप जी, गांव के पंचायत में लड़की छेड़ने का मामला आते ही गृह त्यागकर दिल्ली चले गए। जाते समय कुछ पैसा भी घर से लेकर गए थे। दो वर्ष बाद लौटे हैं।
संदीप के पिता, दीनानाथ बाबू गांव के संपन्न व्यक्ति हैं, आज के समय में जब अस्सी प्रतिशत लोग कर्ज के तले दबे हैं दीनानाथ बाबू का नाम कर्ज देने वालों की सूची में शामिल है। बातचीत के दौरान बड़े नाज से दीनानाथ बाबू ने प्राणेश बाबू से कहा कि,
‘यह जो भवन आप देख रहे हैं, संदीप ने अपनी कमाई से बनवाया है।’
‘यह जो भवन आप देख रहे हैं, संदीप ने अपनी कमाई से बनवाया है।’
प्राणेश बाबू का लड़का अमृतेश जरा मुंहफट था, उसने पूछा,-
“संदीप जी दिल्ली कमाने कब गए थे ?”
“दो वर्ष कमाकर पिछले महीने ही लौटा है। बड़ी अच्छी नौकरी लगी थी लाखों रुपए जमा किए हैं। बीच-बीच में पैसा भेजता रहा जिससे मकान बना है।” कहते हुए दीनानाथ बाबू कुर्सी पर फैल गए।
“संदीप जी दिल्ली कमाने कब गए थे ?”
“दो वर्ष कमाकर पिछले महीने ही लौटा है। बड़ी अच्छी नौकरी लगी थी लाखों रुपए जमा किए हैं। बीच-बीच में पैसा भेजता रहा जिससे मकान बना है।” कहते हुए दीनानाथ बाबू कुर्सी पर फैल गए।
अमृतेश ने कहा,- “लेकिन आपका मकान तो कम से कम छः-सात वर्ष पुराना अवश्य होगा।”
दीनानाथ बाबू ने हकलाते हुए कहा,- “अरे नहीं, लेकिन चार-पांच वर्ष पुराना है। वह मैंने सामान उधार लेकर मकान बनवाया था, संदीप ने कमा कर सब के पैसे चुका दिया है।”
बातचीत आगे बढ़ने से पहले ही एक बच्ची ने आकर दीनानाथ बाबू से कहा- “चाची आपको बुला रही है।”
“अभी आया।”- कहकर दीनानाथ बाबू भीतर चले गए।
बातचीत आगे बढ़ने से पहले ही एक बच्ची ने आकर दीनानाथ बाबू से कहा- “चाची आपको बुला रही है।”
“अभी आया।”- कहकर दीनानाथ बाबू भीतर चले गए।
अमृतेश के बड़े चाचा ने उसे फटकारते हुए कहा- “तुम चुप रहा करो ज्यादा वकालत झारोगे तो हो चुकी शादी।”
भीतर दीनानाथ बाबू की पत्नी सुंदरी देवी ने दीनानाथ बाबू से कहा-
“पांच-पांच लोग मुंह उठाए आ गए हैं, खाना भी बनेगा क्या ?” दीनानाथ बाबू ने सोचते हुए कहा- “अभी रहने दो, अगर लेनदेन की बात बन गई तो खिला देंगे नहीं तो कितनों को खिलाएं ? गुनी लड़का है लड़की वालों का आना-जाना लगा ही रहेगा।”
“ठीक है, आप जाओ, मैं चाय और बिस्कुट भेजती हूं।”
दीनानाथ बाबू बाहर आ गए और अपने साले, जो कि यह रिश्ता करवा रहे थे, उनको अलग ले जाकर बोले- “इन से पैसों की बात कर लो तब कुछ देखा जाएगा।”
“ठीक है चलिए बात कर लेते हैं।” आते ही उन्होंने कहा- “प्राणेश बाबू लेन-देन की बात भी निपटा लिया जाए ?”
