रामकहानी, ( कहानी )

रामकहानी                 - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’

यह मेरी एक काल्पनिक और झूठी कहानी है। इसे मैं शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूं ताकि यह सच्ची भी हो तो वही लगे जो मैं लगाना चाहता हूं। चलिए शुरू करते हैं मेरे दादा से, दादा से इसलिए क्योंकि उनके पिता को मैंने देखी ही नहीं थी और यह अच्छा है अन्यथा आपको यह बेकार कहानी थोड़ी और लंबी झेलनी पड़ती। मेरे दादा एक किसान थे, एक ऐसा किसान जो कृषि और पशुपालन दोनों ही करते रहे। बस उन्होंने एक काम नहीं की- पढ़ाई। वे बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं थे जिस कारण मैं उन्हें तब तक हीन दृष्टि से देखता रहा जब तक कि पढ़-लिख‌ कर मैंने खुद को बेकारों की सूची में शामिल नहीं कर ली। जैसे ही मैं पढ़कर ज्ञानी हुआ सबसे पहले यही बोध हुआ कि मेरे दादा से ज्यादा समझदार और मुझसे ज्यादा बेवकूफ दुनिया भर में नहीं है। मैंने दादा को सदैव ही कठोर परिश्रम करते देखा, खुशी की बात यह थी कि उन्हें कभी जीवन से निराश नहीं होना पड़ा, मेरी तरह। यह उनके अशिक्षित होने का पुरस्कार था कि उन्होंने अपने बाल बच्चों समेत पूरे परिवार को हंसी खुशी से पाल-पोस लिया और सुख पूर्वक जीवनयापन की।
   अब आते हैं मेरे पिता और चाचाओं पर, इन सभी ने पढ़ने की गलती की जरूर लेकिन समय रहते सचेत हो गए। पढ़ने की जो उन्होंने गलती की, उसका दंड यह मिला कि अपनी जमीन के मालिक पिता, के पुत्र किसी की फैक्ट्री में मजदूर बनकर जीते रहे। समय पर पढ़ाई छोड़ देने का पुरस्कार यह मिला कि निकम्मा होने से बच गए। उन लोगों ने भी बाल- बच्चों और परिवार की परवरिश अच्छे से कर ली और सुख, दुख पूर्वक जीवनयापन की।
आप सभी समझ गए होंगे कि अब मेरी राम कहानी की बारी है। ठीक है चलिए। मैं, मैं हूं। मुझे आप हर उस व्यक्ति में देख सकते हैं जो तीस वर्ष पूरा होने तक पढ़ाई करता रहता है, पचपन वर्ष पूरा होने तक नौकरी की तलाश करता है और साठ वर्ष की अवस्था में खुद को गालियां देता हुआ मर जाता है। अगर नहीं मरा तो सगे संबंधियों की बदकिस्मती। खैर, जैसा कि भगवान सभी को एक मौका देता है मुझे भी यह मौका उस समय मिला जब मेरी मैट्रिक की परीक्षा होने वाली थी। मैंने परीक्षा से तीन दिन पूर्व मां से पैसों के लिए लड़कर अपना प्रवेश-पत्र फाड़ दिया और परीक्षा नहीं देने का निर्णय किया। काश कि मैं अपने निर्णय पर अडिग रह पाता तो मेरी यह दुर्दशा नहीं होती। पता नहीं कैसे, शायद मेरी बदकिस्मती से मेरा फटा हुआ प्रवेश पत्र जोड़ा गया और मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी। उत्तीर्ण भी हो गया। कुछ लोगों ने खुद के हाथों बर्बाद होने पर शाबाशी दी। मेरा उत्साह बढ़ा और मैंने इंटर करने की ठान ली। इंटर उत्तीर्ण होकर मैंने राजधानी की ओर रुख की। खर्च का बोझ बाप के सिर पर डाले रहा। तीन वर्ष में बीए भी कर बैठा। अपने शिक्षकों का चहेता था, चहेता इसलिए कि निकम्मा था और निकम्मा बड़े काम का होता है। दिन, दोपहर, रात, हमेशा फ्री ( खाली और निशुल्क दोनों)। कॉलेज के दिनों में शत-प्रतिशत उपस्थिति दे कर मैंने वर्ग भी किए और सभी आयोजनों में हिस्सेदार भी बना रहा। इन दिनों अपनी साइकल से मैंने शहर का कोना कोना छान मारा था। कई दिन सुबह का कॉलेज गया शाम ढले घर लौटता। बीए का परिणाम संतोषजनक रहा। तब तक मैंने, कॉलेज में प्रोफेसर बनने का सपना भी देख लिया और डंके की चोट पर घोषणा भी कर दी। बोझ बाप के सिर पर डाले एमए में नामांकन कराया। फिर वही सब पढ़ाई, कॉलेज, एमए पास।
अब ?
“अब क्या,  प्रोफेसर बनने के लिए नेट पास करो और नौकरी ले लो।”
“ठीक है, मैं नेट पास करूंगा।” और मैंने नेट पास की, एक बार, दो बार, तीन बार, नेट पास करता गया। परिचितों से मिला, जिनके काम आया उनसे मिला, जिनका काम बनाया उनसे मिला, जिनका काम बिगाड़ा उनसे मिला, सब ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा लेकिन पेट की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। किसी ने कहा आईएएस बनो, किसी ने कहा डीएसपी बनो, किसी ने कुछ, किसी ने कुछ, बनने की सलाह दी।
नौकरी के लिए आवेदन करता रहा। बाप के कंधे जितने कमजोर हुए बोझ उतना ना ही बढ़ता रहा। तब किसी ने सलाह दी- “पीएचडी कर लो, नौकरी पक्की।” मैंने यह भी कर ली। बाप के कंधे पर तीन वर्ष और बिताने के लिए सवार हुआ। इन्हीं दिनों एक शुभचिंतक ने मेरी शादी करवा दी। शादी से फायदा इतना ही हुआ कि अब तक मेरा बोझ सिर्फ मां-बाप ढ़ोते थे, अब मां-बाप और पत्नी मिलकर ढोने लगें। मैं किताब का कीड़ा बन चुका था, उसे चाट-चाट कर पीएचडी भी कर गया। फिर लोगों से मिला, सबों ने सिर पर हाथ फेरे, पेट की ओर किसी का ध्यान....., फार्म भरता रहा नौकरी.....।
अब, चालीस वर्ष की अवस्था में बेकार बैठा हूं, बेकारों को अपनी राम कहानी सुनाता हूं, अब भी फार्म भरता हूं, मां-बाप और पत्नी से जो उपार्जन हो जाता है खा लेता हूं। पढ़ने की गलती की, दुख पूर्वक जीवनयापन करता हूं।
दूध लाने जाना है, विदा लेता हूं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )