सच से मुठभेड़ (लेख)
सच से मुठभेड़.
“सीने का दर्द कल भी जिंदा था,
आज भी मुकम्मल है।
सच का स्वाद कल भी कड़वा था,
आज भी जहरीला है।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है ‘प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।’ हम जैसे छात्र जो शुक्ल जी के इतिहास के सहारे ही डेगा-डेगी आगे बढ़ता रहा है, उस में इतना साहस नहीं कि शुक्ल जी की मान्यता का खंडन कर दे। तब तो बिल्कुल नहीं जबकि इतिहास को समझने की क्षमता भी विकसित नहीं हुई है। खैर, इसी मान्यता के आलोक में मैं दो-चार बात कहने की कोशिश करूंगा। दो-चार बात ही इसलिए की उससे अधिक कहने की मेरी क्षमता नहीं है।
हम सभी चाहते हैं कि हमारा समाज, हमारा देश, भ्रष्टाचार और क्षुद्रता से आगे बढ़े। देश-समाज की नींव विद्यालय और महाविद्यालयों में पड़ती है। इन स्थानों पर एक स्वच्छ वातावरण के निर्माण की आवश्यकता को कोई नकार नहीं सकता है, लेकिन जितनी गंदी राजनीति यहां की जाती है वह और कहां मिलेगी। मैं यह नहीं कहना चाहता कि सभी लोग एक ही जैसे हैं, यहां भी कई ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ प्राध्यापक/आचार्य हैं लेकिन उनकी स्थिति वही है जो बेचारे सीधे-साधे बकरे की होती है। उसे मौके-बेमौके हलाल कर दिया जाता है। चालाक लोग अपना काम निकाल ले जाते हैं और ये बेचारे ईमानदार शिक्षक वर्ग लेने में रह जाते हैं।
क्षमा प्रार्थी हूं, यह मैं नहीं कह रहा हूं ऐसा ‘श्रीलाल शुक्ल’ अपने उपन्यास ‘राग दरबारी’ में दिखला गए हैं। यह उपन्यास मेरे पाठ्यक्रम में था अतः इससे सहमत होना, मुझे उत्तीर्ण होने के लिए आवश्यक था। यहां तो वे सारे पोल खुल गएं हैं कि कैसे विश्वविद्यालय, राजनीतिज्ञों के आशीर्वाद से अपने पदों के लिए सुयोग्य व्यक्ति को प्राप्त करता है। अब मेरी छोटी बुद्धि कुलबुला रही थी कि यह आचार्य/प्रधानाचार्य जो राजनीति की प्रसाद पाते हैं इस कर्ज को उतारते कैसे हैं ? क्या वे सिर पर कर्ज का बोझ लिए ही गुजर जाते हैं ? जवाब कुछ ताजे, कुछ पुराने अखबारों से मिला, ‘नहीं, वे यह कर्ज चुकाते हैं।’
क्या पूछा आपने, कैसे ? अरे भाई! आपने देखा नहीं है, महाविद्यालय के विभिन्न कार्यक्रमों में मंत्री/विधायकों को बुलाया जाता है, जो हाईस्कूल पास नहीं कर सके उन्हें महापंडित बतलाया जाता है। जो महाविद्यालय अपने छात्रों को डॉक्टरेट की उपाधि चप्पल घिस्सवाकर देता है वह राजनेताओं के लिए यह उपाधि थाल में सजाकर खड़ा रहता है। अगर आप इसे चापलूसी समझते हैं तो यह आपकी भूल है, यह तो कर्ज उतारना है। अब जबकि विद्यालय/महाविद्यालयों में इस तरह की नींव डाली जाती है तो देश की राजनीति में घुसखोरों को अर्थमंत्री बना देना, अनपढ़ को शिक्षामंत्री बना देना आदि को गलत कहने वाले को मैं बुद्धिमान नहीं मान सकता।
इनदिनों बैठे-बैठे मैं कुछ कहानियां पढ़ रहा था। इसी क्रम में ‘अमरकांत’ की एक कहानी ‘हत्यारे’ पढ़ गया। पढ़ते-पढ़ते मैंने देखा कि महाविद्यालय के कई पर्दें अचानक से बिना कहे हटा दिए गएं। अचानक से पर्दा हटा दिया जाए तो कुछ नंगे लोग सामने आ जाते हैं। मैंने देखा और मैं आपको बतलाने चला आया। आप किसी से मत कहना वर्ना बेचारे अमरकांत खामखा मारे जाएंगे। एक जगह उन्होंने इल्ज़ाम लगाया है कि यह जो विश्वविद्यालय का टॉपर होता है यह पढ़ कर टॉप नहीं करता, अपने गुरु के आशीर्वाद से करता है। पहले मुझे यकीन नहीं आया फिर मुझे याद आया कि अक्सर वही सच होता है जिस पर मुझे यकीन नहीं आता। देखिए अमरकांत क्या लिख गए हैं-
“वह मामूली स्टूडेंट थी लेकिन मैंने ही उसको टॉप कराया।”१
अब देखिए, चंद्र सिनहा अच्छी लड़की है, प्रोफ़ेसर दीक्षित उनसे प्रेम करते हैं, तो क्या ललन टॉप करेगा ? कॉमन सेंस है यार। प्रोफेसर साहब ने तो यहां तक कहा कि-
“मैंने उससे कई बार कहा है कि तुमको दो वर्ष में ही डॉक्टरेट दिला दूंगा।”२