भीतर दीनानाथ बाबू की पत्नी सुंदरी देवी ने दीनानाथ बाबू से कहा-
“पांच-पांच लोग मुंह उठाए आ गए हैं, खाना भी बनेगा क्या ?” दीनानाथ बाबू ने सोचते हुए कहा- “अभी रहने दो, अगर लेनदेन की बात बन गई तो खिला देंगे नहीं तो कितनों को खिलाएं ? गुनी लड़का है लड़की वालों का आना-जाना लगा ही रहेगा।”
“ठीक है, आप जाओ, मैं चाय और बिस्कुट भेजती हूं।”
दीनानाथ बाबू बाहर आ गए और अपने साले, जो कि यह रिश्ता करवा रहे थे, उनको अलग ले जाकर बोले- “इन से पैसों की बात कर लो तब कुछ देखा जाएगा।”
“ठीक है चलिए बात कर लेते हैं।” आते ही उन्होंने कहा- “प्राणेश बाबू लेन-देन की बात भी निपटा लिया जाए ?”
प्राणेश बाबू ने हाथ जोड़कर कहा- “जी, बात दीनानाथ बाबू के हाथ में है ऐसी युक्ति निकालें कि मेरे भी प्राण की रक्षा हो ?”
दीनानाथ बाबू ने कहा- “आपने सोचा तो होगा ही कितना तक खर्च करना है ?”
प्राणेश बाबू के बड़े भाई प्रवेश बाबू ने कहा-
“महाशय, हम तो लड़की वाले हैं कुछ न भी दे तब भी लाखों का खर्च हो जाता है। आप ही बतलाइए जिससे हमारा कल्याण हो।” दीनानाथ बाबू ने कहा,- “कई लड़की वाले इन दिनों बात कर गए हैं, लड़के ने कॉमर्स से इंटर की पढ़ाई की है वह चाहता है लड़की भी कॉमर्स से हो।”
“महाशय, हम तो लड़की वाले हैं कुछ न भी दे तब भी लाखों का खर्च हो जाता है। आप ही बतलाइए जिससे हमारा कल्याण हो।” दीनानाथ बाबू ने कहा,- “कई लड़की वाले इन दिनों बात कर गए हैं, लड़के ने कॉमर्स से इंटर की पढ़ाई की है वह चाहता है लड़की भी कॉमर्स से हो।”
अमृतेश ने तुरंत जवाब दिया- “मेरी बहन ने तो मैथ से बी.एस.सी. किया है।”
दीनानाथ बाबू आंखें तरेर कर बोले- “तो जाकर आप लोग एम.एस.सी. तलाश कीजिए।”
प्रवेश घबराकर बोले- “अरे नहीं दीनानाथ बाबू, लड़का है ऐसे ही बोल बैठा आप नाराज ना होइए, बतलाइए कैसे हमारा भला हो ?” दीनानाथ बाबू ने रूखेपन से कहा- “देखिए लड़का काबिल है पांच लाख रुपए और गाड़ी नगद मिल रहे हैं, सामान तो सभी देते ही हैं।” “दीनानाथ बाबू कृपा कीजिए, आप ही की लड़की है इतना कैसे दे सकेंगे हम ? फिर अलग खर्च भी चार-पांच लाख से कम थोड़े ही पड़ेगा।” प्राणनाथ बाबू ने हाथ जोड़कर कहा।
“देखिए मैं साढ़े चार लाख रुपए और गाड़ी लूंगा, उससे कम कतई नहीं। सामान जो भी दे ठोस होना चाहिए।” कहते हुए दीनानाथ बाबू उठने लगे, प्राणनाथ बाबू ने उनकी कलाई पकड़ कर उन्हें बैठाते हुए कहा-
“बैठिए तो दीनानाथ बाबू अब तो जो भी होना है वह आप की सहमति से ही होगा। बारात कितनी लाएंगे आप ?”
