ग़ज़ल
ग़ज़ल
गैरों की महफ़िल में रहते हो दिन-रात,
कभी मेरे भी दिल का दरवाज़ा खटखटा देते।
औरों को पिलाया है तुमने इश्क़ का समंदर,
कभी मुझको दो कतारा आँसू ही पिला देते।
सब की जिन्दगी सवारती रही, बन कर बहार,
मेरे गुलशन को तुम पतझड़ ही बना देते।
लोगों को दिया है तुमने अमृत-कलश,
मुझको ज़हर का प्याला ही थमा देते।
गैरों की जिन्दगी को किया पूनम-सी रौशन,
मेरे जिन्दगी में अमावश बनकर ही छा जाते।
लोगों ने ठुकराया है तुम्हे हुस्नो-सबाब खोने के बाद,
ऐसे समय में तुम मुझको बुला लेते।
इस जहाँ में जिया था बिल्कुल अकेला,
उस जहाँ के सफ़र में 'अमित' को साथी बना लेते।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें