बचपन जवानी बुढ़ापा (कविता)

बचपन जवानी बुढ़ापा

इस बचपन और बुढ़ापे के बीच
सचमुच कुछ आता है क्या ?
मैं निरंतर ढूंढता हूं उस कड़ी को, जिसने
मुझे बचपन से बुढापा तक लाया ।
मजदूर पिता ने बचपन में जो खिलौने दिए थे
उसमें खिलौना नहीं था
काम से बेकार पड़ा सामान था,
जिस पाठशाला में भेजा गया
वहां पढ़ाई नहीं सिर्फ खिचड़ी थी,
बारह वर्ष की उम्र में मैंने काम पकड़ी थी।
बीते समय के साथ जवानी नहीं आई
आएं तो, बीवी, बच्चे और बुढ़ापा
जवानी ने आंह नहीं भरी, अंगराई नहीं ली
न ही अरमान मचलें।
इन तीन बच्चों का जनक भी
यौवन का उन्माद नहीं
एक सामान्य थका हुआ जीवन है।
दस-बारह घंटे मजदूरी के बाद
पत्नी का यौवन भी बोझ सा लगता है,
बच्चों की ठिठोली अनजानी और
उसकी बोली बेगानी लगती है ।
दिन भर रिक्शा नहीं पाताल से
अपने लिए सांस खींचता हूं
शाम को सस्ती शराब पीता हूं ।
सच कहूं तो पहले थकान मिटाने को पीता था
अब जिस्म में सिर्फ शराब ही बचा है,
आंखों से अब धुंधला दिखता है
अठाईस वर्षीय पत्नी के चेहरे पर
झुर्रियों का पहरा लगता है ।
दो बच्चे चिथड़े में नंगा बचपन गुजारते हैं
बड़ा पिछले वर्ष से काम पड़ जाता है
बिना जवान हुए वह भी
बुढापे को घर बुलाता है।
आज चालीस वर्ष की अवस्था में निढ़ाल हूं,  परेशान हूं, बुढापा से लड़ता हुआ
मौत का मोहताज हूँ 
बिना जवानी देखे बुड्ढा हुआ इंसान हूँ ।
    - अमित कुमार मिश्रा ।

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