“कम-से-कम तीन सौ लोग तो होंगे ही।”
“बैठिए तो दीनानाथ बाबू अब तो जो भी होना है वह आप की सहमति से ही होगा। बारात कितनी लाएंगे आप ?”
“कम-से-कम तीन सौ लोग तो होंगे ही।”
प्रवेश बाबू ने कहा- “यह तो बहुत ज्यादा हो जाएगा प्रबंध करना मुश्किल होगा। आप सौ-डेढ़ सौ तक ले आएं, हम खातिरदारी में कमी नहीं रखेंगे।”
दीनानाथ बाबू तिलमिला कर बोले- “तो आप क्या चाहते हैं, जिसका खाए हैं उन्हें छोड़ दें ? नाक कटवा ले अपनी बिरादरी में ?”
आखिरकार तय यह हुआ कि प्राणनाथ बाबू तिलक में अधिक से अधिक पन्द्रह आदमी के साथ आएंगे और चार लाख नगद, पैंसठ हजार गाड़ी का, और घर के सामान, जो दिए जाने की परंपरा है, तिलक में देंगे। बात तय हो जाने पर उन्हें भोजन कराकर विदा किया गया। रास्ते में दीनानाथ बाबू के साले ने प्राणनाथ बाबू से कहा-
“बाबू साहब! लड़की का भाग्य देखिए, इतना अच्छा लड़का कैसा सस्ते में मिल गया। पैसे तो जमा होंगे ही ?”
दीनानाथ बाबू तिलमिला कर बोले- “तो आप क्या चाहते हैं, जिसका खाए हैं उन्हें छोड़ दें ? नाक कटवा ले अपनी बिरादरी में ?”
आखिरकार तय यह हुआ कि प्राणनाथ बाबू तिलक में अधिक से अधिक पन्द्रह आदमी के साथ आएंगे और चार लाख नगद, पैंसठ हजार गाड़ी का, और घर के सामान, जो दिए जाने की परंपरा है, तिलक में देंगे। बात तय हो जाने पर उन्हें भोजन कराकर विदा किया गया। रास्ते में दीनानाथ बाबू के साले ने प्राणनाथ बाबू से कहा-
“बाबू साहब! लड़की का भाग्य देखिए, इतना अच्छा लड़का कैसा सस्ते में मिल गया। पैसे तो जमा होंगे ही ?”
प्राणनाथ बाबू ने दीनता से कहा- “पैसे कहां हैं सब तो इंतेज़ाम ही करना होगा।”
“लेकिन आप तो नौकरी में हैं न ?”
“हां छोटी सी नौकरी है। पत्नी की बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, पैसे जमा हुए ही नहीं।”
“अच्छा देख लीजिएगा, एक ही लड़की है दूसरी भी होती तो चिंता थी।”
“लेकिन आप तो नौकरी में हैं न ?”
“हां छोटी सी नौकरी है। पत्नी की बीमारी, बच्चों की पढ़ाई, पैसे जमा हुए ही नहीं।”
“अच्छा देख लीजिएगा, एक ही लड़की है दूसरी भी होती तो चिंता थी।”
प्राणनाथ बाबू ने दीर्घश्वास खींच कर कहा- “ठीक कहते हैं, एक में प्राणदान करना है दूसरी भी होती तो जीतेजी अस्थिदान भी हो जाता।”
देखते-देखते दो महीने का समय गुजर गया। आज प्राणनाथ बाबू तिलक लेकर जाने वाले थे। दो लाख का बैंक लोन उन्हें मिल गया था जो उनके तनख्वाह से आधे पैसे प्रति माह काटकर संभवत: उनके जीवनकाल में ही चुकता हो जाए। तीन लाख का इंतजाम जमीन बेचकर हुआ। चार लाख उन्होंने महाजन से सूद पर लिया था। सामान गाड़ी पर लादे जा चुके थे, सभी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी। तभी प्राणनाथ बाबू की पत्नी स्वर्णा ने आकर कहा-
“पता नहीं क्यों, सुलेखा कब से रोए जा रही है। मैंने लाख कोशिश की चुप ही नहीं हो रही।”