इन पंक्तियों में अमरकांत ने मेरी आंखें खोल दी। मैं सोचता था विद्यार्थी पढ़ कर टॉप करता है और डॉक्टरेट की उपाधि पाता है।
मैं आपको उस प्रसंग पर ले जाने की भूल कतई नहीं करूंगा जहां यह तक कह दिया गया है कि, महाविद्यालय के बड़े-बड़े स्तंभ, अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करके अपना पद प्राप्त करते हैं-
“मैं जानता हूं कि तुम बड़े-बड़े अफसरों और मंत्रियों की चापलूसी करते हो।”३
चूंकि शुक्ल जी ने लिखा है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो संभव है जो परछाई अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल ने दिखलाई है वह सच भी हो। यह बात अमरकांत जानें, शुक्ल जी जानें और साहित्य समीक्षक जानें। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मदिरा के नशे में, मैं जाने क्या-क्या बक जाता हूं, आज भी थोड़ी ज्यादा पी गया हूं। खैर मदिरा के नशे में डूबा व्यक्ति पागल के समान होता है, वह दंड का पात्र नहीं होता। कसम खाता हूं, सुबह उठकर यह लेख फाड़ दूंगा।
क्षमाप्रार्थी- अमित कुमार मिश्रा।
१. अमरकांत, प्रतिनिधि कहानियां, राजकमल पेपरबैक्स, पृ.-१०८
२. वहीं.
३. वहीं.
अमित जी इस आलेख में आपने जो वर्णन किया है उससे वाकई कोई बच नहीं पाया है । तब से अब तक ।जहाँ तक ईमानदारों की बातें है तो वो तो बेचारे हैं और उनकी कहीं कोई निशानियाँ रहती कहाँ है । आपकी यह आलेख यथार्थ हो सकती है । शुक्ल जी के ही शब्दों में -"साहित्य समाज का दर्पण है "।
जवाब देंहटाएंसह्रदय आभार महाशय।
जवाब देंहटाएं💢 प्रिय अमित, विवेचित समालोचना में छात्र और राजनीत जीवन के संगम के कुछ समीक्षआत्मक निष्कर्ष आयाम दिखाई देते है। पक्ष ओर विपक्ष के सम्मिश्रित तर्कों को निश्कर्ष रूप देखे तो प्रासंगिक दिखाई पड़ता है कि विद्यार्थी काल जीवन की रचनात्मक अवधि होती है । इस अवधि में विद्यार्थी को अपने ऐसे सभी गुणों को विकसित करना चाहिए जो उसे सफल जीवन बिताने के योग्य बना सकें । यदि उसे राजनीति से बिल्कुल अलग रखा गया तो उसके व्यक्तित्व का एकतरफा विकास ही हो पाएगा । यदि हम अपने महान नेताओं के जीवन का अध्ययन करें तो हमें पता चलेगा कि उनमें से अधिकांश ने विद्यार्थी जीवन में भी राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लिया था
जवाब देंहटाएंअब यह बहुत कठिन है कि किसी एक अथवा दूसरे दृष्टिकोण के पक्ष में निर्णय दिया जाए । हमें कोई मध्य मार्ग ही ढूंढना पड़ेगा । विद्यार्थी को राजनीति में भाग तो लेना चाहिए पर उसे अपने आप को सक्रिय रूप से इसके साथ नहीं जोड़ लेना चाहिए । सभी गतिविधियाँ अच्छी है, बशर्ते व्यक्ति यथोचित सीमाओं के अन्दर रह सके ।
अत: विद्यार्थियों को मुख्य रूप से अपने अध्ययन पर ही ध्यान देना चाहिए । साथ ही साथ उन्हें इस बात से अवगत रहना चाहिए कि उनके आस-पास क्या हो रहा है । उन्हें ऐसी स्थिति में राजनीति की ज्वाला में तब तक नही कूदना चाहिए, जब तक इससे देश की एकता अथवा स्वतंत्रता के लिए खतरा न पैदा हो जाए ।✒
🔆 मैं समीक्षा अथवा आलोचनात्मक लेखन को पढ़ना पसंद करता हूँ और तुम्हारे लेख को प्रासंगिक कहूंगा।
अपनी शुभकामनाओ सहित अभिवादन✒
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बहुत-बहुत आभार श्रीमान। आप लोगों की शुभकामनाएं ही मुझे निरंतर लेखन को प्रेरित करती रही है। आप सदैव ही श्रद्धेय रहे हैं।
जवाब देंहटाएंप्रिय समाज मे तुम मिले जहाँ पे चोर अनन्त ।
जवाब देंहटाएंमे भ्रष्टाचारी कब बना जहाँ मित्र है,साधु -संत
श्रीमान, आपलोग इतनी विद्वतापूर्ण टिप्पणी करते हैं कि मेरी रचना का कद छोटा हो जाता है और आपकी टिप्पणी का बड़ा। जिस बात को मैं इतने बड़े लेख में ठीक से प्रकट नहीं कर सका उसे अपने बस दो पंक्ति में कह डाली। धन्यवाद।
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