देखते-देखते दो महीने का समय गुजर गया। आज प्राणनाथ बाबू तिलक लेकर जाने वाले थे। दो लाख का बैंक लोन उन्हें मिल गया था जो उनके तनख्वाह से आधे पैसे प्रति माह काटकर संभवत: उनके जीवनकाल में ही चुकता हो जाए। तीन लाख का इंतजाम जमीन बेचकर हुआ। चार लाख उन्होंने महाजन से सूद पर लिया था। सामान गाड़ी पर लादे जा चुके थे, सभी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी। तभी प्राणनाथ बाबू की पत्नी स्वर्णा ने आकर कहा-
“पता नहीं क्यों, सुलेखा कब से रोए जा रही है। मैंने लाख कोशिश की चुप ही नहीं हो रही।”
प्राणनाथ बाबू ने कहा- “चलो मैं चल कर देखता हूं।”
प्राणनाथ बाबू जैसे ही कमरे में पहुँचे सुलेखा उनसे लिपट कर फ्फक-फ्फक कर रोने लगी। प्राणनाथ बाबू ने सुलेखा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- “क्या हुआ बेटा, तू रो क्यों रही है ?”
प्राणनाथ बाबू जैसे ही कमरे में पहुँचे सुलेखा उनसे लिपट कर फ्फक-फ्फक कर रोने लगी। प्राणनाथ बाबू ने सुलेखा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- “क्या हुआ बेटा, तू रो क्यों रही है ?”
देर तक रोते रहने के कारण सुलेखा को हिचकी आने लगी थी उसने सुबकते हुए कहा- “पापा, मैं आपके लिए श्राप बनकर कर पैदा हुई।”
इतना सुनते ही दीनानाथ बाबू का वह बांध टूट गया जो उन्होंने आंसुओं को रोकने के लिए बनाया था। अपने आंसू पोछते हुए उन्होंने कहा-
“नहीं बेटा तू मेरे कलेजे का टुकड़ा है, हमें नाज है तुम पर।”
“नहीं बेटा तू मेरे कलेजे का टुकड़ा है, हमें नाज है तुम पर।”
सुलेखा प्राणनाथ बाबू की आंखों में आंखें डाल कर बोली-
“आप सारी उम्र कर्ज के तले दबे रहोगे, भाई के हिस्से की जमीन बेचनी पड़ी, उन पैसों पर मैं अपना घर बसाऊंगी और खुद को आप के कलेजे का टुकड़ा समझूं। नहीं पापा मैं डायन हूं, डायन जातेे-जाते अपनों को ही खा जाती है।”
“आप सारी उम्र कर्ज के तले दबे रहोगे, भाई के हिस्से की जमीन बेचनी पड़ी, उन पैसों पर मैं अपना घर बसाऊंगी और खुद को आप के कलेजे का टुकड़ा समझूं। नहीं पापा मैं डायन हूं, डायन जातेे-जाते अपनों को ही खा जाती है।”
प्राणनाथ बाबू सुलेखा को अभी भी नासमझ समझते रहे थे उसके मुंह से यह सब सुनकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। सुलेखा उन्हें बेड पर बैठाते हुए बोली- “पापा! आज पहली बार मुझे अपने लड़की होने पर अफसोस हो रहा है।”
प्राणनाथ बाबू के बोल ही नहीं फूट रहे थे। उनकी आंखों से निरंतर अश्रुधार बहे जा रही थी। एक ओर खरी उनकी पत्नी स्वर्णा और दूसरी ओर अमृतेश भी रो रहे थे। लेकिन आश्चर्य की सुलेखा की आंखों में आंसू के बजाय एक चमक उभर आई थी, उसकी हिचकी आश्चर्यजनक रूप से बंद हो गई, ऐसा लग रहा था जैसे उसे अपने कर्तव्य का बोध हो चुका हो। वह प्राणनाथ बाबू के आंसू पूछते हुए बोली- “पापा, आज तक मैंने आपसे जो भी मांगा आपने दिया है आज कुछ मांगू तो देंगे आप?”
प्राणनाथ बाबू भाव विह्वल होकर बोले- “बेटा तू चाहे तो मेरे प्राण मांग ले।”
सुलेखा ने मन-ही-मन कहा- ‘वह बेटी क्या जो पिता से उसके प्राण मांग ले, बेटी तो तब जब पिता के लिए खुद को कुर्बान कर दे।’ सुलेखा को चुप देखकर प्राणनाथ बाबू ने अधीरता से कहा-
“क्या हुआ बेटा बोलो तो ?”
“पापा आप यह शादी तोड़ दो।” सुलेखा के शब्दों से कमरे में जैसे बिजली गिरी हो, सभी के मुंह खुले के खुले रह गए।
सुलेखा ने मन-ही-मन कहा- ‘वह बेटी क्या जो पिता से उसके प्राण मांग ले, बेटी तो तब जब पिता के लिए खुद को कुर्बान कर दे।’ सुलेखा को चुप देखकर प्राणनाथ बाबू ने अधीरता से कहा-
“क्या हुआ बेटा बोलो तो ?”
“पापा आप यह शादी तोड़ दो।” सुलेखा के शब्दों से कमरे में जैसे बिजली गिरी हो, सभी के मुंह खुले के खुले रह गए।
प्राणनाथ बाबू खुद को संयत करते हुए बोले- “यह तुम क्या कह रही हो सुलेखा ?”
“हां पापा, आप यह शादी तोड़ दो। मैं लक्ष्मी नहीं बनना चाहती जो आपके घर को उजाड़ कर जाए और किसी लोभी का घर भर दे।”
“लेकिन बेटा हर जगह वैसे ही लोग हैं जिन्हें बहू के रूप में लक्ष्मी चाहिए।”
“नहीं पापा, हम अमृतेश की शादी में लक्ष्मी नहीं बहू लाएंगे और मैं भी वहीं शादी करूंगी जहां आपको प्रणदान नहीं कन्यादान करना पड़े।”
स्वर्णा ने सुलेखा को समझाते हुए कहा- “लेकिन ऐसा परिवार मिलेगा कहां ?”
“हां पापा, आप यह शादी तोड़ दो। मैं लक्ष्मी नहीं बनना चाहती जो आपके घर को उजाड़ कर जाए और किसी लोभी का घर भर दे।”
“लेकिन बेटा हर जगह वैसे ही लोग हैं जिन्हें बहू के रूप में लक्ष्मी चाहिए।”
“नहीं पापा, हम अमृतेश की शादी में लक्ष्मी नहीं बहू लाएंगे और मैं भी वहीं शादी करूंगी जहां आपको प्रणदान नहीं कन्यादान करना पड़े।”
स्वर्णा ने सुलेखा को समझाते हुए कहा- “लेकिन ऐसा परिवार मिलेगा कहां ?”
प्राणनाथ बाबू बोले- “ऐसा संभव नहीं है सुलेखा, तुम हठ मत करो। अगर शादी टूटी तो हमारी बहुत बेइज़्ज़ती होगी।”
सुलेखा ने रोनी हंसी हंसते हुए कहा- “हाँ पापा! बेटी या तो बेइज़्ज़ती करवाएगी या पिता को बिकबाएगी दोनों सूरत में पिता को त्रास ही देगी।”
प्राणनाथ बाबू ने सुलेखा को बड़े लाड़ से पाला था। उन्होंने अमृतेश पर कई बार हाथ भी उठाया है लेकिन सुलेखा से कभी कड़ी आवाज में बात नहीं की, न ही सुलेखा ने कभी माता-पिता को ऐसा मौका दिया। आज सुलेखा की बात सुनकर प्राणनाथ बाबू का मन हुआ सुलेखा को हृदय में छुपा ले। उन्होंने भावुक होकर कहा- “तुम जैसा कहती हो वैसा परिवार कहाँ मिलेगा बेटा ?”
“पापा! कोई ना कोई तो होगा जो अपनी सुलेखा से यह वादा कर रहा होगा कि वह बहू के रूप में एक प्यारी बेटी लाएगा लक्ष्मी नहीं।”
“और ऐसा कोई नहीं मिला तो ?”
“तो मैं कुंवारी रहूंगी।”
“नहीं बेटा, कोई भी बाप अपनी बेटी को उम्र भर अपने घर में बैठा कर नहीं रख सकता।”
“बेटी बोझ होती है इसलिए न ?”
“पापा! कोई ना कोई तो होगा जो अपनी सुलेखा से यह वादा कर रहा होगा कि वह बहू के रूप में एक प्यारी बेटी लाएगा लक्ष्मी नहीं।”
“और ऐसा कोई नहीं मिला तो ?”
“तो मैं कुंवारी रहूंगी।”
“नहीं बेटा, कोई भी बाप अपनी बेटी को उम्र भर अपने घर में बैठा कर नहीं रख सकता।”
“बेटी बोझ होती है इसलिए न ?”
सुलेखा की बात सुनकर फिर प्राणनाथ बाबू के हृदय में हूक सी उठी, वे कंपकंपाते लफ्जों में बोले- “नहीं बेटा तू मुझ पर बोझ कभी नहीं बन सकती।”
“आज पहली बार मुझे आपकी बात का प्रमाण चाहिए, ऐसे ही विश्वास नहीं करूंगी।” - सुलेखा की आवाज में चट्टान सी मजबूती थी। उसी समय प्राणनाथ बाबू के चचेरे भाई सुरेश ने आकर कहा-
“भैया चलिए, सब तैयार हैं, बड़े भैया इंतजार कर रहे हैं।”
प्राणनाथ बाबू ने सुलेखा को खींचकर ऐसे गोद में बैठा लिया जैसे कि वह अभी छोटी सी बच्ची हो। उसका माथा चूमते हुए सुरेश से बोले- “सामान वापस उतरवा लो और भैया से बोलो, शाम में पूरे मुहल्ले के लिए भोज का आयोजन करें आज मेरी गुड़िया का जन्मदिन है। आदमी तीन सौ से ज्यादा भी हुए तो कोई गम नहीं।”
सुरेश आश्चर्य से प्राणनाथ बाबू को अपनी बाईस वर्षीय बेटी को गोद मैं बैठा कर दुलारते हुए देखता रहा।
“आज पहली बार मुझे आपकी बात का प्रमाण चाहिए, ऐसे ही विश्वास नहीं करूंगी।” - सुलेखा की आवाज में चट्टान सी मजबूती थी। उसी समय प्राणनाथ बाबू के चचेरे भाई सुरेश ने आकर कहा-
“भैया चलिए, सब तैयार हैं, बड़े भैया इंतजार कर रहे हैं।”
प्राणनाथ बाबू ने सुलेखा को खींचकर ऐसे गोद में बैठा लिया जैसे कि वह अभी छोटी सी बच्ची हो। उसका माथा चूमते हुए सुरेश से बोले- “सामान वापस उतरवा लो और भैया से बोलो, शाम में पूरे मुहल्ले के लिए भोज का आयोजन करें आज मेरी गुड़िया का जन्मदिन है। आदमी तीन सौ से ज्यादा भी हुए तो कोई गम नहीं।”
सुरेश आश्चर्य से प्राणनाथ बाबू को अपनी बाईस वर्षीय बेटी को गोद मैं बैठा कर दुलारते हुए देखता रहा।
- अमित कुमार मिश्रा
अतिथि सहायक प्राध्यापक, एच.एस.कॉलेज, उदाकिशुनगंज (मधेपुरा)
संपर्क - 9304302308, amitraju532@gmail.com
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